हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रम् (बीजाक्षरात्मक)

॥ हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रम् (बीजाक्षरात्मक) ॥
शंशंशंसिद्धनाथं प्रणमति चरणं वायुपुत्रं च रौद्रं वंवंवंविश्वरूपं हहहहहसितं गर्जितं मेघक्षत्रम् । तंतंत्रैलोक्यनाथं तपति दिनकरं तं त्रिनेत्रस्वरूपं कंकंकन्दर्पवश्यं कमलमनहरं शाकिनीकालरूपम् ॥ १॥ रंरंरंरामदूतं रणगजदमितं रावणच्छेददक्षं बंबंबंबालरूपं नतगिरिचरणं कम्पितं सूर्यबिम्बम् । मंमंमंमन्त्रसिद्धिं कपिकुलतिलकं मर्दनं शाकिनीनां हुंहूंहुङ्कारबीजं हनति हनुमतं हन्यते शत्रुसैन्यम् ॥ २॥ दंदंदंदीर्घरूपं धरकरशिखरं पातितं मेघनादं ऊँऊँउच्चाटितं वै सकलभुवतलं योगिनीवृन्दरूपम् । क्षंक्षंक्षंक्षिप्रवेगं क्रमति च जलधिं ज्वालितं रक्षदुर्गं क्षेंक्षेंक्षें क्षेमतत्त्वं दनुरुहकुलं मुच्यते बिम्बकारम् ॥ ३॥ कंकंकंकालदुष्टं जलनिधितरणं राक्षसानां विनाशे दक्षं श्रेष्ठं कवीनां त्रिभुवनचरतां प्राणिनां प्राणरूपम् । ह्रांह्रांह्रांह्रासतत्त्वं त्रिभुवनरचितं दैवतं सर्वभूते देवानां च त्रयाणां फणिभुवनधरं व्यापकं वायुरूपम् ॥ ४॥ त्वंत्वंत्वंवेदतत्त्वं बहुऋचयजुषं साम चाऽथर्वरूपं कंकंकंकन्दने त्वं ननु कमलतले राक्षसान् रौद्ररूपान् । खंखंखंखड्गहस्तं झटिति भुवितले त्रोटितं नागपाशं ॐॐॐकाररूपं त्रिभुवनपठितं वेदमन्त्राधिमन्त्रम् ॥ ५॥ सङ्ग्रामे शत्रुमध्ये जलनिधितरणे व्याघ्रसिंहे च सर्पे राजद्वारे च मार्गे गिरिगुहविवरे चोषरे कन्दरे वा । भूतप्रेतादियुक्ते ग्रहगणविषये शाकिनीडाकिनीनां देशे विस्फोटकानां ज्वरवमनशिरःपीडने नाशकस्त्वम् ॥ ६॥ ॥ इति श्रीहरिकृष्णविनिर्मिते बृहज्ज्योतिषार्णवधर्मस्कन्धान्तर्गतं हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली और तांत्रिक ऊर्जा से भरपूर रचना है। इसके रचयिता श्री हरिकृष्ण हैं और यह 'बृहज्ज्योतिषार्णवधर्मस्कन्ध' नामक ग्रंथ में संकलित है। यह सामान्य भक्ति स्तोत्रों से भिन्न है, क्योंकि इसमें बीजाक्षरों (Seed Mantras) का प्रयोग किया गया है। "पंचरत्न" का अर्थ है 'पांच रत्न'; इस स्तोत्र के पांच मुख्य श्लोक बहुमूल्य रत्नों की तरह हैं जो साधक को अभेद्य सुरक्षा और शक्ति प्रदान करते हैं। यह आदि शंकराचार्य कृत 'हनुमत्पंचरत्नम्' से अलग है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति बीजाक्षरों की शक्ति से गूंजती है:
- शं, वं, तं, कं (Sham, Vam, Tam, Kam): प्रथम श्लोक में इन बीजों का प्रयोग कर हनुमान जी को "सिद्धनाथ", "रौद्र रूप", "विश्वरूप" और "त्रिनेत्र" (शिव स्वरूप) कहा गया है। वे "शाकिनीकालरूपम्" हैं, अर्थात् बुरी शक्तियों का काल।
- रं, बं, मं, हुं (Ram, Bam, Mam, Hum): दूसरे श्लोक में "हुं" (हुंकार) बीज मंत्र का प्रयोग शत्रुओं के नाश ("हन्यते शत्रुसैन्यम्") और रावण के गर्व को खंडित करने के लिए किया गया है।
- दं, ऊँ, क्षं, क्षें (Dam, Om, Ksham, Kshem): तीसरे श्लोक में "ऊँ" और "क्षं" बीजों का प्रयोग योगिनियों और दैत्यों को खदेड़ने और भक्तों को "क्षेम" (कल्याण) प्रदान करने के लिए है।
- ह्रां (Hram): चौथे श्लोक में "ह्रां" बीज का प्रयोग "त्रिभुवनरचितं दैवतं" (तीनों लोकों के देवता) हनुमान जी की व्यापक शक्ति और प्राण-तत्व को जाग्रत करने के लिए है।
- त्वं, खं, ॐ (Tvam, Kham, Om): पांचवे श्लोक में "खं" बीज का प्रयोग आकाश तत्व और "खड्गहस्त" (हाथ में तलवार लिए हुए) रूप का आह्वान करने के लिए है, जो तुरंत "नागपाश" जैसे बंधनों को काट देता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
स्तोत्र के अंतिम भाग में इसके पाठ के विशिष्ट लाभ बताए गए हैं:
- शत्रु और हिंसक जीवों से रक्षा: "सङ्ग्रामे शत्रुमध्ये... व्याघ्रसिंहे च सर्पे"—युद्ध में, शत्रुओं के बीच, या शेर, बाघ और सांप जैसे हिंसक जानवरों से घिर जाने पर यह स्तोत्र रक्षा कवच (protection) का काम करता है।
- भूत-प्रेत और तंत्र बाधा निवारण: "भूतप्रेतादियुक्ते... शाकिनीडाकिनीनां"—यह स्तोत्र भूत, प्रेत, पिशाच और शाकिनी-डाकिनी जैसी नकारात्मक ऊर्जाओं (negative entities) को तत्काल नष्ट करता है।
- रोग निवारण: "ज्वरवमनशिरःपीडने"—यह बुखार (fever), उल्टी और सिरदर्द जैसी शारीरिक व्याधियों और विस्फोटकों (फोड़े-फुंसी या महामारी) का नाश करता है।
- ग्रह दोष शांति: "ग्रहगणविषये"—शनि, राहु, केतु आदि क्रूर ग्रहों की पीड़ा को शांत करने में यह अत्यंत प्रभावी है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- सावधानी: चूँकि यह एक तांत्रिक बीजाक्षर युक्त स्तोत्र है, इसका पाठ शुद्धता और पवित्रता के साथ करना चाहिए।
- उच्चारण: बीजाक्षरों (शं, वं, हुं आदि) का उच्चारण स्पष्ट और जोरदार (resonance के साथ) करें।
- शुभ समय: ग्रहण काल, नवरात्रि, हनुमान जयंती या मंगलवार की मध्यरात्रि (निशीथ काल) में इसका पाठ सिद्ध होता है।
- विधि: लाल आसन पर बैठकर, हनुमान जी को सिंदूर और लौंग अर्पित करें। शत्रु बाधा या रोग निवारण के लिए संकल्प लेकर 11 या 21 बार पाठ करें।