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हनुमत्प्रसादस्तोत्रम् (भैरोजी रंगनाथ कृत)

हनुमत्प्रसादस्तोत्रम् (भैरोजी रंगनाथ कृत)

॥ हनुमत्प्रसादस्तोत्रम् ॥

विलासो वैदेहीहृदयकमलोन्मीलनकला- विदग्धो वाचां यः समभवदशोकावनितले । प्रमाद्यल्लङ्केशस्मयविदलनोद्दाममहिमा स दद्यादस्माकं सुरभिरिह वाचां मधुरताम् ॥ १॥ त्विषामीशं देवं वियति समुदञ्चत्स्वकिरणं सुरद्रोर्मन्वानः फलमिति परीपाकमधुरम् । ग्रहीतुं तं मातुर्बहिरवतरन्नेव जठरात् समुद्युक्तो योऽभूत् स वितरतु घाटीं मम गिराम् ॥ २॥ तुरासाहि स्तोकं रचितवति यस्मिन्नविनयं वितन्वन्तं स्तब्धं बधिरमवशं लोकमखिलम् । समाधातुं कॢप्तं कति कति समीरं स्तुतिगिरः समन्ताद्वैधात्र्यो दिवि समुदिता नः स शरणम् ॥ ३॥ तपस्तप्त्वा तीव्रं जगति शरदां यच्छतमहो सुराणां सर्वेषां समभिलषितं चाप्यसुलभम् । तदस्मिन् ब्रह्मास्त्रं समजनि यया कुण्ठितबलं नमस्तस्यै शक्त्यै प्रणतजनगत्यै भवतु मे ॥ ४॥ पुरस्तादुल्लोलोच्चलदलघुवीचीतरलितं पयोधिं संवीक्ष्य द्रुतगलितधैर्ये कपिकुले । जजृम्भे गम्भीरा तनुरधिमहेन्द्रक्षितिधरं यदीया दिव्या सा भवतु मम भव्याय महते ॥ ५॥ महावेगे तस्मिन् तरति जलधिं साह्यविधये समायाताः केचिन्न परिगणिताः कार्यवशतः । विनश्यद्विश्वासे मरणशरणे दुर्गतजने सुखं वा दुःखं वा किमु कलयते कार्यपरता ॥ ६॥ गभीरप्रोन्मीलन्नतवलितनाभीविलसितं मदोद्यल्लोलम्बद्युतिरुचिररोमावलियुतम् । समुन्मीलत्सान्द्रत्रिवलिजितगङ्गाम्बुललितं नताङ्गीवृन्दं को भवति विमुखो वीक्ष्य यदृते ॥ ७॥ स्फुटन्मल्लीमालाकलितकबरीभाररुचिराः समञ्चद्वक्षोजद्वयविहतकोकीमदभराः । समृध्यत्तारुण्या निशि विवसना वीक्ष्य युवती- र्विना तं धीराग्र्यं जगति गणयेत् तुच्छमिह कः ॥ ८॥ त्रिलोकीकल्याणी त्रिषवणपराणामभिमता त्रयीवेद्या स्तुत्या त्रिदशपतिसन्त्राणनिपुणा । दिदीपे शाखेव क्षितिनिपतिता प्रोन्नततरो- रशोकोद्याने यन्नयनसुभगा दीप्तिकलिका ॥ ९॥ दयासारद्रोणी दरदलितपङ्केरुहरुचिः शरज्ज्योत्स्नाधारा शमधनजनानन्दजननी । अशोकोद्यानेऽर्चिःकलितकरुणी कापि रुरुचे यदग्रे कल्याणी कलयतु स नः कामितमिह ॥ १०॥ विलुप्ते विश्वासे विगतवति धैर्ये द्रुमतले निरूपाभिर्हंहो विनयरहिताभिः परिवृतौ । निदेशे यो भावः समजनि रहो भूषणवरे चिराद् दृष्टे देव्या तमनुगदितुं को नु चतुरः ॥ ११॥ पटीयान् पाथोधेः सलिलमखिलं शोषकलिलं विधातुं लङ्कां वा भसितकलुषां मारुतसखः । यदीयं वालाग्रं स्वयमधिगतो नादहदहो स मे देवो हार्दं व्यपनयतु गाढान्धतमसम् ॥ १२॥ समुत्साहं ब्रूमः कथमिव कपीनां यदुदिते समुत्कण्ठा सर्वङ्कषपटुनि गम्भीरवचसि । अहो दृष्टा सीतेत्यमृतरसनिष्यन्दमधुरे निषोदद्बालानामिव स जयतान्मातृवचने ॥ १३॥ यदानीते सान्द्रस्फुरदनुपमानन्दलहरी यथा धेनोर्वत्सेऽस्रवदिव जगन्मूर्तिहृदये । स देवीमूर्धालङ्करणमहिते दृष्टिविषये मणौ स्यान्मे भूत्यै प्रणतजनचिन्तामणिवरे ॥ १४॥ जयतु जयतु रम्यं ब्रह्मचर्यस्य भाग्यं जयतु जयतु देव्या अञ्जनायाश्च भाग्यम् । जयतु च रघुवीरे भक्तिमद्भागधेयं जयतु विशरणानां पक्त्रिमं भागधेयम् ॥ १५॥ भैरोजीरङ्गनाथेन कृतं स्तोत्रं हनुमतः । भूयाद् भूत्यै रसविदां भक्तिभाजां हनुमति ॥ १६॥ ॥ इति भैरजीरङ्गनाथकृतं श्रीहनुमत्प्रसादस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)

