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नारदकृतं नारायणस्तोत्रम्

नारदकृतं नारायणस्तोत्रम्

नारद उवाच

नमो नमस्ते भगवञ्जगद्गुरो नारायणाऽप्राकृत दिव्यमूर्ते । अनन्तकल्याणगुणाकरस्त्वं दासे मयि प्रीततरः सदा स्याः ॥ ९.३१.१०॥ त्वं वासुदेवोऽसि जगन्निवासः क्षेमाय लोकस्य तपः करोषि । योगेश्वरेशोपशमस्थ आत्मारामाधिपस्त्वं परहंससद्गुरुः ॥ ११॥ विभुरृषीणामृषभोऽक्षरात्मा जीवेश्वराणां च नियामकोऽसि । साक्षी महापूरुष आत्मतन्त्रः कालोऽभवद्यद्भ्रुकुटेर्महांश्च ॥ १२॥ सर्गादिलीला जगतां त्वमीश करोषि मायापुरुषात्मनैव । तथाप्यकर्त्ता ननु निर्गुणोऽसि भूमा परब्रह्म परात्परश्च ॥ १३॥ सत्यः स्वयञ्ज्योतिरतर्क्यशक्तिस्त्वं ब्रह्मभूतात्मविचिन्त्यमूर्त्तिः । बृहद्व्रताचार्य महामुनीन्द्र कन्दर्पदर्पापहरप्रताप ॥ १४॥ तपस्विनां ये रिपवः प्रसिद्धाः क्रोधो रसो मत्सरलोभमुख्याः । अप्याश्रमं तेऽपि कदापि वेष्टुं नेमं क्षमा ह्येष तव प्रतापः ॥ १५॥ छन्दोमयो ज्ञानमयोऽमृताध्वा धर्मात्मको धर्मसर्गाभिपोष्टा । उन्मूलिताधर्मसर्गो महात्मा त्वमव्ययश्चाक्षयोऽव्यक्तबन्धुः ॥ १६॥ निर्दोषरूपस्य तवाऽखिलाः क्रिया भवन्ति वै निर्गुणा निर्गुणस्य । धर्मार्थकामेप्सुभिरर्चनीयस्त्वमीश्वरो नाथ मुमुक्षुभिश्च ॥ १७॥ त्वं कालमायायमसंसृतिभ्यो महाभयात्पातुमेकः समर्थः । भक्तापराधाननवेक्षमाणो महादयालुः किल भक्तवत्सलः ॥ १८॥ धृतावतारस्य हि नाममात्रं रूपं च वा यः स्मरेदन्तकाले । सोऽपि प्रभो घोरमहाघसङ्घात्सद्यो विमुक्तो दिवमाशु याति ॥ १९॥ तं त्वां विहायाऽत्र तु यो मनुष्यो देहे त्रिधातावपि दैहिकेषु । जायाऽऽत्मजज्ञातिधनेषु सज्जते स मायया वञ्चित एव मूढः ॥ ९.३१.२०॥ त्वद्भक्तियोग्यो नरदेह एव यं कामयन्तेऽपि च नाकसंस्थाः । त्वद्भक्तिहीनं हि दिवोऽपि सौख्यमहं तु जाने नरकेण तुल्यम् ॥ २१॥ तपस्त्रिलोक्याः कुरुषे सुखाय तत्रापि ते भारतवासिपुंसु । अनुग्रहो भूरितरो यदत्र कृतावतारो विचरन्विराजसे ॥ २२॥ तस्याश्रयं ये तव नात्र कुर्वते त एव शास्त्रेषु मताः कृतघ्नाः । अतस्तवैकाश्रयमेव बाढं कुर्वत्यजस्रं मयि तेऽस्तु तुष्टिः ॥ २३॥ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे वैष्णवखण्डे वासुदेवमासमाहात्म्ये एकत्रिंशाध्यायान्तर्गतं नारदकृतं नारायणस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और पौराणिक संदर्भ

