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श्रीहनुमद्ध्यानम् (मार्कण्डेयपुराणतः)

श्रीहनुमद्ध्यानम् (मार्कण्डेयपुराणतः)
मरकतमणिवर्णं दिव्यसौन्दर्यदेहं
नखरदशनशस्त्रैर्वज्रतुल्यैः समेतम् ।
तडिदमलकिरीटं मूर्ध्नि रोमाङ्कितं च
हरितकुसुमभासं नेत्रयुग्मं सुफुल्लम् ॥ १॥

अनिशमतुलभक्त्या रामदेवस्य योग्या-
न्निखिलगुरुचरित्राण्यास्यपद्माद्वदन्तम् ।
स्फटिकमणिनिकाशे कुण्डले धारयन्तं
गजकर इव बाहुं रामसेवार्थजातम् ॥ २॥

अशनिसमद्रढिम्नं दीर्घवक्षःस्थलं च
नवकमलसुपादं मर्दयन्तं रिपूंश्च ।
हरिदयितवरिष्ठं प्राणसूनुं बलाढ्यं
निखिलगुणसमेतं चिन्तये वानरेशम् ॥ ३॥

॥ इति मार्कण्डेयपुराणतः श्रीहनुमद्ध्यानम् समाप्तम् ॥

इस ध्यान स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

यह श्रीहनुमद्ध्यानम्, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, पवित्र मार्कण्डेय पुराण (Markandeya Purana) से लिया गया भगवान हनुमान का एक विशेष ध्यान स्तोत्र है। ध्यान स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य देवता के स्वरूप को मन में स्थापित करना होता है, जिससे पूजा या मंत्र जाप के दौरान एकाग्रता बनी रहे और भक्त का सीधा संबंध अपने आराध्य से स्थापित हो सके। इस स्तोत्र में भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के एक अत्यंत दिव्य और शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन किया गया है, जो सामान्य चित्रण से कुछ अलग है। यहाँ उनका वर्ण मरकत मणि (emerald gem) के समान हरा बताया गया है, जो शांति, समृद्धि और उपचार का प्रतीक है। यह ध्यान हनुमान जी को राम-सेवा में लीन एक महाबली और निखिलगुणसमेत (समस्त गुणों से युक्त) वानरेश के रूप में प्रस्तुत करता है।

ध्यान स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ

इस दिव्य स्वरूप का ध्यान करने से साधक को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
  • एकाग्रता और मानसिक शांति (Concentration and Mental Peace): हनुमान जी के मरकतमणि जैसे शांत और दिव्य स्वरूप का चिंतन करने से मन की चंचलता दूर होती है, और गहरी मानसिक शांति (mental peace) प्राप्त होती है।
  • शत्रुओं पर विजय और सुरक्षा (Victory over Enemies and Protection): स्तोत्र में हनुमान जी को "मर्दयन्तं रिपूंश्च" (शत्रुओं का मर्दन करने वाले) और वज्र के समान नख-दांतों वाला बताया गया है। उनके इस रूप का ध्यान करने से साधक को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और हर प्रकार के भय से सुरक्षा (protection) मिलती है।
  • अटूट राम-भक्ति की प्राप्ति (Attainment of Unwavering Devotion to Rama): हनुमान जी को "अनिशमतुलभक्त्या रामदेवस्य" (सदा अतुलनीय भक्ति से श्रीराम की सेवा करने वाले) के रूप में चित्रित किया गया है। उनके इस दास-भाव का ध्यान करने से साधक के हृदय में भी श्रीराम के प्रति निश्छल भक्ति जाग्रत होती है।
  • शारीरिक बल और आरोग्य (Physical Strength and Health): उनके "अशनिसमद्रढिम्नं" (वज्र के समान दृढ़) वक्षस्थल और "गजकर इव बाहुं" (हाथी की सूंड के समान विशाल भुजाओं) का ध्यान करने से साधक को शारीरिक बल (physical strength) और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक ध्यान स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ किसी भी हनुमान मंत्र, चालीसा या स्तोत्र के जाप से पहले करना सर्वोत्तम होता है।
  • प्रातःकाल या संध्याकाल में, पूजा स्थान पर शांत चित्त से बैठकर, आँखें बंद करके इस स्तोत्र के प्रत्येक शब्द के अनुसार हनुमान जी के दिव्य स्वरूप की मन में कल्पना करें।
  • मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को इस ध्यान का अभ्यास करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
  • नियमित रूप से इस ध्यान का अभ्यास करने से श्री हनुमान जी का दिव्य स्वरूप साधक के हृदय में स्थिर हो जाता है, जिससे उनकी कृपा सहज ही प्राप्त होने लगती है।