श्री मातङ्गी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्रीतामस उवाच ।
मातङ्गी शतनामानो-दानीं कलिमते शृणु । यस्य प्रसादा दीशोहं पार्वति प्राणवल्लभे ॥ १॥विनियोगः
अस्य श्रीमातङ्गी शतनामस्तोत्रस्य श्रीकृष्ण ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः श्रीमातङ्गी देवता चतुर्वर्ग सिद्धये विनियोगः ॥ ॐ माधवी मथुरा मत्ता माननीया मदोद्धता । मान्या च मानदात्री च मनीषा मानमोहिनी ॥ २॥ मथुरा माधवी मध्या मानसी मनमोहिनी । माधुरा मानयोग्या च मत्तमातङ्गगामिनी ॥ ३॥ मेनका मानवी मेधा मदना मदनोत्तरा । मत्ता प्रमत्ता मदना मोदना मदनोद्धता ॥ ४॥ माननी मानयोग्या च मेखला मरमोहिनी । मनोरूपा उन्मनी च माषामेधामदोद्धता ॥ ५॥ निमेषा निर्निमेषा च मानगी मथुरा तथा । मदमत्ता महामत्ता मानदा मधुसूदनी ॥ ६॥ मतिर्माता महालक्ष्मीर्नित्या मदनपीडिता । मेघविद्युत्प्रभाकाशा मेघानन्दप्रवर्द्धिनी ॥ ७॥ मदना मदरूपा च मुनिगुह्या मुनिस्तुता । अर्थरूपा महामेधा माया मत्ता स्वरूपिणी ॥ ८॥ मुकुन्दपूजिता मौनी मौनव्रतपरायणा । मेधा मेधावती मध्या मदना मदनातुरा ॥ ९॥ मानुषी च मनोरूपा महामोहस्वरूपिणी । तरणी तरुणी तारा तारिणी तरलेक्षणा ॥ १०॥ तुरोया च तथा तुथ्या तुल्या च तामसी तिथिः । तीर्थातीर्थ मयी तीर्थरूपिणी तामसान्तरा ॥ ११॥ तपस्या तापसी तापा तपना तुलना इति । गोलोकवासिनी गम्या गुणज्ञा गुणरूपिणी ॥ १२॥ गौरी च गोपिनी गौरा गानागानस्वरूपिणी । गिरीशा गिरिशा गन्धा गगणा गगणेश्वरी ॥ १३॥ ईकाररूपिणी नित्या ईश्वरी ईश्वरप्रिया । सङ्गृह्य इति ते देवि शतनाम इतीरितम् ॥ १४फलश्रुतिः
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य सिद्धिर्न संशयः ॥ १५॥ ॥ इति श्रीकालीविलासतन्त्रे श्रीमातङ्गीशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्री मातङ्गी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्, 'कालीविलास तंत्र' के सत्रहवें पटल से लिया गया एक अत्यंत गोपनीय और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र दशमहाविद्याओं (Dashamahavidya) में से नौवीं महाविद्या, देवी मातङ्गी के 108 पवित्र नामों की महिमा का वर्णन करता है। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसे स्वयं श्रीकृष्ण ने ऋषि के रूप में प्रकट किया है, जो इसे वैष्णव और शाक्त, दोनों परम्पराओं के लिए महत्वपूर्ण बनाता है। देवी मातङ्गी को "तान्त्रिक सरस्वती" के नाम से जाना जाता है। वे ज्ञान, संगीत, कला और विशेष रूप से वाक्-सिद्धि (power of speech) की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह स्तोत्र चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की सिद्धि के लिए एक अचूक साधन माना जाता है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
'शक्तिसंगम तंत्र' के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी, भगवान शिव और पार्वती से मिलने कैलाश गए। उन्होंने अपने साथ लाए हुए मिष्ठान्न उन्हें भेंट किए। भोजन करते समय कुछ अंश भूमि पर गिर पड़े। उन जूठे (उच्छिष्ट) अंशों से एक श्याम वर्ण की देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने अपने माता-पिता से अपना नाम और कार्य पूछा। शिव ने कहा कि चूँकि तुम हमारे उच्छिष्ट से प्रकट हुई हो, इसलिए आज से तुम 'उच्छिष्ट-मातङ्गिनी' कहलाओगी। जो भी साधक तुम्हारा मंत्र जपेगा और तुम्हें जूठा भोग अर्पित करेगा, उसकी सभी कामनाएँ पूरी होंगी। तुम वाणी, संगीत और सभी कलाओं पर आधिपत्य प्रदान करोगी। यह कथा देवी मातङ्गी के उस स्वरूप को दर्शाती है जो सामाजिक बंधनों और शुद्धि-अशुद्धि के द्वंद्व से परे है। वे ज्ञान का वह रूप हैं जो किसी भी माध्यम से और किसी भी अवस्था में प्राप्त हो सकता है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
