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हनुमत्स्तोत्रम् (श्रीधरस्वामीविरचितम्)

हनुमत्स्तोत्रम् (श्रीधरस्वामीविरचितम्)
(प्रमाणिका वृत्तम्)
सुखैकधाम भूषणम् मनोजगर्वखण्डनम् ।
अनात्मधीविगर्हणम् भजेषमञ्जनीसुतम् ॥ १॥

भवाम्बुधिं तितीर्षुभिः सुसेव्यमानमद्भुतम् ।
शिवावतारिणं परम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ २॥

गुणाकरं कृपाकरम् सुशान्तिदं यशस्करम् ।
निजात्मबुद्धिदायकम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ ३॥

सदैव दुष्टभञ्जनम् सदा सुधर्मवर्धनम् ।
मुमुक्षुभक्तरञ्जनम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ ४॥

सुरामपादसेविनम् सुरामनामगायिनम् ।
सुरामभक्तिदायिनम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ ५॥

विरक्तमण्डलाधिपम् सदात्मवित्सुसेवितम् ।
सुभक्तवृन्दवन्दितम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ ६॥

विमुक्ति विघ्ननाशकम् विमुक्ति भक्तिदायकम् ।
महाविरक्तिकारकम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ ७॥

सुखंयदेवमद्वयम् बृहत्त्वमेव तत् स्वयम् ।
इतीह बोधिकं गुरुम् भजेऽहमञ्जनीसुतम् ॥ ८॥

विरक्तिमुक्तिदायकम् इमं स्तवं सुपावनम् ।
पठन्ति ये समादरात न संसरति ते ध्रुवम् ॥ ९॥

॥ इति श्रीमत् परमहंसपरिव्राजकाचार्य सद्गुरु भगवता श्रीधरस्वामिना विरचितं हनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

हनुमत्स्तोत्रम् की यह रचना 20वीं सदी के महान संत और विद्वान, श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीधर स्वामी महाराज (Shridhar Swami Maharaj) द्वारा की गई है। श्रीधर स्वामी, जो समर्थ रामदास की परंपरा के एक तेजस्वी संत थे, ने इस स्तोत्र में भगवान हनुमान (Lord Hanuman) को केवल एक शक्तिशाली देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक सद्गुरु (Sadguru) के रूप में प्रस्तुत किया है। यह स्तोत्र गहन वेदांत के सिद्धांतों से ओतप्रोत है। इसमें हनुमान जी को 'निजात्मबुद्धिदायकम्' (आत्म-ज्ञान प्रदान करने वाले) और 'इतीह बोधिकं गुरुम्' (यह बोध कराने वाले गुरु कि 'जो सुख है, वही ब्रह्म है, और वह तुम स्वयं हो') कहा गया है। यह स्तोत्र भौतिक लाभों से परे, आध्यात्मिक साधकों और मोक्ष (liberation) के इच्छुकों के लिए एक मार्गदर्शक है।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति पर आधारित)

इस स्तोत्र का अंतिम श्लोक (फलश्रुति) इसके पाठ से प्राप्त होने वाले सर्वोच्च आध्यात्मिक लाभों पर प्रकाश डालता है:
  • निश्चित मोक्ष की प्राप्ति (Guaranteed Attainment of Liberation): फलश्रुति में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "पठन्ति ये समादरात न संसरति ते ध्रुवम्" - जो भी आदरपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे निश्चित रूप से संसार-चक्र (cycle of birth and death) में पुनः नहीं आते, अर्थात् उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • वैराग्य और भक्ति का उदय (Awakening of Dispassion and Devotion): यह स्तोत्र "विरक्तिमुक्तिदायकम्" है, अर्थात् यह मन में सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्य (dispassion) उत्पन्न करता है और भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • आत्म-ज्ञान की प्राप्ति (Attainment of Self-Knowledge): हनुमान जी को यहाँ "निजात्मबुद्धिदायकम्" और "बोधिकं गुरुम्" कहा गया है। उनके इस गुरु-स्वरूप का ध्यान करने से साधक को "अहं ब्रह्मास्मि" के सत्य का बोध होता है और अज्ञान (ignorance) का नाश होता है।
  • शांति, यश और धर्म की वृद्धि (Increase in Peace, Fame, and Dharma): "सुशान्तिदं यशस्करम्" और "सदा सुधर्मवर्धनम्" पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ, यह स्तोत्र जीवन में मानसिक शांति (mental peace), यश और धर्म की वृद्धि भी करता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह स्तोत्र विशेष रूप से आध्यात्मिक साधकों और मुमुक्षुओं (seekers of liberation) के लिए है। इसका पाठ नित्य ध्यान और स्वाध्याय के अंग के रूप में करना चाहिए।
  • प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्याकाल में शांत चित्त से बैठकर, हनुमान जी के गुरु-स्वरूप का ध्यान करते हुए इसका पाठ करें।
  • गुरु पूर्णिमा और हनुमान जयंती जैसे पर्वों पर इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी होता है, क्योंकि यह गुरु-तत्व और हनुमान-तत्व दोनों की वंदना करता है।
  • इस स्तोत्र का पाठ केवल शब्दों को दोहराना नहीं है, बल्कि इसके प्रत्येक श्लोक के गहरे वेदांतिक अर्थ पर मनन करना ही इसकी सच्ची साधना है।