Logoपवित्र ग्रंथ

हनुमत् भुजङ्ग स्तोत्रम्

हनुमत् भुजङ्ग स्तोत्रम्
उदरान्तरङ्गं सदारामभक्तं
     समुद्दण्डवृत्तिं द्विषद्दण्डलोलम् ।
अमोघानुभावं तमोघातदक्षं
     तनूकृत्प्रतापं हनुमन्तमीडे ॥ १॥

करोद्भासिटङ्कं किरीटिध्वजाङ्कं
     हृताशेषपङ्कं रणेनिर्विशङ्कम् ।
त्रिलोकीमृगाङ्कं क्षणाद्भस्मलङ्कं
     भजे निष्कलङ्कं हनुमन्तमिडे ॥ २॥

प्रपन्नानुरागं प्रभाकाञ्चनाङ्गं
     जगद्भीतशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
     भजे वायुपुत्रं हनुमन्तमीडे ॥ ३॥

रणे भीषणे मेघनादे सनाथे
     सरोषं समारोप्य सौमित्रिमान्ये ।
घनानां घनानां सुराणाञ्चमार्गे
     नटन्तं चलन्तं हनुमन्तमीडे ॥ ४॥

समुद्रान्तरङ्गाङ्खसान्द्रां विनिद्रां
     विलङ्घ्यादितेयैः स्तुतो मर्त्यसङ्घैः ।
निरातङ्कमानी च लङ्कां विशङ्को
     भवानेव सीतारिहा पापहारी ॥ ५॥

नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
     नमस्ते महावज्रदेहाय तुभ्यम् ।
नमस्ते कृता रामकार्याय तुभ्यं
     नमस्ते कृतब्रह्मचर्याय तुभ्यम् ॥ ६॥

॥ अथ फलश्रुतिः ॥
हनुमद्भुजङ्गप्रयातं प्रभाते
     प्रदोषे दिवा चार्धरात्रे च मर्त्यः ।
पठन् देशिकोऽपीह मुक्तान्तराय-
     स्सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रयाति ॥ ७॥

॥ इति हनुमत्भुजङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

हनुमत् भुजङ्ग स्तोत्रम् भगवान हनुमान को समर्पित एक अत्यंत ऊर्जावान और वीर रस से परिपूर्ण स्तुति है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'भुजङ्गप्रयात' छंद (Bhujanga Prayat meter) है। 'भुजंग' का अर्थ है सर्प और 'प्रयात' का अर्थ है गति। इस छंद में रचित श्लोकों की लय एक सर्प की तरह तेज और लहरदार होती है, जो पाठ करने वाले और सुनने वाले के मन में वीरता और अदम्य ऊर्जा का संचार करती है। यह स्तोत्र भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के शक्तिशाली, भक्तवत्सल और शत्रु-संहारक स्वरूप का आह्वान करता है। इसमें उनके अमोघ पराक्रम, क्षण में लंका को भस्म करने की शक्ति, और श्री राम के प्रति अटूट भक्ति का अद्भुत वर्णन है।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति पर आधारित)

इस स्तोत्र का अंतिम श्लोक (फलश्रुति) इसके पाठ से प्राप्त होने वाले अचूक लाभों का स्पष्ट वर्णन करता है:
  • समस्त बाधाओं से मुक्ति (Freedom from All Obstacles): फलश्रुति में कहा गया है, "पठन् देशिकोऽपीह मुक्तान्तरायः" - जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सभी प्रकार की अंतरायों (बाधाओं) से मुक्त हो जाता है। यह जीवन में आने वाली किसी भी रुकावट को दूर करने का आश्वासन देता है।
  • श्रीरामभक्ति की प्राप्ति (Attainment of Devotion to Shri Rama): इस स्तोत्र का परम फल "सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रयाति" है, जिसका अर्थ है कि पाठक को हमेशा और हर परिस्थिति में भगवान श्री राम की अनन्य भक्ति प्राप्त होती है, जो जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
  • शत्रुओं पर विजय और निर्भयता (Victory over Enemies and Fearlessness): स्तोत्र में हनुमान जी को "द्विषद्दण्डलोलम्" (शत्रुओं को दंड देने में उत्सुक) और "रणेनिर्विशङ्कम्" (रणभूमि में निडर) बताया गया है। उनके इस स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों को शत्रुओं पर विजय और सभी प्रकार के भय से सुरक्षा (protection) प्राप्त होती है।
  • ज्ञान और पवित्रता (Knowledge and Purity): हनुमान जी को "निष्कलङ्कं" (कलंक रहित) और "तमोघातदक्षं" (अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने में निपुण) कहा गया है। उनके इस गुण का स्मरण करने से साधक को आत्मिक पवित्रता (purity) और ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • फलश्रुति के अनुसार, यह स्तोत्र अत्यंत उदार है और इसका पाठ किसी भी समय - प्रभात (sunrise), प्रदोष (evening), दिन में (दिवा) या अर्धरात्रि (midnight) - में किया जा सकता है।
  • मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को इसका पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
  • हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष बैठकर, घी का दीपक जलाकर, और उनके उग्र एवं भक्तवत्सल स्वरूप का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करें।
  • इसकी लयबद्ध प्रकृति के कारण, इसे संगीत के साथ गाने या ऊर्जावान स्वर में पाठ करने से इसकी शक्ति और प्रभाव में वृद्धि होती है।