मातङ्गी के 108 नाम उनके विभिन्न रूपों और शक्तियों को प्रकट करते हैं:
- माधवी, मथुरा, मत्ता (Madhavi, Mathura, Matta): ये नाम उनके मधुर, आकर्षक और दिव्य आनंद में मग्न स्वरूप को दर्शाते हैं। वे ज्ञान के उस आनंद का प्रतीक हैं जो साधक को दुनिया से परे ले जाता है।
- मेधा, मनीषा, मतिः (Medha, Manisha, Matih): ये तीनों नाम सीधे तौर पर बुद्धि, प्रज्ञा और उच्च मानसिक क्षमता से जुड़े हैं। वे साधक को असाधारण बौद्धिक शक्ति (intellectual power) प्रदान करती हैं।
- गुणज्ञा, गुणरूपिणी (Gunjna, Gunarupini): वे सभी गुणों को जानने वाली और स्वयं गुणों का स्वरूप हैं। यह दर्शाता है कि सृष्टि के सभी गुण उन्हीं से उत्पन्न होते हैं।
- गानागानस्वरूपिणी (Gana-gana Swarupini): वे संगीत और गायन का साक्षात् स्वरूप हैं। सभी प्रकार की कलाएं, विशेषकर संगीत, उनकी ही अभिव्यक्ति हैं। इसीलिए वे कलाकारों और संगीतकारों की प्रमुख आराध्या हैं।
- मुनिगुह्या, मुनिस्तुता (Muniguhya, Munistuta): उनका ज्ञान और स्वरूप अत्यंत गोपनीय है, जिसे केवल सिद्ध मुनि ही जान पाते हैं और वे निरंतर उनकी स्तुति करते हैं।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक १५) बहुत संक्षिप्त लेकिन अत्यंत सारगर्भित है:
- निश्चित सिद्धि की प्राप्ति (Guaranteed Attainment of Siddhi): "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य सिद्धिर्न संशयः" - जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) करता है, उसे सिद्धि की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है। 'सिद्धि' का अर्थ है आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति, अपने कार्य में पूर्ण सफलता और मनोकामनाओं की पूर्ति।
- वाक्-सिद्धि और विद्वता (Mastery of Speech and Knowledge): देवी मातङ्गी वाणी की देवी हैं, अतः इस स्तोत्र के पाठ से साधक की वाणी में ओज, आकर्षण और सत्यता आती है। उसे वाद-विवाद और शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त होती है।
- कला और संगीत में निपुणता (Excellence in Arts and Music): कलाकारों, संगीतकारों, लेखकों और कवियों के लिए यह स्तोत्र एक वरदान है। इसके नियमित पाठ से उनकी कला में दिव्यता और निखार आता है।
- आकर्षण और सम्मोहन शक्ति (Power of Attraction): देवी के 'मानमोहिनी', 'मरमोहिनी' जैसे नाम साधक को एक चुंबकीय व्यक्तित्व प्रदान करते हैं, जिससे सभी लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं।
- चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति (Attainment of Dharma, Artha, Kama, Moksha): स्तोत्र का विनियोग ही 'चतुर्वर्ग सिद्धये' के लिए है, जिसका अर्थ है कि यह जीवन के चारों पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - को संतुलित रूप से प्राप्त करने में सहायता करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- फलश्रुति के अनुसार, सर्वोत्तम परिणामों के लिए इस स्तोत्र का पाठ दिन में तीन बार - सुबह, दोपहर और शाम (
त्रिसन्ध्यं) - करना चाहिए। - बुधवार का दिन देवी मातङ्गी की पूजा के लिए विशेष शुभ माना जाता है क्योंकि यह बुद्धि और वाणी का दिन है।
- पाठ करते समय देवी के श्याम वर्ण, हाथ में वीणा और तोता लिए हुए स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
- कला या ज्ञान से संबंधित कोई भी नया कार्य शुरू करने से पहले इस स्तोत्र का पाठ करने से सफलता सुनिश्चित होती है।
- चूंकि वे 'उच्छिष्ट-चाण्डालिनी' हैं, उनकी पूजा में कठोर शुद्धता के नियम लागू नहीं होते। सबसे महत्वपूर्ण शुद्ध मन और सच्ची भक्ति है।