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मृत्युञ्जय स्तोत्रम् (नरसिंह पुराण)

मृत्युञ्जय स्तोत्रम् (नरसिंह पुराण)

मृत्युञ्जयस्तोत्रम् (नरसिंह पुराणे)

मार्कण्डेय उवाच - नमोऽस्तु ते देवदेव महाचित्त महाकाय महाप्राज्ञ महादेव महाकीर्ते । ब्रह्मेन्द्रचन्द्ररुद्रार्चित पादयुगल श्रीपद्महस्त सम्मर्दितदैत्यदेह ॥ ३३॥ अनन्तभोगशयनार्पितसर्वाङ्ग सनकसनन्दनसनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्नासाग्रन्यस्तलोचनैरनवरतमभिचिन्तितमोक्षतत्त्व । गन्धर्वविद्याधरयक्षकिन्नरकिम्पुरुषैरहरहोगीयमानदिव्ययशः ॥ ३४॥ नृसिंह नारायण पद्मनाभ गोविन्द गोवर्धनगुहानिवास योगीश्वर । योगधर देवेश्वर जलेश्वर महेश्वर ॥ ३५॥ योगधर महामायाधर विद्याधर यशोधर कीर्तिधर त्रिगुणनिवास । त्रितत्त्वधर त्रेताग्निधर ॥ ३६॥ त्रिवेदभाक् त्रिनिकेत त्रिसुपर्ण त्रिदण्डधर ॥ ३७॥ स्निग्धमेघाभार्चितद्युतिविराजित पीताम्बरधर किरीटकटककेयूरहारमणिरत्नांशुदीप्तिविद्योतितसर्वदिश ॥ ३८॥ कनकमणिकुण्डलमण्डितगण्डस्थल मधुसूदन विश्वमूर्ते ॥ ३९॥ लोकनाथ यज्ञेश्वर यज्ञप्रिय तेजोमय भक्तिप्रिय वासुदेव । दुरितापहाराराध्य पुरुषोत्तम नमोऽस्तु ते ॥ ४०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरित्रे दशमोऽध्यायः ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम

यह मृत्युञ्जय स्तोत्रम् सामान्यतः प्रचलित शिव मृत्युंजय स्तोत्र से भिन्न है। यह नरसिंह पुराण (Narasimha Purana) के 10वें अध्याय से लिया गया है। इस स्तोत्र के रचयिता मार्कण्डेय ऋषि (Sage Markandeya) हैं। मार्कण्डेय जी, जिन्हें शिव भक्ति के लिए जाना जाता है, यहाँ भगवान विष्णु (Vishnu) के विराट और रक्षक स्वरूप की स्तुति कर रहे हैं। वे भगवान को 'महादेव', 'महाचित्त' और 'महाकाय' कहकर संबोधित करते हैं, जो दर्शाता है कि वैष्णव परंपरा में विष्णु ही मृत्यु को जीतने वाले (Death Conqueror) परमेश्वर हैं।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Spiritual Meaning)

  • विष्णु का मृत्युंजय स्वरूप: आमतौर पर 'मृत्युंजय' शब्द भगवान शिव से जुड़ा है। लेकिन इस स्तोत्र में मार्कण्डेय जी कहते हैं कि जो भगवान अनंत शेषनाग (Ananta Shesha) की शैया पर शयन करते हैं और जिनका ध्यान सनक-सनन्दन आदि ऋषि करते हैं, वे ही सच्चे मृत्युंजय हैं। वे नृसिंह, नारायण और गोविन्द नामों से पूजे जाते हैं।
  • त्रितत्व और त्रिगुण: श्लोक 36 में भगवान को 'त्रितत्त्वधर' और 'त्रिगुणनिवास' कहा गया है। इसका अर्थ है कि सत्व, रज और तम—तीनों गुण उन्हीं के आश्रय में हैं और वे ही सृष्टि, स्थिति और लय (Creation, Preservation, Destruction) के मूल कारण हैं।
  • यज्ञ और योग के स्वामी: भगवान को 'यज्ञेश्वर' (Lord of Sacrifices) और 'योगेश्वर' (Lord of Yoga) कहा गया है। यह दर्शाता है कि कर्मकांड और ध्यान मार्ग, दोनों का अंतिम लक्ष्य भगवान विष्णु ही हैं।

फलश्रुति और लाभ (Benefits)

मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित इस स्तुति का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • अकाल मृत्यु से रक्षा (Protection from Untimely Death): जैसे मार्कण्डेय जी ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की, वैसे ही इस स्तोत्र का पाठ साधक को दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करता है।
  • आरोग्य और शांति (Health and Peace): भगवान 'मधुसूदन' और 'दुरातापहार' (दुखों को हरने वाले) हैं। इसके पाठ से शारीरिक और मानसिक कष्ट दूर होते हैं।
  • मोक्ष की प्राप्ति (Liberation): श्लोक 34 में कहा गया है कि योगी जन मोक्ष तत्व की प्राप्ति के लिए निरंतर इनका ध्यान करते हैं। यह स्तोत्र जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला है।

पाठ करने की विधि

  • समय: प्रातः काल (Morning) या संध्या वंदन के समय इसका पाठ करना उत्तम है। विशेष रूप से एकादशी (Ekadashi), नरसिंह जयंती, या शनिवार को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
  • विधि: भगवान विष्णु या नरसिंह के चित्र के सामने दीपक जलाएं। तुलसी दल अर्पित करें और पूर्ण श्रद्धा के साथ इस अष्टकम (8 श्लोकों) का पाठ करें।
  • जो लोग बीमार हैं या मृत्यु भय से ग्रस्त हैं, उनके लिए इस स्तोत्र का नियमित श्रवण और पठन एक 'रामबाण' उपाय है।