प्रह्लादकृतं नृसिंहस्तोत्रम्

प्रह्लादकृतं नृसिंहस्तोत्रम्
ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव । वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयमभयम् आत्मनि भूयिष्ठा ॐ क्ष्रौम् क्ष्रौम् ॥ ८॥ स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ ९॥ मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः । यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान् सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः ॥ १०॥ यत्सङ्गलब्धं निजवीर्यवैभवं तीर्थं मुहुः संस्पृशतां हि मानसम् । हरत्यजोऽन्तःश्रुतिभिर्गतोऽङ्गजं को वै न सेवेत मुकुन्दविक्रमम् ॥ ११॥ यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥ १२॥ हरिः हि साक्षात् भगवान् शरीरिणां साक्षात् आत्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम् । हित्वा महान्तं यदि सज्जते गृहे तदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम् ॥ १३॥ तस्माद्रजोरागविषादमन्यमानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं नृसिंहपादं भजताकुतोभयम् ॥ १४॥ ॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पञ्चमस्कन्धे अष्टादशाध्यायान्तर्गतं प्रह्लादकृतं नृसिंहस्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और संदर्भ
प्रह्लादकृतं नृसिंहस्तोत्रम् (Shrimad Bhagavatam 5.18.8-14) एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। यह स्तुति प्रह्लाद महाराज द्वारा हरिवर्ष (Harivarsha) नामक वर्ष में भगवान नृसिंह की आराधना करते समय की गई थी। यह वह स्तुति नहीं है जो उन्होंने हिरण्यकशिपु के वध के तुरंत बाद की थी (जो सप्तम स्कन्ध में है), बल्कि यह एक शांत और गंभीर प्रार्थना है जो वे नित्य करते हैं। इस स्तोत्र का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इसमें केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण (Universal Welfare) की कामना की गई है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)
इस स्तोत्र के कुछ श्लोक वैष्णव परंपरा के 'रत्न' माने जाते हैं:
- नृसिंह मंत्र (Nrisimha Mantra): आठवें श्लोक में भगवान नृसिंह का बीज मंत्र "ॐ क्ष्रौम्" (Om Kshaum) निहित है। इसमें प्रार्थना की गई है कि भगवान हमारे हृदय के अज्ञान रूपी अंधकार (Ignorance) को अपने वज्र जैसे नखों से काट दें और हमारे कर्म-बंधनों (Karma-Ashaya) को जला दें।
- विश्व शांति की प्रार्थना: नौवें श्लोक ("स्वस्त्यस्तु विश्वस्य...") में प्रह्लाद जी कहते हैं—"सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो। दुष्टों (खल) की बुद्धि शुद्ध हो जाए। सभी जीव एक-दूसरे के प्रति मित्र भाव रखें।" यह सनातन धर्म की 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- भक्ति की महिमा: १२वें श्लोक ("यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना") में कहा गया है कि जिसके पास भगवान की निष्काम भक्ति है, उसमें देवताओं के सभी गुण (All good qualities) स्वतः आ जाते हैं। इसके विपरीत, अभक्त चाहे कितना भी गुणवान क्यों न हो, वह केवल बाहरी मनोरथों में दौड़ता रहता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
श्रीमद्भागवत के अनुसार, इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से निम्नलिखित लाभ होते हैं:
- अभय प्राप्ति (Fearlessness): "अभयमभयम् आत्मनि भूयिष्ठा" - भगवान नृसिंह भक्त को अपने स्वरूप में स्थित कर उसे पूर्ण अभय प्रदान करते हैं। सभी प्रकार के भय, विशेषकर मृत्यु भय, नष्ट हो जाते हैं।
- कर्म बंधन का नाश: यह स्तोत्र संचित कर्मों और पापों के बीज (Root of sins) को नष्ट करने में सक्षम है।
- इन्द्रिय संयम (Control of Senses): १०वें श्लोक में बताया गया है कि जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों का दास है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। यह स्तोत्र इन्द्रिय संयम और संतोष (Satisfaction) प्रदान करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय
- नृसिंह चतुर्दशी (Nrisimha Chaturdashi) के दिन या प्रतिदिन संध्या काल (गोधूलि बेला) में इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ है।
- शुद्ध होकर, भगवान नृसिंह के चित्र के सामने बैठें। पहले भगवान को प्रणाम करें और फिर शांत चित्त से पाठ करें।
- श्लोक संख्या ९ ("स्वस्त्यस्तु विश्वस्य...") को नित्य प्रार्थना (Daily Prayer) के रूप में बच्चों को भी सिखाया जा सकता है, जिससे उनमें सद्गुणों का विकास हो।