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सत्यव्रत राजा कृतं मत्स्य स्तोत्रम्

सत्यव्रत राजा कृतं मत्स्य स्तोत्रम्

राजोवाच ।

अनाद्यविद्योपहतात्मसंविद- स्तन्मूलसंसारपरिश्रमातुराः । यदृच्छयेहोपसृता यमाप्नुयु- र्विमुक्तिदो नः परमो गुरुर्भवान् ॥ ४६॥ जनोऽबुधोऽयं निजकर्मबन्धनः सुखेच्छया कर्म समीहतेऽसुखम् । यत्सेवया तां विधुनोत्यसन्मतिं ग्रन्थिं स भिन्द्याद्धृदयं स नो गुरुः ॥ ४७॥ यत्सेवयाग्नेरिव रुद्ररोदनं पुमान् विजह्यान्मलमात्मनस्तमः । भजेत वर्णं निजमेष सोऽव्ययो भूयात्स ईशः परमो गुरोर्गुरुः ॥ ४८॥ न यत्प्रसादायुतभागलेश- मन्ये च देवा गुरवो जनाः स्वयम् । कर्तुं समेताः प्रभवन्ति पुंस- स्तमीश्वरं त्वां शरणं प्रपद्ये ॥ ४९॥ अचक्षुरन्धस्य यथाग्रणीः कृत- स्तथा जनस्याविदुषोऽबुधो गुरुः । त्वमर्कदृक्सर्वदृशां समीक्षणो वृतो गुरुर्नः स्वगतिं बुभुत्सताम् ॥ ५०॥ जनो जनस्यादिशतेऽसतीं मतिं यया प्रपद्येत दुरत्ययं तमः । त्वं त्वव्ययं ज्ञानममोघमञ्जसा प्रपद्यते येन जनो निजं पदम् ॥ ५१॥ त्वं सर्वलोकस्य सुहृत्प्रियेश्वरो ह्यात्मा गुरुर्ज्ञानमभीष्टसिद्धिः । तथापि लोको न भवन्तमन्धधी- र्जानाति सन्तं हृदि बद्धकामः ॥ ५२॥ तं त्वामहं देववरं वरेण्यं प्रपद्य ईशं प्रतिबोधनाय । छिन्ध्यर्थदीपैर्भगवन् वचोभि- र्ग्रन्थीन् हृदय्यान् विवृणु स्वमोकः ॥ ५३॥ ॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे अष्टमस्कन्धे चतुर्विंशाध्यायान्तर्गतं (सत्यव्रत) राज्ञा कृतं मत्स्यरूपी विष्णुस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

सत्यव्रत राजा कृतं मत्स्य स्तोत्रम्, श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कन्ध, अध्याय २४) से लिया गया एक अत्यंत दार्शनिक और महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसकी रचना द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत ने की थी, जो प्रलय के बाद इस कल्प में वैवस्वत मनु बने। इस स्तोत्र की अद्वितीयता इस बात में है कि यह भगवान की स्तुति के साथ-साथ उन्हें परम गुरु (Supreme Guru) के रूप में स्थापित करता है। राजा सत्यव्रत, जो स्वयं एक ज्ञानी राजा थे, भगवान के मत्स्य अवतार के समक्ष अपनी अज्ञानता को स्वीकार करते हैं और उन्हें अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्म-ज्ञान प्रदान करने वाले एकमात्र मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। यह स्तुति केवल भक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक और मोक्ष के लिए एक गहन प्रार्थना है।

पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)

यह स्तोत्र उस समय रचा गया जब सम्पूर्ण पृथ्वी एक भयानक प्रलय (the great deluge) में डूबने वाली थी। राजा सत्यव्रत कृतमाला नदी में तर्पण कर रहे थे, जब उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आ गई। राजा ने उसे वापस नदी में डालना चाहा, लेकिन मछली ने बड़े जीवों से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की। दयालु राजा उसे अपने कमंडल में ले आए। अगले ही दिन, मछली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल छोटा पड़ गया। राजा ने उसे एक बड़े पात्र में, फिर सरोवर में, और अंततः समुद्र में छोड़ा, लेकिन मछली का आकार बढ़ता ही गया। तब राजा सत्यव्रत समझ गए कि यह कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि स्वयं भगवान नारायण हैं। भगवान ने अपने मत्स्य अवतार (Matsya Avatar) रूप में प्रकट होकर राजा को आने वाले प्रलय के बारे में बताया और एक बड़ी नाव बनाने का आदेश दिया। उन्होंने सप्तर्षियों, औषधियों, और सभी जीवों के बीजों के साथ राजा को उस नाव में बैठने को कहा और प्रलय के अंत तक स्वयं उस नाव की रक्षा की। प्रलय समाप्त होने पर, राजा सत्यव्रत ने कृतज्ञता और ज्ञान की इच्छा से भगवान मत्स्य की यह स्तुति की।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

