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परशुरामकृता गजाननस्तुतिः

परशुरामकृता गजाननस्तुतिः

परशुराम उवाच ।

सहस्रादित्यसङ्काश! नमस्ते जगदीश्वर! । नमस्ते सर्वविद्येश! सर्वसिद्धिप्रदायक! ॥ ३१॥ विघ्नानां पतये तुभ्यं नमो विघ्ननिवारण! । सर्वान्तर्यामिणे तुभ्यं नमः सर्वप्रियङ्कर! ॥ ३२॥ भक्तप्रियाय देवाय नमो ज्ञानस्वरूपिणे । नमो विश्वस्य कर्त्रे ते नमस्तत्पालकाय च ॥ ३३॥ निवारय महाविघ्नं तपोनाशकरं मम । इति स्तुतिं समाकर्ण्य सौम्यतेजा गजाननः ॥ ३४॥ उवाच रामं सम्भ्रान्तं स्वस्यैव तिग्मतेजसा ।

गणेश उवाच ।

यं ध्यायसि दिवारात्रौ मन्त्रं जप्त्वा षडक्षरम् ॥ ३५॥ वरं दातुं समायातः सोऽहं राम! तवाधुना । वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं यद् यद् वाञ्छसि चेतसा ॥ ३६॥ ब्रह्माण्डानामनेकानां स्रष्टा पाताऽपहारकः । नैव जानन्ति मे रूपं ब्रह्माद्या मुनयोऽपि च ॥ ३७॥ राजर्षयश्च सर्वेऽपि सोऽहं ते दर्शनंगतः ।

परशुराम उवाच ।

योऽप्रमेयोऽखिलाधारः सृष्टिसंहारकारकः ॥ ३८॥ यो न वेदैर्न तपसा न यज्ञैर्व्रतसञ्चयैः । न दानैर्नैव योगैश्च जनानां दृष्टिगोचरः ॥ ३९॥ सोऽहं त्वं हि मया दृष्टोऽनुग्रहात्तव विघ्नप! । किमन्यद् वरये देव! भक्तिं देहि निजां दृढाम् ॥ ४०॥

गणेश उवाच ।

भविता मम भक्तिस्ते दृढा राम! द्विजोत्तम! । प्रलोभितस्यापि वरैर्न ते बुद्धिः सुविह्वला ॥ ४१॥ परशुं मे गृहाण त्वं सर्वशत्रुनिबर्हणम् । नाम ते परशुरामेति त्रैलोक्ये ख्यातिमेष्यति ॥ ४२॥ ॥ इति परशुरामकृता गजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

परशुरामकृता गजाननस्तुतिः, श्री गणेश पुराण के उपासना खण्ड (अध्याय ८२) से ली गई एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि इसकी रचना स्वयं भगवान विष्णु के आवेशावतार, भगवान परशुराम, ने की थी। यह स्तोत्र अहंकार पर ज्ञान की विजय और सर्वोच्च सत्ता के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह उस प्रसिद्ध पौराणिक घटना का वर्णन करता है जहाँ परशुराम और भगवान गणेश के बीच युद्ध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप गणेश जी 'एकदन्त' कहलाए। स्तुति के पश्चात्, भगवान गणेश न केवल परशुराम पर प्रसन्न हुए, बल्कि उन्हें अपना अमोघ अस्त्र 'परशु' (कुल्हाड़ी) वापस देकर 'परशुराम' नाम से त्रिलोक में प्रसिद्ध होने का वरदान भी दिया।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