हनुमत्प्रसादस्तोत्रम् (Hanumatprasada Stotram) एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण रचना है, जिसके रचयिता भैरोजी रंगनाथ (Bhairoji Ranganatha) हैं। 'प्रसाद' का अर्थ है कृपा या अनुग्रह। यह स्तोत्र हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए एक विनम्र प्रार्थना है। इसमें हनुमान जी के 'वाग्मी' (श्रेष्ठ वक्ता) और 'बुद्धिमतां वरिष्ठम्' स्वरूप की आराधना की गई है। कवि उनसे अपनी वाणी में मधुरता और काव्य-शक्ति की याचना करते हैं, साथ ही जीवन के संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। इसकी भाषा शैली अत्यंत ललित और काव्यात्मक है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)

इस स्तोत्र के 16 श्लोकों में हनुमान जी के विभिन्न लीला-प्रसंगों का मार्मिक चित्रण है:
  • वाणी की मधुरता: पहले श्लोक में कवि कहते हैं कि हनुमान जी ने अशोक वाटिका में माता सीता के हृदय रूपी कमल को अपनी मधुर वाणी से खिला दिया था ("वैदेहीहृदयकमलोन्मीलनकला-विदग्धो")। वे उनसे प्रार्थना करते हैं कि "स दद्यादस्माकं सुरभिरिह वाचां मधुरताम्" (वे हमें भी अपनी वाणी की मधुरता प्रदान करें)।
  • बाललीला और सूर्य ग्रहण: दूसरे श्लोक में उनके बचपन की घटना का वर्णन है, जब उन्होंने उगते हुए सूर्य को लाल फल समझकर पकड़ने के लिए छलांग लगाई थी। कवि कहते हैं कि जो जन्म लेते ही आकाश में उड़ सकते हैं, वे मेरी वाणी को भी ऊंचाइयां प्रदान करें।
  • सीता जी का शोक निवारण: श्लोक 13 में हनुमान जी के उस कोमल व्यवहार का वर्णन है जब उन्होंने सीता जी को राम की अंगूठी दी और कहा "अहो दृष्टा सीता" (अहो! मैंने सीता को देख लिया)। यह संवाद अमृत रस के समान मधुर ("अमृतरसनिष्यन्दमधुरे") था।
  • लंका दहन: श्लोक 12 में कहा गया है कि जैसे उन्होंने अपनी पूंछ की आग से लंका को जलाया था, वैसे ही वे मेरे हृदय के "गाढान्धतमसम्" (घोर अज्ञान रूपी अंधकार) को जला दें।

फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)

इस स्तोत्र के पाठ से भक्त को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
  • वाकसिद्धि और विद्या (Eloquence & Knowledge): यह स्तोत्र छात्रों, वक्ताओं और कवियों के लिए विशेष लाभकारी है। यह वाणी दोष को दूर करता है और बोलने की शक्ति ("घाटीं मम गिराम्") प्रदान करता है।
  • भय और अंधकार का नाश: "व्यपनयतु गाढान्धतमसम्"—यह अज्ञान, भ्रम और जीवन के निराशाजनक अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
  • चिंता मणि: श्लोक 14 में हनुमान जी को "चिन्तामणिवरे" कहा गया है। जैसे चिंतामणि सभी इच्छाएं पूरी करती है, वैसे ही हनुमान जी अपने भक्तों की सभी चिंताओं को हर लेते हैं।
  • ब्रह्मचर्य और भक्ति: श्लोक 15 में "जयतु जयतु रम्यं ब्रह्मचर्यस्य भाग्यं" कहकर उनके ब्रह्मचर्य और रामभक्ति की जयकार की गई है। इसका पाठ साधक में संयम और भक्ति भाव को दृढ़ करता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)

  • शुभ समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में इसका पाठ करना वाणी और बुद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
  • विद्यार्थियों के लिए: परीक्षा से पहले या पढ़ाई शुरू करने से पहले इसका पाठ करने से एकाग्रता (concentration) बढ़ती है।
  • संगीत और कला साधक: जो लोग संगीत या कला क्षेत्र में हैं, उन्हें अपनी कला में निपुणता के लिए इसका नित्य पाठ करना चाहिए।
  • भोग: पाठ के बाद हनुमान जी को मिश्री या मीठे फल का भोग लगाएं, क्योंकि यह स्तोत्र 'मधुरता' की प्राप्ति के लिए है।