नवरत्नमाला (श्यामलानवरत्नमालिका)

नवरत्नमाला अथवा श्यामलानवरत्नमालिकास्तोत्रम्
कालिदासविरचितम् मातङ्गीस्तोत्रं च — ओङ्कारपञ्जरशुकीमुपनिषदुद्यानकेलिकलकण्ठीम् आगमविपिनमयूरीमार्यामन्तर्विभावये गौरीम् ॥ १॥ दयमानदीर्घनयनां देशिकरूपेण दर्शिताभ्युदयाम् वामकुचनिहितवीणां वरदां सङ्गीतमातृकां वन्दे ॥ २॥ श्यामलिमसौकुमार्यां सौन्दर्यानन्दसम्पदुन्मेषाम् तरुणिमकरुणापूरां मदजलकल्लोललोचनां वन्दे ॥ ३॥ नखमुखमुखरितवीणानादरसास्वादनवनवोल्लासम् मुखमम्ब मोदयतु मां मुक्ताताटङ्कमुग्धहसितं ते ॥ ४॥ सरिगमपधनिरतां तां वीणासङ्क्रान्तकान्तहस्तां ताम् शान्तां मृदुलस्वान्तां कुचभरतान्तां नमामि शिवकान्ताम् ॥ ५॥ अवटुतटघटितचूलीताडिततालीपलाशताटङ्काम् वीणावादनवेलाऽकम्पितशिरसां नमामि मातङ्गीम् ॥ ६॥ वीणारवानुषङ्गं विकचमुखाम्भोजमाधुरीभृङ्गम् करुणापूरतरङ्गं कलये मातङ्गकन्यकापाङ्गम् ॥ ७॥ मणिभङ्गमेचकाङ्गीं मातङ्गीं नौमि सिद्धमातङ्गीम् यौवनवनसारङ्गीं सङ्गीताम्भोरुहानुभवभृङ्गीम् ॥ ८॥ मेचकमासेचनकं मिथ्यादृष्टान्तमध्यभागं ते मातस्वरूपमनिशं मङ्गलसङ्गीतसौरभं वन्दे ॥ ९॥ नवरत्नमाल्यमेतद् रचितं मातङ्गकन्यकाभरणम् यः पठति भक्तियुक्तः सः भवेत् वागीश्वरः भवेत् साक्षात् ॥ ॥ इति कविकालिदासविरचितं नवरत्नमाला अथवा श्यामलानवरत्नमालिकास्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और रचयिता
नवरत्नमाला (Navaratnamala), जिसे श्यामलानवरत्नमालिका और मातंगी स्तोत्र के नाम से भी जाना जाता है, संस्कृत साहित्य के मुकुटमणि महाकवि कालिदास (Kalidasa) की एक दिव्य रचना है। कालिदास, जिन्हें देवी की कृपा से ही कवित्व प्राप्त हुआ था, ने इस स्तोत्र में माँ श्यामला (Goddess Shyamala/Matangi) की स्तुति की है। मातंगी दस महाविद्याओं में से एक हैं और उन्हें 'तांत्रिक सरस्वती' भी कहा जाता है। यह स्तोत्र 'नवरत्न' इसलिए कहलाता है क्योंकि इसमें नौ मुख्य श्लोक हैं, जो नौ रत्नों की माला के समान देवी को अर्पित किए गए हैं। यह संगीत (Music), वाणी (Speech) और कला (Arts) की अधिष्ठात्री देवी की सबसे मधुर प्रार्थना है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Spiritual Meaning)
कालिदास ने इसमें देवी के सौंदर्य और शक्तियों का अदभुत वर्णन किया है:
- ओंकार पञ्जर शुकीम् (Parrot in Omkara Cage): पहले ही श्लोक में देवी को "ॐ" रूपी पिंजरे में रहने वाली "शुक" (तोता) कहा गया है। इसका अर्थ है कि देवी प्रणव (Om) के भीतर चैतन्य शक्ति के रूप में विराजमान हैं और वे ही वेद-उपनिषदों का सार बोलती हैं।
- संगीत मातृका (Mother of Music): श्लोक ५ में उन्हें "सरिगमपधनिरतां" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सात स्वरों (Sa-Re-Ga-Ma-Pa-Dha-Ni) में लीन हैं। वे "वीणा संक्रांत कांत हस्तां" हैं—जिनके हाथों में वीणा सुशोभित है।
- श्याम वर्ण (Dark Complexion): उनका रंग पन्ना (Emerald) या नीलमणि (Sapphire) की तरह गहरा हरा/श्याम है (मणिभङ्गमेचकाङ्गीं), जो ज्ञान की गहराई और अनंतता का प्रतीक है।
फलश्रुति और लाभ (Benefits)
अंतिम श्लोक में इस स्तोत्र का फल बताया गया है: "सः भवेत् वागीश्वरः भवेत् साक्षात्" (वह साक्षात् वाणी का स्वामी बन जाता है)। इसके अन्य लाभ हैं:
- वाक सिद्धि (Eloquence): जो व्यक्ति हकलाते हैं या जिन्हें अपनी बात कहने में संकोच होता है, उन्हें इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे वाणी में ओज और प्रभाव आता है।
- कला और संगीत में निपुणता: संगीतकारों, गायकों और कलाकारों के लिए यह स्तोत्र वरदान है। यह रचनात्मकता (creativity) और सुर-ताल का ज्ञान बढ़ाता है।
- विद्या प्राप्ति (Success in Studies): छात्रों के लिए, विशेषकर उच्च शिक्षा और शोध (research) में लगे विद्यार्थियों के लिए, यह स्तोत्र स्मरण शक्ति और बुद्धि को तीव्र करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय
- नवरात्रि (Navratri) और वसंत पंचमी (Vasant Panchami) के दिन इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- शुक्रवार (Friday) को देवी श्यामला का विशेष दिन माना जाता है।
- स्नान के बाद, हरे या नीले वस्त्र धारण करें (क्योंकि देवी श्यामला हैं)।
- यदि आप संगीत सीखते हैं, तो अपने वाद्य यंत्र (Instrument) के सामने बैठकर इसका पाठ करें।
- यह स्तोत्र केवल 10 श्लोकों का है, इसलिए इसे नित्य पूजा में शामिल करना बहुत आसान और लाभकारी है।