गणेश पुराण के अनुसार, इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करने के बाद, भगवान परशुराम अपने गुरु भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत गए। जब वे द्वार पर पहुँचे, तो बाल गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया, क्योंकि उस समय भगवान शिव और माता पार्वती विश्राम कर रहे थे। परशुराम ने इसे अपना अपमान समझा और गणेश को मार्ग से हटने के लिए कहा। जब गणेश नहीं माने, तो दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। युद्ध के दौरान, क्रोध में आकर परशुराम ने उसी 'परशु' से गणेश पर प्रहार किया, जो उन्हें स्वयं भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। अपने पिता द्वारा दिए गए अस्त्र का मान रखने के लिए, गणेश ने उस प्रहार को अपने एक दाँत पर ले लिया, जिससे उनका बायाँ दाँत टूट गया और वे 'एकदन्त' कहलाए। अपने आराध्य के पुत्र का दंत भंग करने पर परशुराम को गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान गजानन की महिमा को पहचानकर, क्षमा-याचना करते हुए इस स्तुति की रचना की।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तुति एक योद्धा के समर्पण और ज्ञान-प्राप्ति का सुंदर उदाहरण है:
  • सर्वोच्च सत्ता की स्वीकृति (Acceptance of the Supreme Authority): परशुराम गणेश जी को "जगदीश्वर", "सर्वविद्येश" (सभी विद्याओं के स्वामी), और "विघ्नानां पतये" (सभी विघ्नों के स्वामी) कहकर संबोधित करते हैं। यह उनके अहंकार के शमन और गणेश की सर्वोच्च सत्ता की स्वीकृति का प्रतीक है।
  • भक्ति का वरदान (The Boon of Devotion): जब गणेश प्रसन्न होकर परशुराम से कोई भी वरदान मांगने को कहते हैं ("वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं"), तो वे किसी भौतिक वस्तु या शक्ति की मांग नहीं करते। इसके बजाय, वे कहते हैं, "भक्तिं देहि निजां दृढाम्" - मुझे अपनी अचल भक्ति प्रदान करो। यह दर्शाता है कि सच्चा ज्ञान प्राप्त होने पर, भक्ति ही सबसे बड़ा वरदान लगती है।
  • गणेश का रहस्यमय स्वरूप (The Mysterious Nature of Ganesha): गणेश स्वयं कहते हैं, "नैव जानन्ति मे रूपं ब्रह्माद्या मुनयोऽपि च" - ब्रह्मा आदि देवता और मुनि भी मेरे वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। यह उनके परब्रह्म स्वरूप की ओर संकेत करता है, जो तर्क और शास्त्रों से परे है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गणेश के वरदानों में निहित है:
  • अचल भक्ति की प्राप्ति (Attainment of Steadfast Devotion): गणेश जी परशुराम को वरदान देते हैं, "भविता मम भक्तिस्ते दृढा राम! द्विजोत्तम!" - हे द्विजश्रेष्ठ राम! मेरे प्रति तुम्हारी भक्ति सदैव दृढ़ रहेगी। इस स्तोत्र के पाठ से साधक को भी भगवान गणेश के चरणों में अचल भक्ति प्राप्त होती है।
  • शत्रु पर विजय (Victory Over Enemies): गणेश जी परशुराम को उनका परशु लौटाते हुए कहते हैं, "परशुं मे गृहाण त्वं सर्वशत्रुनिबर्हणम्" - मेरा यह परशु ग्रहण करो, जो सभी शत्रुओं का नाश करने वाला है। इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों को अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
  • त्रिलोक में कीर्ति (Fame in all Three Worlds): भगवान गणेश वरदान देते हैं, "नाम ते परशुरामेति त्रैलोक्ये ख्यातिमेष्यति" - आज से तुम्हारा नाम 'परशुराम' होगा और यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा। इस स्तोत्र के पाठ से साधक को भी कीर्ति और सम्मान की प्राप्ति होती है।
  • विघ्नों का नाश (Removal of Obstacles): गणेश जी को "विघ्ननिवारण" कहा गया है। उनकी स्तुति करने से साधक के तप, साधना और जीवन में आने वाले सभी विघ्न दूर होते हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन मंगलवार (परशुराम और गणेश दोनों से संबंधित) और चतुर्थी तिथि है।
  • जो व्यक्ति क्रोध या अहंकार जैसी प्रवृत्तियों से संघर्ष कर रहा हो, उसके लिए यह स्तोत्र आत्म-निरीक्षण और विनम्रता प्रदान करने में सहायक है।
  • किसी भी साधना या तपस्या को शुरू करने से पहले आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए इसका पाठ करना अत्यंत लाभकारी है।
  • पाठ करते समय, भगवान गणेश के 'एकदन्त' स्वरूप का ध्यान करें और परशुराम की तरह ही उनसे भौतिक वरदानों के बजाय अचल भक्ति की प्रार्थना करें।