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नवग्रह स्तोत्रम् (वादिराज यति कृत)

Navagraha Stotram by Vadiraja Yati — Powerful 5-Verse Hymn

नवग्रह स्तोत्रम् (वादिराज यति कृत)
॥ नवग्रहस्तोत्रम् (वादिराजयतिविरचित) ॥ १. सूर्य, चन्द्र, मङ्गल और बुध (Surya, Chandra, Mangala, Budha) भास्वान्मे भासयेत् तत्त्वं चन्द्रश्चाह्लादकृद्भवेत् । मङ्गलो मङ्गलं दद्यात् बुधश्च बुधतां दिशेत् ॥ १॥ २. गुरु, शुक्र, शनि और केतु (Guru, Shukra, Shani, Ketu) गुरुर्मे गुरुतां दद्यात् कविश्च कवितां दिशेत् । शनिश्च शं प्रापयतु केतुः केतुं जयेऽर्पयेत् ॥ २॥ ३. राहु और सामूहिक प्रार्थना (Rahu & Collective Prayer) राहुर्मे राहयेद्रोगं ग्रहाः सन्तु करग्रहाः । नवं नवं ममैश्वर्यं दिशन्त्वेते नवग्रहाः ॥ ३॥ ४. विशेष शनि प्रार्थना (Special Prayer to Shani) शने दिनमणेः सूनो ह्यनेकगुणसन्मणे । अरिष्टं हर मेऽभीष्टं कुरु मा कुरु सङ्कटम् ॥ ४॥ ५. फलश्रुति (Benefits/Phalashruti) हरेरनुग्रहार्थाय शत्रुणां निग्रहाय च । वादिराजयतिप्रोक्तं ग्रहस्तोत्रं सदा पठेत् ॥ ५॥ ॥ इति श्रीवादिराजयतिविरचितं नवग्रहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

नवग्रह स्तोत्रम् (वादिराज यति कृत) — परिचय

श्री वादिराज तीर्थ (Sri Vadiraja Tirtha) दक्षिण भारत के उडुपी अष्टमठ परंपरा के एक महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। 16वीं शताब्दी में रचित उनका यह नवग्रह स्तोत्रम् अपनी सरलता और प्रभावशीलता के लिए प्रसिद्ध है। इसे "पञ्च-श्लोकी नवग्रह स्तोत्र" भी कहा जाता है क्योंकि इसमें केवल 5 श्लोकों के भीतर नौ ग्रहों की शांति, शनि की विशेष प्रार्थना और फलश्रुति को समाहित कर लिया गया है।

अन्य नवग्रह स्तोत्रों में जहाँ ग्रहों के रंग, रूप और वाहन का वर्णन होता है, वहीं वादिराज यति ने इस स्तोत्र में "शब्द-चमत्कार" (Wordplay) और "क्रियात्मक लाभ" (Functional Benefits) पर जोर दिया है। उन्होंने बहुत ही चतुराई से ग्रहों के नाम का उपयोग करके ही उनसे मिलने वाले फलों की मांग की है। उदाहरण के लिए—'भास्वान्' (सूर्य) से 'भासयेत्' (प्रकाशित करें) और 'बुध' से 'बुधतां' (बुद्धिमत्ता) की प्रार्थना।

यह स्तोत्र माध्व संप्रदाय (Madhwa Tradition) और वैष्णव परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है क्योंकि इसका अंतिम लक्ष्य ग्रहों के माध्यम से भगवान हरि (विष्णु) की प्रसन्नता प्राप्त करना है। यह मानता है कि ग्रह स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि भगवान के सेवक हैं और हरि की आज्ञा से ही फल देते हैं।

इस स्तोत्र की विशिष्टता और अर्थ (Significance & Meaning)

इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में एक विशेष आध्यात्मिक और भौतिक संदेश छिपा है:

  • शब्द शक्ति और सकारात्मकता: श्लोक 1 और 2 में ऋणात्मकता को हटाने के बजाय सीधे सकारात्मक गुणों की मांग की गई है।
    • 'गुरुर्मे गुरुतां दद्यात्' — गुरु मुझे भारीपन (Gravitas/महत्व) प्रदान करें।
    • 'कविश्च कवितां दिशेत्' — कवि (शुक्र) मुझे काव्य शक्ति और रचनात्मकता दें।
    • 'केतुः केतुं जयेऽर्पयेत्' — केतु (ध्वज) मुझे जीत का झंडा (Victory Flag) प्रदान करें।
  • रोग मुक्ति का अनोखा उपाय (श्लोक 3): "राहुर्मे राहयेद्रोगं" — यहाँ 'राहयेत्' का अर्थ है 'त्याग देना' या 'छोड़ देना'। साधक प्रार्थना करता है कि राहु मेरे शरीर से रोग को निकाल दें। साथ ही, "नवं नवं ममैश्वर्यं" — ग्रह मुझे नित्य नया (Ever-new) ऐश्वर्य प्रदान करें। यहाँ 'नव' का अर्थ 9 भी है और नया भी।
  • शनि शांति (श्लोक 4): यह श्लोक विशेष रूप से शनिदेव के लिए है। वादिराज यति शनि को "अनेकगुणसन्मणे" (अनेक गुणों वाले श्रेष्ठ मणि) कहकर पुकारते हैं, जो शनि की स्तुति का एक दुर्लभ और प्रेमपूर्ण तरीका है। वे शनि से 'संकट' न देने की प्रार्थना करते हैं।
  • शत्रु निग्रह और हरि कृपा (श्लोक 5): यह इस स्तोत्र की कुंजी है। इसका पाठ केवल ग्रह शांति के लिए नहीं, बल्कि 'शत्रुणां निग्रहाय' (शत्रुओं को रोकने) और 'हरेरनुग्रहार्थाय' (भगवान विष्णु की कृपा) के लिए किया जाता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

