पीठ स्तोत्रम्

पीठस्तोत्रम्
देवा देवेश्वराद्याश्च ऋषयो ऋषिसत्तमाः । पृथगेवोपदेष्टारस्तेषां पीठं पृथक् पृथक् ॥ १॥ मनुष्येश्वरावतारा ये आचार्या मुरवैरिणः । पारम्पर्यागतं तेषां पीठमेकं विशिष्यते ॥ २॥ यथा महीभृतां पीठं जगतां पालनाय वै । तथैवादेशिकानां च पीठं धर्मप्रवृत्तये ॥ ३॥ पीठस्थ एव भूपालो यथा न्यायप्रवर्तकः । तथा पीठस्थिताचार्यो योग्यो धर्मप्रवृत्तये ॥ ४॥ पीठस्थितो यथा राजा मान्यो देवैर्नरैरपि । तथा पीठस्थिताचार्यः पूज्यः स्यान्न विना च तम् ॥ ५॥ यदा विलुप्यते पीठं पारम्पर्यक्रमागतम् । देशकालप्रमादाद्यैस्तदा नूत्नं विधीयते ॥ ६॥ देवर्षीणां च पूर्वेषां मन्त्रं वा नाममन्त्रकम् । संयोज्य पीठमन्त्रेण पीठं संस्थापयेत्सुधीः ॥ ७॥ राजपीठाङ्गवद्राजपीठाङ्गैः पीठमर्चयेत् । अथवा भावनामात्रैः पूर्वोक्तं वा यथेप्सितम् ॥ ८॥ अथवा सप्तदशभिर्यन्त्रैर्मन्त्रैर्निरूपितम् । संराडाचार्यपीठं स्यात्समर्च्यं नित्यमेव तत् ॥ ९॥ तस्य दक्षिणपार्श्वे तु कुर्याद्यन्त्रचतुष्टयम् । तत्त्वतत्त्वेशर्षिदेवैरुपदेवैस्तदिष्यते ॥ १०॥ वामे पार्श्वे चतुर्यन्त्री कुर्यात्साधकसत्तमः । स्वरैर्वर्णैर्मन्त्रबीजैः पदैर्मानस्य सम्भवात् ॥ ११॥ पुरतः पदके तत्र पुनर्यन्त्रचतुष्टयम् । गायत्र्या निगमानां च तथा वै शास्त्रमन्त्रयोः ॥ १२॥ मध्ये सिद्धिनिधीयन्त्रमासनं तत्र कल्पयेत् । गोपालयन्त्रराजं च पृष्ठे तस्याग्रतो भवेत् ॥ १३॥ सङ्ख्यायन्त्रं चाङ्कयन्त्रं पृष्ठे पीठस्य पृष्ठतः । अधर्मचक्रं चक्रस्याधस्थं मूर्ध्नि गुरुर्विशेत् ॥ १४॥ गोपालोपासकानां च एतत्सिंहासनं मतम् । सौवर्णं राजतं ताम्रं काष्ठमाश्मं च मृन्मयम् ॥ १५॥ असम्भवे भावनैव मन्त्रादीनां विधीयते । उत्सेधः परिणाहश्च शास्त्रतो वाप्यभीप्सितः ॥ १६॥ आचार्यकुलसम्भूत आचार्यगुणसंश्रयः । स्थित्वैव तत्त्वमाचार्या योग्यो व्याख्योपदेशयोः ॥ १७॥ समृद्धयोऽस्य वर्द्धन्ते प्रतापोऽस्य यतो महान् । आचार्यतो हरेर्भक्तिर्विरक्तिरपि जायते ॥ १८॥ एतत्सिंहासनं दिव्यं राज्ञा शिष्यैश्च सम्मतैः । पूजितं मननीयं स्यादाचार्यः साम्प्रदायिकः ॥ १९॥ व्याससिंहासनं चान्यद्दीयते ऋषिभिर्द्विजैः । रोमहर्षणये यद्वच्छास्त्रव्याख्याकृतेऽर्पितम् ॥ २०॥ संश्रयेद् ब्राह्मणो विद्वान्सूतो नैव विलोमजः । मन्त्रयोः प्रातिलोम्येन मखें जातस्तथोच्यते ॥ २१॥ विनन्दन्निजकाण्डार्थं पाञ्चरात्रं सदागमम् । वदन् स्वसंहितां गर्वाज्जज्ञे सङ्कर्षणश्च तम् ॥ २२॥ आचार्यं मानयेद्धीमान्मनसा कर्मणा गिरा । पञ्चाक्षरी महामन्त्रयन्त्रं स्थित्वा स्वयं हरिः ॥ ২৩॥ इत्थं पीठस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा पीठं समाश्रितम् । राधिकायै ददौ पूर्वं ललितायै च सा ददौ ॥ २४॥ सा मह्यमददाद् देवी वागीशाय सदस्पतिः । सङ्कल्पमस्य सङ्कल्प्य चरितं च महात्मनाम् ॥ २५॥ पञ्चाक्षरं चाष्टवर्णं तथैवाष्टादशाक्षरम् । नारायणाय शेषाय स ददौ त्रिपुरारये ॥ २६॥ दशार्णेन च संयुक्तान्सोऽदान्मन्त्रान्सुरर्षये । द्वादशार्णेन संयुक्तान्तान् व्यासाय ददावसौ ॥ २७॥ नमः पीठाय महते आचार्याय नमो नमः । उपदेशाय मन्त्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च नमो नमः ॥ २८॥ छत्रायामृतवर्षाय वारणायातपस्य च । नमश्चामरयुग्माय शङ्खयुग्माय वै नमः ॥ २९॥ वादित्रेभ्यो नमस्तस्य दरारिभ्यां नमो नमः । ज्योतिर्युग्मायान्धकारमर्दनाय नमो नमः ॥ ३०॥ मायूरहस्तकद्वन्द्वस्वर्णवेत्रयुगं नमः । रूप्यं वेत्रयुगं भव्यं हरिवक्त्रचतुष्टयम् ॥ ३१॥ आर्यसिंहासनं वन्दे केतुध्वजविराजितम् । नीराजमानं यः पश्येत्प्रणमेत्स हरिं व्रजेत् ॥ ३२॥ ॥ इति पीठस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और आचार्य पीठ