नारदकृतं नारायणस्तोत्रम् (Narada Kritam Narayana Stotram) का उल्लेख स्कन्दपुराण (Skanda Purana) के वैष्णवखण्ड के अंतर्गत वासुदेवमासमाहात्म्य (अध्याय ३१) में मिलता है। यह स्तुति देवर्षि नारद (Narada Muni) द्वारा भगवान नारायण (Narayana) के प्रति की गई है, जो बदरिकाश्रम में लोक-कल्याण के लिए तपस्यारत हैं। नारद जी, जो भक्ति के आचार्य माने जाते हैं, इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान के जगद्गुरु (Jagadguru) और परमहंस सद्गुरु (Paramahansa Sadguru) स्वरूप की वंदना करते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भगवान केवल सृष्टि के रचयिता ही नहीं, बल्कि जीवात्मा के परम लक्ष्य भी हैं।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)

नारद जी ने इस स्तोत्र में भगवान के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों का अद्भुत समन्वय किया है:
  • अव्यक्त बंधु और साझी (Witness & Friend): श्लोक १२ और १६ में भगवान को 'साक्षी', 'आत्मतन्त्र' और 'अव्यक्तबन्धु' कहा गया है। वे हमारे भीतर बैठकर हमारे हर कर्म को देखते हैं और बिना किसी शर्त के हमारे मित्र (Friend of the Unmanifest) बने रहते हैं।
  • कामदेव के विजेता (Conqueror of Lust): श्लोक १४ में उन्हें 'कन्दर्पदर्पापहरप्रताप' कहा गया है, अर्थात जिन्होंने कामदेव (Cupid) के घमंड को चूर कर दिया। यह नर-नारायण अवतार की उस लीला का संकेत है जहाँ उन्होंने कामदेव की रंभा-मेनका आदि अप्सराओं को अपनी जांघ से उर्वशी उत्पन्न करके लज्जित कर दिया था।
  • मनुष्य जन्म की दुर्लभता: श्लोक २१ में एक क्रांतिकारी विचार है—"त्वद्भक्तियोग्यो नरदेह एव"। नारद जी कहते हैं कि देवता भी मनुष्य शरीर की कामना करते हैं, क्योंकि केवल इसी शरीर में भक्ति (Bhakti) संभव है। भक्तिहीन स्वर्ग का सुख भी नरक के समान है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों को लोक और परलोक दोनों में कल्याण प्राप्त होता है:
  • मोक्ष और सद्गति (Liberation): श्लोक १९ में स्पष्ट कहा गया है कि जो अंत समय में (time of death) भगवान के नाम या रूप का स्मरण करता है, वह घोर पापों से मुक्त होकर तत्काल परमधाम को प्राप्त होता है।
  • भय और काल से रक्षा (Protection from Fear & Time): भगवान को 'कालमायायमसंसृतिभ्यो... पातुमेकः समर्थः' कहा गया है। वे काल (Time), माया (Illusion) और यम (Death) के भय से बचाने वाले एकमात्र रक्षक हैं।
  • अपराध क्षमा (Forgiveness): वे 'भक्तापराधाननवेक्षमाणो' हैं—अर्थात वे अपने भक्तों के अपराधों और गलतियों की ओर ध्यान नहीं देते और महादयालु बने रहते हैं। यह पापबोध (guilt) से ग्रस्त लोगों के लिए आशा की किरण है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • एकादशी (Ekadashi) और पूर्णिमा (Purnima) के दिन इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है।
  • प्रातःकाल स्नान के बाद, भगवान विष्णु या शालिग्राम जी के सामने बैठकर तुलसी दल अर्पित करें।
  • यदि जीवन में मृत्यु का भय, अज्ञात भय या घोर संकट हो, तो इस स्तोत्र का नियमित पाठ (विशेषकर श्लोक १८ और १९) 'रक्षा कवच' का कार्य करता है।
  • जो लोग भक्ति मार्ग में आगे बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह नित्य पाठ करने योग्य है।