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श्री पाण्डुरङ्ग स्तोत्रम्

श्री पाण्डुरङ्ग स्तोत्रम्

पाण्डुरङ्गस्तोत्रम्

सख्यामापुर्यया बालगोपा वने भीमरथ्यास्तटे सत्यतः पावने । साधिता पुण्डरीकेण या साधुना सिद्धिरालिङ्ग्यते सज्जनैः साधुना ॥ १॥ क्वापि कस्मादपीषन्नदासादरं यान्त्विति त्यक्तनिद्रं सदासादरं । तिष्ठते या कलौ सानुकम्पाऽवनौ श्यामलाहं तदङ्घी भजे पावनौ ॥ २॥ विठ्ठलाख्या भवाब्धौ तरिः पारदा यां श्रिता वज्रवेदेन्दुभृन्नारदाः । स्थापयामास सद्धार्मिकः कोऽपि तां चेतसैवाश्रये साधुभिर्गोपिताम् ॥ ३॥ पाणिपद्मद्वयन्यासराजत्कटिं श्यामलां कोमलां पीतविद्युत्पटीम् । साधुभिर्नृत्यमानामुदारां नटीं सम्पिबामोद्भुताङ्गीं सुधाया घटीम् ॥ ४॥ गाढमालिङ्ग्यते या सदा पापिभी रम्यरूपा यया नेक्ष्यते कापि भीः । स्वैर्गुणैर्मुग्धगीतैः सदा मोहितां तां विशङ्कं स्वमातुर्वदामो हिताम् ॥ ५॥ मय्यपत्ये स्वकर्मालसेऽलं क्रुधा चिन्तया साधुभिस्ताम्यते कीं मुधा । भीमरथ्यास्तटे स्वर्ग्यलभ्या बुधा भो मया पीयते साधुलब्धा सुधा ॥ ६॥ तापपापौषधं साधु यन्नाम या सन्मुखाच्च श्रुता सुप्रसन्नाभया । बल्लवीनां सखीं देवतादेवतां चिन्तये चित्तमेत्युस्सवादेव ताम् ॥ ७॥ त्यक्तसिंहासनाः साधवः केवलं प्राप्तुकामा हि यत्पादपांसुं दरीम् । ईयुरेवोत्सुकाः को न तो चिन्तयेन्निर्जितस्वर्गसत्पादपां सुन्दरीम् ॥ ८॥ को न तां चिन्तयेच्छुद्धिकामः कलौ यत्पदाम्भोजनिर्णेजनापां ततिः । साधुनीराजिता साधुनीराऽजिता सा धुनी राजिता शम्भुमौलावपि ॥ ९॥ सिद्धिरत्युत्तमा योग्यलभ्याऽसतस्त्रासदेवावरान्नित्यमभ्यासतः । पुण्डरीकेण या साधुनीराऽजिता भक्तवृन्दैः कलौ साधुनारं जिता ॥ १०॥ जीवनेनाप्यहोधीष्टकं तर्पितो भीमरथ्यास्तटे पुण्डरीकेण यः । श्यामलः कोऽपि दीपः पतङ्गप्रियः श्लिष्यतां तापहा निर्मलः स्नेहकृत् ॥ ११॥ ॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं पाण्डुरङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और वारकरी परंपरा

श्री पाण्डुरङ्ग स्तोत्रम् (Panduranga Stotram) की रचना रामनन्दन मयूरेश्वर (Ramanandana Mayureshwara) द्वारा की गई है। यह स्तोत्र महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तीर्थ पंढरपुर (Pandharpur) में विराजमान भगवान विट्ठल (पाण्डुरंग) की दिव्य स्तुति है। वारकरी संप्रदाय (Varkari Sampradaya) में भगवान विट्ठल को भगवान कृष्ण का ही बाल स्वरूप माना जाता है। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच के उस प्रेम का वर्णन है जिसके कारण भगवान वैकुण्ठ छोड़कर अपने भक्त पुण्डरीक (Pundalik) के द्वार पर खड़े हो गए।

पौराणिक कथा: भक्त पुण्डरीक और ईंट (Brick)

इस स्तोत्र की पृष्ठभूमि में एक मार्मिक कथा है। भक्त पुण्डरीक अपने माता-पिता की सेवा में लीन थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए। पुण्डरीक सेवा में व्यस्त थे, इसलिए उन्होंने भगवान के खड़े रहने के लिए एक ईंट (Brick) फेंक दी। भगवान उस ईंट पर खड़े हो गए और आज भी उसी रूप में 'विट्ठल' (जो ईंट पर खड़ा है) के नाम से पूजे जाते हैं।
  • भीमरथी तट (Bhimarathi River): पहले श्लोक में 'भीमरथ्यास्तटे' का उल्लेख है, जो चंद्रभागा नदी (Bhima river) को दर्शाता है, जिसके किनारे यह पवित्र धाम स्थित है।
  • कटी-न्यास (Hands on Waist): चौथे श्लोक में "पाणिपद्मद्वयन्यासराजत्कटिं" कहा गया है। भगवान ने अपने दोनों हाथ कमर पर रखे हैं, जो यह दर्शाता है कि "संसार सागर (Ocean of Samsara) मेरे भक्तों के लिए केवल कमर तक गहरा है, वे इसे आसानी से पार कर लेंगे।"

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
  • पाप नाश (Destruction of Sins): स्तोत्र में कहा गया है—"गाढमालिङ्ग्यते या सदा पापिभी"। भगवान पाण्डुरंग पापियों को भी गले लगाते हैं और उनके पापों का नाश कर देते हैं।
  • अकाल मृत्यु से रक्षा: विट्ठल भगवान को 'कालजित' भी माना जाता है। उनकी भक्ति से यम का भय समाप्त होता है।
  • परम शांति और मोक्ष: यह स्तोत्र मन की चंचलता को समाप्त कर 'परमानन्द' की स्थिति प्रदान करता है। इसे 'भवसागर की नौका' (भवाब्धौ तरिः) कहा गया है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी (Ashadhi & Kartiki Ekadashi): ये दो दिन भगवान विट्ठल की उपासना के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। इन दिनों इस स्तोत्र का पाठ अनंत पुण्य देता है।
  • गुरुवार (Thursday): सामान्य दिनों में गुरुवार को तुलसी दल (Tulsi leaves) भगवान को अर्पित करके इस स्तोत्र का पाठ करें।
  • पाठ करते समय भगवान के उस स्वरूप का ध्यान करें जिसमें वे ईंट पर सम-चरण (दोनों पैर बराबर) रखकर खड़े हैं और उनके चेहरे पर मंद मुस्कान है।