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घोर कष्टोद्धारण स्तोत्रम्

घोर कष्टोद्धारण स्तोत्रम्
श्रीपाद श्रीवल्लभ त्वं सदैव । श्रीदत्तास्मान्पाहि देवाधिदेव ॥ भावग्राह्य क्लेशहारिन्सुकीर्ते । घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥ १॥
त्वं नो माता त्वं पिताप्तोऽधिपस्त्वम् । त्राता योगक्षेमकृत्सद्गुरुस्त्वम् ॥ त्वं सर्वस्वं नोऽप्रभो विश्वमूर्ते । घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥ २॥
पापं तापं व्याधिमाधिं च दैन्यम् । भीतिं क्लेशं त्वं हराशु त्वदन्यम् ॥ त्रातारं नो वीक्ष्य ईशास्तजूर्ते । घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥ ३॥
नान्यस्त्राता नापि दाता न भर्ता । त्वत्तो देव त्वं शरण्योऽकहर्ता ॥ कुर्वात्रेयानुग्रहं पूर्णराते । घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥ ४॥
धर्मे प्रीतिं सन्मतिं देवभक्तिम् । सत्संगाप्तिं देहि भुक्तिं च मुक्तिम् ॥ भावासक्तिं चाखिलानंदमूर्ते । घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥ ५॥
श्लोकपंचकमेतद् यो लोकमङ्गलवर्धनम् । प्रपठेन्नियतो भक्त्या स श्रीदत्तप्रियो भवेत् ॥
॥ इति श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद्वासुदेवानन्दसरस्वतीस्वामी विरचितं घोरकष्टोद्धारणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और रचयिता

घोर कष्टोद्धारण स्तोत्रम् (Ghora Kashtodharana Stotram) दत्त संप्रदाय का एक अत्यंत प्रभावशाली और चमत्कारिक स्तोत्र है। इसकी रचना महान दत्त भक्त और सिद्ध योगी श्रीमद् वासुदेवानन्द सरस्वती (Tembe Swami Maharaj) द्वारा की गई है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है—'घोर' (Terrible), 'कष्ट' (Suffering) और 'उद्धारण' (Upliftment/Rescue)—यह स्तोत्र जीवन के सबसे कठिन और अंधकारमय समय में प्रकाश की किरण के समान कार्य करता है। जब मनुष्य चारों ओर से संकटों से घिर जाता है, कोई मार्ग नहीं सूझता, तब भगवान दत्तात्रेय (Lord Dattatreya) के इस स्तोत्र का पाठ तत्काल राहत प्रदान करता है। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक 'रक्षा कवच' है।

पौराणिक संदर्भ और भावार्थ

इस स्तोत्र की रचना एक विशिष्ट अवस्था में की गई थी जब भक्त को ईश्वरीय सहायता की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। इसमें दत्त भगवान के 'श्रीपाद श्रीवल्लभ' (Shripad Shrivallabh) स्वरूप का विशेष आह्वान किया गया है।
  • पूर्ण समर्पण (Total Surrender): स्तोत्र का मुख्य भाव 'शरणागति' है। भक्त भगवान से कहता है—"हे प्रभु! आप ही मेरे माता, पिता, रक्षक और सर्वस्व हैं।" (You are my mother, father, and protector). जब अहंकार मिटता है, तभी ईश्वरीय कृपा प्रवाहित होती है।
  • पाप और ताप का नाश (Destruction of Sins and Pain): 'पापं तापं व्याधिमाधिं' पंक्ति में स्पष्ट किया गया है कि यह स्तोत्र न केवल शारीरिक रोगों (diseases) को, बल्कि मानसिक संताप और पूर्व जन्मों के पाप कर्मों को भी नष्ट करने की क्षमता रखता है।
  • त्राता और दाता (Savior and Giver): दत्त भगवान को यहाँ 'योगक्षेमकृत्' कहा गया है, अर्थात वे जो हमारे पास नहीं है उसे प्रदान करते हैं (prosperity) और जो हमारे पास है उसकी रक्षा करते हैं (protection)।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भक्तों को निम्नलिखित प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होते हैं:
  • घोर संकटों से मुक्ति (Relief from Extreme Crisis): चाहे वह कर्ज (debt) हो, शत्रु बाधा हो, या कोई कानूनी समस्या, इस स्तोत्र का पाठ विषम परिस्थितियों को अनुकूल बनाता है।
  • शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य (Health and Mental Peace): यह स्तोत्र पुराने और असाध्य रोगों में भी लाभकारी माना गया है। यह मानसिक अशांति (mental stress) और भय (fear) को दूर कर मन को शांति प्रदान करता है।
  • ग्रह दोष निवारण (Planetary Remedies): विशेष रूप से शनि की साढ़े साती या राहु की महादशा में होने वाले कष्टों को कम करने के लिए यह स्तोत्र अचूक उपाय है।
  • दत्त कृपा (Divine Grace): फलश्रुति में स्वयं कहा गया है—'स श्रीदत्तप्रियो भवेत्', अर्थात इसका पाठ करने वाला भगवान दत्त का प्रिय बन जाता है और उसे भुक्ति (worldly pleasures) और मुक्ति (salvation) दोनों प्राप्त होती हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • गुरुवार (Thursday) का दिन भगवान दत्तात्रेय की उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
  • स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो औदुंबर वृक्ष (Audumbar tree) के नीचे या घर के पूजा स्थल में दत्त मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं।
  • संकट अधिक गहरा हो, तो संकल्प लेकर लगातार 11 या 21 दिनों तक प्रतिदिन इस स्तोत्र का 9, 11 या 108 बार पाठ करें।
  • पाठ के अंत में "दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा" मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।