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श्री धन्वन्तरि स्तोत्रम्

श्री धन्वन्तरि स्तोत्रम्

धन्वन्तरिस्तोत्रम्

ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः ॥
चन्द्रौघकान्तिममृतोरुकरैर्जगन्ति सञ्जीवयन्तममितात्मसुखं परेशम् । ज्ञानं सुधाकलशमेव च सन्दधानं शीतांशुमण्डलगतं स्मरतात्मसंस्थम् ॥
मूर्ध्नि स्थितादमुत एव सुधां स्रवन्तीम् भ्रूमध्यगाच्च तत एव च तानुसंस्थात् । हार्दाच्च नाभिसदनादधरस्थिताच्च ध्यात्वाभिपूरिततनुः दुरितं निहन्यात् ॥
अज्ञान-दुःख-भय-रोग-महाविषाणि योगोऽयमाशु विनिहन्ति सुखं च दद्यात् । उन्माद-विभ्रमहरः हरतश्च सान्द्रम् आनन्दमेव पदमापयति स्म नित्यम् ॥
ध्यात्वैव हस्ततलगं स्वमृतं स्रवन्तं एवं स यस्य शिरसि स्वकरं निधाय । आवर्तयेन्मनुमिमं स च वीतरोगः पापादपैति मनसा यदि भक्तिनम्रः ॥
धं धन्वन्तरये नमः धं धन्वन्तरये नमः धं धन्वन्तरये नमः ॥
दीर्घ-दीर्घपीवर-दोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽरुणेक्षणः । श्यामलस्तरुणः स्रग्वी सर्वाभरणभूषितः ॥
पीतवासा महोरस्कः सुमृष्टमणिकुण्डलः । नीलकुञ्चितकेशान्तः सुभगः सिंहविक्रमः ॥
अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः । स वै भगवतः साक्षाद् विष्णोरंशांशसम्भवः । धन्वन्तरिरिति ख्यातः आयुर्वेददृगित्यभाक् । एवं धन्वन्तरिं ध्यायेत् साधकोऽभीष्टसिद्धये ॥
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः ॥
धन्वन्तरिङ्गरुचिधन्वन्तरेरितरुधन्वंस्तरीभवसुधा धान्वन्तरावसथमन्वन्तराधिकृतधन्वन्तरौषधनिधे । धन्वन्तरंगशुगुधन्वन्तमायिषु वितन्वन् ममाब्धितनय वितन्वन् सून्वन्ततात्मकृततन्वन्तरावयवतन्वन्तरार्तिजलधौ ॥
धन्वन्तरिश्च भगवान् स्वयमास भगवान् देवो नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति । यज्ञे च भागममृतायुरवाप आयुष्यवेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके ॥
क्षीरोदमथनोद्भूतं दिव्यगन्धानुलेपिनम् । सुधाकलशहस्तं तं वन्दे धन्वन्तरिं हरिम् ॥
शरीरे जर्जरीभूते व्याधिग्रस्ते कलेवरे । औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः ॥
अयं मे हस्तो भगवान् अयं मे भगवत्तरः । अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्षणः ॥
अच्युतानन्तगोविन्दविष्णो नारायणामृत । रोगान्मे नाशयाशेषान् आशु धन्वन्तरे हरे ॥
धं धन्वन्तरये नमः धं धन्वन्तरये नमः धं धन्वन्तरये नमः ॥
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः ॥
॥ इति धन्वन्तरिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और देवता

श्री धन्वन्तरि स्तोत्रम् (Dhanvantari Stotram) स्वास्थ्य, आरोग्य और दीर्घायु के देवता भगवान धन्वन्तरि (Lord Dhanvantari) को समर्पित है। वेदों और पुराणों के अनुसार, धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अंशावतार हैं और उन्हें "आयुर्वेद का जनक" (Father of Ayurveda) माना जाता है। इस स्तोत्र में उन्हें 'अमृतकलशहस्ताय' (हाथ में अमृत कलश धारण करने वाले) और 'सर्वामयविनाशनाय' (सभी रोगों का नाश करने वाले) के रूप में नमन किया गया है। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों और पुराने रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह स्तोत्र अमृत समान है।

पौराणिक संदर्भ: समुद्र मंथन

भागवत पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन (Samudra Manthan) किया, तब अंत में भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, जलोका (Leech - चिकित्सा का प्रतीक) और अमृत कलश था।
  • आदि वैद्य (The Primal Physician): स्तोत्र में उन्हें 'वैद्यो नारायणो हरिः' कहा गया है। इसका अर्थ है कि स्वयं नारायण ही परम वैद्य हैं जो न केवल शरीर के, बल्कि भव-रोग (cycle of birth and death) के भी चिकित्सक हैं।
  • गंगा जल और औषधि: एक श्लोक में कहा गया है—"औषधं जाह्नवीतोयं", अर्थात जहाँ दवा काम न करे, वहां गंगाजल और भगवान का नाम औषधि का कार्य करता है। यह आस्था और विज्ञान का समन्वय है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को शारीरिक और मानसिक स्तर पर अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:
  • रोग मुक्ति (Cure from Diseases): 'अच्युतानन्तगोविन्द... रोगान्मे नाशयाशेषान्' मंत्र का जाप करने से असाध्य और पुराने रोगों में भी लाभ मिलता है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (immunity) को बढ़ाता है।
  • अकाल मृत्यु से रक्षा (Protection from Untimely Death): भगवान धन्वन्तरि के हाथ में अमृत कलश है, जो जीवन और दीर्घायु (longevity) का प्रतीक है। उनका ध्यान अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है।
  • मानसिक शांति और ज्ञान: स्तोत्र में अज्ञान, दुःख और भय के नाश की बात कही गई है। यह मानसिक तनाव (stress) और भ्रम (confusion) को दूर कर स्पष्टता प्रदान करता है।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • धनतेरस (Dhanteras): कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (दीपावली से दो दिन पहले) भगवान धन्वन्तरि का प्रकटोत्सव है। इस दिन इस स्तोत्र का १०८ बार पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
  • नित्य पूजा में या औषधि ग्रहण करने से पहले इस स्तोत्र का एक बार पाठ करें।
  • पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। भगवान विष्णु या धन्वन्तरि के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं और तुलसी दल अर्पित करें।
  • 'अच्युतानन्तगोविन्द' मंत्र का जाप करते हुए जल को अभिमंत्रित करके रोगी को पिलाने से स्वास्थ्य लाभ शीघ्र होता है।