Logoपवित्र ग्रंथ

श्री गणेशाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री गणेशाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्रीगणेशाय नमः ।

यम उवाच ।

मन्दारमालाशमिकाष्ठजा च यस्यैव देहे भवति प्रमाणम् । पुष्पं तयोः पत्रयुतं च शूराः सन्त्यज्य दूरं चरत प्रभीताः ॥ ३३॥ दूर्वायुतं विघ्नहरस्य गाथां सङ्गायमानं यदि पापयुक्तम् । पूजादिकारं गणनायकस्य सन्त्यज्य दूरं चरत प्रभीताः ॥ ३४॥

(अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं प्रारभ्यते)

ॐ गणेश हेरम्ब गजाननेति महोदर स्वानुभवप्रकाशिन् । वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथ वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ३५॥ अनेकविघ्नान्तक वक्रतुण्ड स्वसंज्ञवासिंश्च चतुर्भुजेति । कवीश देवान्तकनाशकारिन् वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ३६॥ महेशसूनो गजदैत्यशत्रो वरेण्यसूनो विकट त्रिनेत्र । परेश धरणीधर एकदन्त वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ३७॥ प्रमोदमोदेति नरान्तकारे षडूर्मिहन्तर्गजकर्ण ढुण्ढे । द्वन्द्वारिसिन्धौ स्थिरभावकारिन् वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ३८॥ विनायक ज्ञानविघातशत्रो पराशरस्यात्मज विष्णुपुत्र । अनादिपूज्याखुग सर्वपूज्य वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ३९॥ विधेर्ज लम्बोदर धूम्रवर्ण मयूरपालेति मयूरवाहिन् । सुरासुरैः सेवितपादपद्म वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४०॥ वरिन् महाखुध्वज शूर्पकर्ण शिवाज सिंहस्थ अनन्तवाह । दितौज विघ्नेश्वर शेषनाभे वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४१॥ अणोरणीयन् महतो महीयन् रवेर्ज योगेश वरिष्ठराज । निधीश मन्त्रेश च शेषपुत्र वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४२॥ वरप्रदातर्ह्यदितेश्च सूनो पराशरज्ञानद तारवक्त्र । गुहाग्रज ब्रह्मप पार्श्वपुत्र वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४३॥ सिन्धोश्च शत्रो परशुप्रपाणे शमीश पुष्पप्रिय विघ्नहारिन् । दूर्वाभरैरर्चित देवदेव वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४४॥ धियः प्रदातश्च शमीप्रियेति सुसिद्धिदातश्च सुशान्तिदातः । अमेयमायामितविक्रमेति वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४५॥ द्विधा चतुर्थीप्रिय कश्यपाज्ज धनप्रद ज्ञानप्रद प्रकाश । चिन्तामणे चित्तविहारकारिन् वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४६॥ यमस्य शत्रो अभिमानशत्रो विधेर्जहन्तः कपिलस्य सूनो । विदेह स्वानन्द अयोगयोग वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४७॥ गणस्य शत्रो कमलस्य शत्रो समस्थ भावज्ञ च भालचन्द्र । अनादिमध्यान्तमयप्रचारिन् वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४८॥ विभो जगद्रूप गुणेश भूमन् पुष्टेः पते आखुगतेति बोध । कर्तश्च पातश्च तु संहरेति वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥ ४९॥

(फलश्रुतिः)