यह स्तोत्र अज्ञान में डूबे जीव की स्थिति और भगवान की गुरु रूप में कृपा का सुंदर वर्णन करता है:
  • अनादि अविद्या का बंधन (Bondage of Ignorance): पहले ही श्लोक में राजा कहते हैं, "अनाद्यविद्योपहतात्मसंविदः" - अनादि काल से अविद्या के कारण जीव अपने सच्चे आत्म-स्वरूप को भूल गया है और संसार के दुःखों में फंसा है। आपकी कृपा से ही उसे मुक्ति मिल सकती है।
  • कर्म का बंधन (Bondage of Karma): "जनोऽबुधोऽयं निजकर्मबन्धनः" - यह अज्ञानी जीव सुख की इच्छा से ऐसे कर्म करता है जो उसे और अधिक दुःख और बंधन में डालते हैं। आप ही वह गुरु हैं जो इस कर्म-ग्रंथि को काट सकते हैं।
  • भगवान ही परम प्रकाश हैं (The Lord as Supreme Light): "त्वमर्कदृक्सर्वदृशां समीक्षणो" - यह एक अद्भुत उपमा है। राजा कहते हैं, "जैसे नेत्रों को देखने की शक्ति सूर्य से मिलती है, वैसे ही सभी इंद्रियों और आत्माओं को देखने (जानने) की शक्ति आपसे ही मिलती है।" आप अज्ञान से अंधे लोगों के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हैं।
  • हृदय की ग्रंथियों को काटना (Cutting the Knots of the Heart): अंतिम श्लोक में प्रार्थना का सार है - "छिन्ध्यर्थदीपैर्भगवन् वचोभिर्ग्रन्थीन् हृदय्यान्" - हे भगवन्! आप अपने तत्वज्ञान से भरे वचनों से मेरे हृदय की अज्ञान की गांठों (knots of ignorance) को काट दीजिये और अपने परम धाम का मार्ग दिखाइए।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

यद्यपि इस स्तोत्र में कोई पारंपरिक फलश्रुति नहीं है, इसके पाठ के लाभ इसकी प्रार्थनाओं में ही निहित हैं:
  • ज्ञान और विवेक की प्राप्ति (Attainment of Knowledge and Wisdom): यह स्तोत्र ज्ञान (Jnana) और आत्म-बोध (Self-realization) के लिए की गई सर्वोच्च प्रार्थना है। इसके पाठ से बुद्धि निर्मल होती है।
  • अहंकार और अज्ञान का नाश (Destruction of Ego and Ignorance): भगवान को परम गुरु मानकर यह स्तुति करने से साधक का अहंकार कम होता है और अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट होता है।
  • सही मार्ग का दर्शन (Guidance on the Right Path): जो लोग जीवन में दिशाहीन महसूस करते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र भगवान से सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना है।
  • संसार-बंधन से मुक्ति (Liberation from Worldly Bondage): इस स्तोत्र का नियमित पाठ सांसारिक मोह और कर्म के बंधनों के प्रति जागरूकता लाता है और मोक्ष (Moksha) के मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद करता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • इस स्तोत्र का पाठ पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ करना चाहिए, स्वयं को राजा सत्यव्रत के स्थान पर रखकर।
  • विद्यार्थियों, शिक्षकों और ज्ञान के पथ पर चलने वाले साधकों के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से फलदायी है।
  • इसका पाठ प्रातःकाल, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त में, या संध्या के समय भगवान विष्णु की मूर्ति के समक्ष बैठकर करना उत्तम है।
  • एकादशी, पूर्णिमा और गुरुवार के दिन इसका पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • पाठ का उद्देश्य भौतिक कामनाओं से अधिक आत्म-ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होना चाहिए।