श्रीयुगपुरुषाकृतं एकादशगणेशस्तोत्रम्

युगपुरुषा ऊचुः ।
गणेशाय नमस्तुभ्यं भक्तसंरक्षकाय च । नानारूपभृते तुभ्यं हेरम्बाय नमो नमः ॥ ३०॥ भक्तेभ्यः सर्वदायैवाभक्तानां नाशनाय च । परेशाय पराणां ते पराय च नमो नमः ॥ ३१॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं नानामायाप्रचारिणे । सदा स्वानन्दम्भोगस्थ पालकाय नमो नमः ॥ ३२॥ अमेयशक्तये तुभ्यं नानामायाप्रहारिणे । मायिभ्यो मोहदात्रे वै मायिने ते नमो नमः ॥ ३३॥ लम्बोदराय लोकानामुदरस्थाय ते नमः । एकदन्ताय शूर्पाकारकर्णाय नमो नमः ॥ ३४॥ त्रिनेत्राय गजाकारवक्राय परमात्मने । चतुर्भुजाय सर्वेषामादिपूज्याय वै नमः ॥ ३५॥ देवाय देवरूपाय देवदेवाय ते नमः । देवदेवेशकायैव विघ्नेशाय नमो नमः ॥ ३६॥ सर्वेषां ज्येष्ठरूपाय मात्रे पित्रे नमो नमः । सततं सर्वपूज्याय ब्रह्मनिष्ठाय ते नमः ॥ ३७॥ ब्रह्मणे ब्रह्मणां नाथ ब्रह्मभूयप्रदाय च । ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे ते शान्तिस्थाय नमो नमः ॥ ३८॥ किं स्तुमस्त्वां गणेशान यत्र वेदाः शिवादयः । योगरूपा भवन्ति स्म ततस्ते नमनं शुभम् ॥ ३९॥ एवमुक्त्वा प्रणेमुस्ते युगा गणपतिं द्विज । स तानुवाच प्रीतात्मा भक्तवात्सल्ययन्त्रितः ॥ ४०॥फलश्रुतिः (श्रीगणेश उवाच)
स्तोत्रं भवत्कृतं मे यत् सर्वदं प्रभविष्यति । पठनाच्छ्रवणात् नृभ्यो मत्प्रीतिदायकं भवेत् ॥ ४१॥ यं यमिच्छति तं तं तु दास्यामि स्तोत्रतोषितः । भुक्तिमुक्तिप्रदं भावि सर्वमान्यं युगाः किल ॥ ४२॥ वरान् ब्रूत महाभागा ददामि मनसेप्सितान् । तपसा स्तोत्रमुख्येन तुष्टो भक्त्या विशेषतः ॥ ४३॥ ॥ इति श्रीयुगपुरुषाकृतं एकादशगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
श्रीयुगपुरुषाकृतं एकादशगणेशस्तोत्रम्, मुद्गल पुराण (अष्टम खण्ड, अध्याय १७) से उद्धृत एक अत्यंत रहस्यमय और दार्शनिक स्तुति है। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि इसकी रचना स्वयं युगपुरुषों (चारों युगों - सत्य, त्रेता, द्वापर, और कलि के मानवीकृत स्वरूप) ने की है। यह स्तोत्र भगवान गणेश के सामान्य स्वरूप की नहीं, बल्कि उनके ग्यारह (एकादश) स्वरूपों की वंदना करता है, जो ग्यारह रुद्रों के प्रतीक माने जाते हैं। यह स्तुति ब्रह्मांड के काल-चक्र और उसके अधिपति के रूप में गणेश के महत्व को दर्शाती है। भगवान गणेश स्वयं इस स्तुति को 'सर्वदं' (सब कुछ देने वाला), 'भुक्तिमुक्तिप्रदं' (भौतिक सुख और मोक्ष देने वाला), और 'सर्वमान्यं' (सभी के द्वारा माननीय) होने का वरदान देते हैं, जो इसकी शक्ति को प्रमाणित करता है।
पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
मुद्गल पुराण के अनुसार, एक समय चारों युगपुरुष अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने में कठिनाई का अनुभव कर रहे थे। संसार में धर्म और अधर्म का संतुलन बिगड़ रहा था। अपने कर्तव्यों को सुचारू रूप से चलाने और काल-चक्र की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक शक्ति प्राप्त करने हेतु, चारों युगपुरुषों ने मिलकर भगवान गजानन की तपस्या की। उनकी गहन तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान गणेश अपने ग्यारह दिव्य स्वरूपों में एक साथ प्रकट हुए। इन एकादश गणेशों के अद्भुत तेज और महिमा को देखकर, युगपुरुष अभिभूत हो गए। उन्होंने कृतज्ञता और समर्पण के साथ, भगवान के उन ग्यारह स्वरूपों की प्रशंसा में इस स्तोत्र की रचना की। इस स्तुति से प्रसन्न होकर, भगवान गणेश ने उन्हें न केवल उनके कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति प्रदान की, बल्कि उनके द्वारा रचे गए स्तोत्र को भक्तों के लिए एक कल्पवृक्ष के समान फलदायी होने का वरदान भी दिया।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तुति गणेश के परम और सर्वव्यापी स्वरूप को दर्शाती है:
- भक्त रक्षक और अभक्त नाशक (Protector of Devotees, Destroyer of Non-devotees): "भक्तसंरक्षकाय च... अभक्तानां नाशनाय च" - यह गणेश के दोहरे स्वरूप को दर्शाता है। वे भक्तों की हर प्रकार से रक्षा करते हैं, जबकि भक्तिहीनों के लिए वे विनाशक हैं।
- परात्पर ब्रह्म (The Supreme Being): "परेशाय पराणां ते पराय च नमो नमः" - आप ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, परों से भी पर हैं। यह उन्हें सभी देवताओं और सत्ताओं से ऊपर, परम ब्रह्म के रूप में स्थापित करता है।
- ब्रह्म-पद के दाता (Bestower of the State of Brahman): "ब्रह्मभूयप्रदाय च" - आप 'ब्रह्म-पद' या मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। यह स्तोत्र का सर्वोच्च आध्यात्मिक फल है।
- वेदों से भी परे (Beyond the Vedas): "किं स्तुमस्त्वां गणेशान यत्र वेदाः शिवादयः। योगरूपा भवन्ति स्म" - हे गणेश! हम आपकी स्तुति कैसे कर सकते हैं, जहाँ वेद, शिव और अन्य देवता भी योग-रूप (अर्थात् साधन) बन जाते हैं (साध्य नहीं)। यह उनकी अकल्पनीय महिमा को दर्शाता है, जो सभी ज्ञान के स्रोतों से भी परे है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र की फलश्रुति स्वयं भगवान गजानन ने युगपुरुषों को दी है:
- सर्व-प्रदायक (Granter of Everything): "स्तोत्रं भवत्कृतं मे यत् सर्वदं प्रभविष्यति" - भगवान कहते हैं, "तुम्हारे द्वारा रचित मेरी यह स्तुति सब कुछ प्रदान करने वाली होगी।"
- भगवान की प्रीति (Pleasing the Lord): "पठनाच्छ्रवणात् नृभ्यो मत्प्रीतिदायकं भवेत्" - इसे पढ़ने या सुनने वाले मनुष्यों को यह मेरी प्रीति (प्रसन्नता) प्रदान करेगी।
- सर्व-मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): "यं यमिच्छति तं तं तु दास्यामि स्तोत्रतोषितः" - इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर, भक्त जो-जो इच्छा करेगा, मैं उसे वह-वह प्रदान करूँगा।
- भुक्ति और मुक्ति (Worldly Enjoyment and Liberation): "भुक्तिमुक्तिप्रदं भावि सर्वमान्यं युगाः किल" - हे युगों! यह स्तोत्र भविष्य में भुक्ति (भोग) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला होगा और सभी के द्वारा माननीय होगा।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- यह स्तोत्र किसी भी मनोकामना की पूर्ति के लिए पढ़ा जा सकता है, क्योंकि इसे स्वयं गणेश जी ने 'सर्वदं' (सब कुछ देने वाला) कहा है।
- इसका पाठ करने का सबसे शुभ दिन बुधवार और चतुर्थी तिथि है।
- जो साधक भौतिक सुखों के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष) भी चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक आदर्श प्रार्थना है।
- पाठ करते समय भगवान गणेश के एकादश (ग्यारह) दिव्य स्वरूपों का ध्यान करना चाहिए और यह भाव रखना चाहिए कि वे काल के स्वामी हैं और सभी युगों का संचालन करते हैं।