पीठ स्तोत्रम् (Peetha Stotram) एक अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट रचना है जो भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आचार्य पीठ (Guru Peetha) की महिमा का वर्णन करती है। 'पीठ' का अर्थ है 'आसन' या 'गद्दी', जिस पर विराजित होकर आचार्य (Guru) अपने शिष्यों को ज्ञान का उपदेश देते हैं। श्लोक ३ और ४ में कहा गया है कि जैसे राजा का सिंहासन (Rajapeetha) प्रजा के पालन और न्याय के लिए होता है, वैसे ही आचार्य का पीठ धर्म की स्थापना और प्रचार (Dharma Pravartana) के लिए होता है। यह स्तोत्र इस तथ्य को स्थापित करता है कि गुरु का आसन केवल एक भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि दिव्य शक्तियों का केंद्र है।
यंत्र रहस्य और पूजन विधि
यह स्तोत्र पीठ पूजन की तांत्रिक और वैदिक विधि का भी वर्णन करता है। इसमें पीठ के विभिन्न भागों में विभिन्न शक्तियों की स्थापना की बात कही गई है:
- यंत्र विन्यास (Arrangement of Yantras): श्लोक ९ से १४ तक बताया गया है कि पीठ के चारों ओर और मध्य में विशिष्ट यंत्र स्थापित किए जाने चाहिए। दक्षिण में चार यंत्र, वाम भाग में चार यंत्र, और मध्य में 'सिद्धिनिधि यंत्र' और 'गोपाल यंत्र' (Gopal Yantra) स्थापित होते हैं।
- राजोपचार (Royal Worship): गुरु को 'राजा' के समान माना गया है। श्लोक २९-३१ में छत्र (Umbrella), चामर (Fly-whisk), और स्वर्ण दंड (Golden Scepter) जैसे राजसी चिह्नों के पूजन का विधान है, जो गुरु की आध्यात्मिक संप्रभुता (Spiritual Sovereignty) को दर्शाते हैं।
- गुरु परंपरा: श्लोक २४-२७ में ज्ञान की परंपरा का वर्णन है—राधिका से ललिता, फिर वागीश (ब्रह्मा), नारायण, शेषनाग और फिर व्यास जी तक। यह गुरु-शिष्य परंपरा की पवित्रता को सिद्ध करता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
इस स्तोत्र के पाठ और मनन से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- हरि भक्ति और विरक्ति: १८वें श्लोक में स्पष्ट कहा गया है—"आचार्यतो हरेर्भक्तिर्विरक्तिरपि जायते"। अर्थात, आचार्य के प्रभाव और इस पीठ की उपासना से भगवान हरि में भक्ति और संसार से विरक्ति (Detachment) उत्पन्न होती है।
- धर्म की रक्षा: यह स्तोत्र धर्म की रक्षा और प्रसार के संकल्प को दृढ़ करता है। जो व्यक्ति इस पीठ का सम्मान करता है, वह धर्म का रक्षक बनता है।
- परम गति: अंतिम श्लोक में कहा गया है—"प्रणमेत्स हरिं व्रजेत्"। जो भक्त इस 'आर्य सिंहासन' (Noble Throne) को प्रणाम करता है, वह अंत में भगवान हरि के धाम (Moksha) को प्राप्त होता है।
पाठ करने की विधि और अवसर
- गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) और व्यास पूजा के दिन इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ और आवश्यक माना गया है।
- अपने गुरु के आसन या पादुका के समक्ष बैठकर इस स्तोत्र का पाठ करें।
- यदि भौतिक पीठ उपलब्ध न हो, तो श्लोक ८ और १६ के अनुसार 'भावनामात्रैः' (Mental Visualization) से मानसिक पूजा करना भी उतना ही फलदायी है।
- वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों और मंत्र साधकों के लिए यह नित्य स्मरणीय है।