चूंकि यह एक वैष्णव संत द्वारा रचित स्तोत्र है, इसकी पाठ विधि सात्विक होनी चाहिए:

  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद, या संध्या वंदन के समय। विशेष संकट के समय इसे दिन में कभी भी 9 बार पढ़ा जा सकता है।
  • दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करें।
  • विष्णु स्मरण: पाठ शुरू करने से पहले भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का ध्यान करें, क्योंकि वादिराज यति के अनुसार ग्रहों के नियंत्रक भगवान हरि ही हैं।
  • तुलसी अर्पण: यदि संभव हो, तो पाठ से पूर्व भगवान को तुलसी दल अर्पित करें। यह नवग्रहों को भी संतुष्ट करता है (विशेषकर बुध और गुरु को)।
  • संकल्प: मन में संकल्प लें—"हे प्रभु हरि! आपकी प्रसन्नता और नवग्रहों के अनुकूलन हेतु मैं इस स्तोत्र का पाठ कर रहा हूँ।"

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  • 1. वादिराज यति कृत नवग्रह स्तोत्र क्या है? यह श्री वादिराज तीर्थ (माध्व संप्रदाय के महान संत) द्वारा रचित 5 श्लोकों का एक अत्यंत प्रभावशाली लघु स्तोत्र है। इसमें नवग्रहों से प्रार्थना की गई है कि वे अपने-अपने विशिष्ट गुण (जैसे सूर्य से तत्व ज्ञान, केतु से विजय) साधक को प्रदान करें।

  • 2. यह स्तोत्र अन्य नवग्रह स्तोत्रों से कैसे अलग है? जहाँ अन्य स्तोत्र भय और शांति पर केंद्रित हैं, यह स्तोत्र 'सकारात्मक प्राप्ति' पर केंद्रित है। यह संक्षिप्त है, याद करने में आसान है और ग्रहों को भगवान विष्णु के सेवक के रूप में देखता है, जिससे यह भक्तिमय अधिक है।

  • 3. श्लोक 3 में 'नवं नवं ममैश्वर्यं' का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है—'ये नवग्रह मुझे नित नई (New and Ever-growing) समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करें।' यहाँ कवि ने 'नव' शब्द का सुंदर प्रयोग किया है जो ग्रहों की संख्या (9) और 'नवीनता' (Newness) दोनों का प्रतीक है।

  • 4. क्या यह रोगों को दूर करने में सहायक है? हाँ, तीसरे श्लोक में स्पष्ट कहा गया है—'राहुर्मे राहयेद्रोगं' अर्थात् राहु मेरे रोगों को त्याग दे (मुझसे दूर कर दे)। राहु को अक्सर असाध्य रोगों का कारक माना जाता है, इसलिए स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए यह पंक्ति बहुत प्रभावी है।

  • 5. शनि की साढ़ेसाती के लिए इसमें क्या उपाय है? चौथा श्लोक विशेष रूप से शनिदेव को समर्पित है। इसमें शनि को 'दिनमणेः सूनो' (सूर्य पुत्र) और 'सन्मणे' (श्रेष्ठ मणि) कहते हुए प्रार्थना की गई है कि 'हे शनि! मेरा अरिष्ट (दुर्भाग्य) हर लो, मेरी इच्छाएं पूर्ण करो और मुझे संकट मत दो।'

  • 6. इस स्तोत्र के रचयिता श्री वादिराज तीर्थ कौन थे? श्री वादिराज तीर्थ (1480–1600 ई.) द्वैत वेदांत परंपरा के एक प्रमुख संत, कवि और दार्शनिक थे। उन्हें 'सोडे मठ' के यति और भगवान हयग्रीव का अनन्य भक्त माना जाता है। उनकी रचनाएं संस्कृत साहित्य और भक्ति का अद्भुत संगम हैं।

  • 7. क्या इसके पाठ से शत्रु बाधा दूर होती है? हाँ, 5वें श्लोक (फलश्रुति) में लिखा है 'शत्रुणां निग्रहाय च' — अर्थात शत्रुओं के दमन और नियंत्रण के लिए इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह बाहरी शत्रुओं के साथ-साथ आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध) का भी नाश करता है।

  • 8. इसे पढ़ने का सही समय क्या है? चूंकि यह बहुत छोटा है, इसे नित्य प्रातःकाल पूजा के समय पढ़ा जा सकता है। यात्रा शुरू करने से पहले या किसी महत्वपूर्ण कार्य (जैसे परीक्षा या इंटरव्यू) से पहले इसका पाठ तुरंत आत्मविश्वास देता है।

  • 9. क्या विद्यार्थी इसका पाठ कर सकते हैं? अवश्य। विद्यार्थियों के लिए यह सर्वोत्तम है क्योंकि पहले श्लोक में 'बुधश्च बुधतां दिशेत्' (बुध बुद्धिमत्ता दें) और दूसरे में 'कविश्च कवितां दिशेत्' (शुक्र काव्य/रचनात्मक शक्ति दें) की प्रार्थना है।

  • 10. इस स्तोत्र का मूल मंत्र क्या है? इसका मूल भाव यह है कि सभी ग्रह भगवान हरि (विष्णु) के अधीन हैं। 5वें श्लोक में कहा गया है कि 'हरेरनुग्रहार्थाय' — हरि की कृपा पाने के लिए इसका पाठ करें। जब हरि प्रसन्न होते हैं, तो ग्रह स्वतः शांत और अनुकूल हो जाते हैं।