इदमष्टोत्तरशतं नाम्नां तत् प्रपठन्ति ये । श‍ृण्वन्ति तेषु कुरुत भीता मा वै प्रवेशनम् ॥ ५०॥ भुक्तिमुक्तिप्रदं ढुण्ढेर्धनधान्यप्रवर्धनम् । ब्रह्मभूयकरं स्तोत्रं जपतो नित्यमादरात् ॥ ५१॥ यत्र कुत्र गणेशस्य चिह्नयुक्तानि वै भटाः । धामानि तत्र कुरुत सम्भीता मा प्रवेशनम् ॥ ५२॥ तेन संस्थापिताः सर्वे स्वस्वकार्येषु सेवकाः । केशाद्यास्तत्र के यूयं वयं भजत तं सदा ॥ ५३॥ एवमुक्त्वा यमः सर्वान् किङ्करान् मौनमादधे । यामाः सर्वे गणेशानं भजते भावसंयुताः ॥ ५४॥ इदं शमीभवं पुण्यं माहात्म्यं यः श‍ृणोति चेत् । पठति सिद्धिदं तस्य मन्दारस्य भविष्यति ॥ ५५॥ ॥ इति श्रीमदान्त्ये पुराणोपनिषदि श्रीमन्मौद्गले महापुराणे पञ्चमे खण्डे लम्बोदरचरिते शमीमन्दारस्पर्शमहिमावर्णनं नाम षड्विंशतितमाऽध्यायान्तर्गतं यमकृतं श्रीगणेशाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और यम-दूत संवाद

श्री गणेशाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Shri Ganesha Ashtottara Shatanama Stotram) का वर्णन मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) के पञ्चम खण्ड (लम्बोदर खण्ड) में मिलता है। यह स्तोत्र अन्य सामान्य स्तुतियों से अत्यंत भिन्न और प्रभावशाली है क्योंकि इसका उपदेश स्वयं यमराज (Lord Yama) ने अपने दूतों (Yamadutas) को दिया है। इस संवाद में यमराज स्पष्ट रूप से अपने दूतों को आदेश देते हैं कि जो व्यक्ति भगवान गणेश के इन 108 नामों का पाठ करता है या जो शमी और मन्दार (Shami and Mandara) के पुष्पों को धारण करता है, उसके पास भूलकर भी नहीं जाना चाहिए। यह स्तोत्र वस्तुतः मृत्यु भय (Fear of Death) से रक्षा का अमोघ कवच है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)

इस स्तोत्र में गणेश जी के कुछ अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट नामों का उल्लेख है:
  • देवान्तकनाशकारिन् (Destroyer of Devantaka): श्लोक ३६ में उन्हें देवान्तक सुर का नाश करने वाला कहा गया है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
  • विघ्नौघहन्ता (Destroyer of Multitudes of Obstacles): ४७वें श्लोक में उन्हें विघ्नों के समूह (Ogha) को एक साथ नष्ट करने वाला बताया गया है।
  • चिन्तामणि (Wish-Fulfilling Gem): ४६वें श्लोक में उन्हें 'चिन्तामणि' कहा गया है, जो भक्तों की सभी चिंताओं को हरकर मनोकामना पूर्ण करते हैं।
  • अणोरणीयन् महतो महीयन्: ४२वें श्लोक में उपनिषदों के महावाक्य का प्रयोग करते हुए उन्हें अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान बताया गया है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

यमराज द्वारा वर्णित फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ सुनिश्चित हैं:
  • अकाल मृत्यु से रक्षा (Protection from Untimely Death): फलश्रुति में यमराज कहते हैं—"श‍ृण्वन्ति तेषु कुरुत भीता मा वै प्रवेशनम्"। अर्थात, जहाँ इस स्तोत्र का पाठ होता है, वहाँ यमदूत भयभीत होकर प्रवेश नहीं करते।
  • भुक्ति और मुक्ति: यह स्तोत्र इस लोक में भोग (Bhukti) और अंत में मोक्ष (Mukti) दोनों प्रदान करता है।
  • धन-धान्य की वृद्धि: ५१वें श्लोक में इसे 'धनधान्यप्रवर्धनम्' कहा गया है। यह दरिद्रता का नाश कर समृद्धि लाता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi): प्रत्येक मास की चतुर्थी तिथि को इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
  • पुष्प अर्पण: पाठ से पूर्व गणेश जी को शमी पत्र (Shami leaves) या लाल रंग के मन्दार (Aak/Madar) के पुष्प अर्पित करें। यमराज ने इन दो पुष्पों का विशेष महत्व बताया है।
  • नित्य पाठ: यदि नित्य संभव न हो, तो मंगलवार या बुधवार को स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके इसका पाठ करें।