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दशावतार स्तोत्रम्

दशावतार स्तोत्रम्

दशावतारस्तोत्रम्

नमोऽस्तु नारायणमन्दिराय नमोऽस्तु हारायणकन्धराय । नमोऽस्तु मत्स्याय लयाब्धिगाय नमोऽस्तु कूर्माय पयोब्धिगाय ॥ १॥
नमो वराहाय धराधराय नमो नृसिंहाय परात्पराय । नमोऽस्तु शक्राश्रय-वामनाय नमोऽस्तु विप्रोत्सव-भार्गवाय ॥ २॥
नमोऽस्तु सीताहित-राघवाय नमोऽस्तु पार्थस्तुत-यादवाय । नमोऽस्तु बुद्धाय विमोहकाय नमोऽस्तु ते कल्कि-पयोदिताय ॥ ३॥
नमोऽस्तु पूर्णामितसद्गुणाय समस्त-नाथाय हयाननाय । करस्थ-शङ्खोल्लस-दक्षमाला-प्रबोध-मुद्राभय-पुस्तकाय नमोऽस्तु वक्त्रोद्गिर-दागमाय निरस्त हेयाय हयाननाय ॥ ४॥
रमासमाकार-चतुष्टयेन क्रमाच्चतुर्दिक्षु निषेविताय । नमोऽस्तु पार्श्वद्वयग-द्विरूपश्रियाभिषिक्ताय हयाननाय ॥ ५॥
किरीट-पट्टाङ्गद-हार-काञ्ची-सुरत्नपीतांबर-नूपुराद्यैः विराजिताङ्गाय नमोऽस्तु तुभ्यं सुरैः परीताय हयाननाय ॥ ६॥
विदोष-कोटीन्दु-निभप्रभाय विशेषतो मध्व-मुनि-प्रियाय । विमुक्तवन्द्याय नमोऽस्तु विश्वग्विधूत-विघ्नाय हयाननाय ॥ ७॥
नमोऽस्तु शिष्टेष्टद वादिराजकृताष्टकाभिष्टुत-चेष्टिताय । दसावतारैस्त्रिदसार्थदाय निशेश-बिंबस्थ हयाननाय ॥ ८॥
नमोऽस्तु पारायणचर्चिताय नमोऽस्तु नारायण तेऽर्चिताय ॥ ९॥
॥ इति वादिराजपूज्यचरण-विरचितं दशावतारस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और रचयिता

दशावतार स्तोत्रम् (Dashavatara Stotram) की रचना 16वीं शताब्दी के महान द्वैत दार्शनिक और संत श्री वादिराज तीर्थ (Sri Vadiraja Tirtha) द्वारा की गई है। यद्यपि जयदेव गोस्वामी का दशावतार स्तोत्र अधिक प्रसिद्ध है, परन्तु वादिराज तीर्थ द्वारा रचित यह स्तोत्र अपनी विशिष्टता रखता है। इसमें भगवान विष्णु के दस अवतारों (Ten Incarnations) की स्तुति के साथ-साथ, अंतिम श्लोकों में भगवान के हयग्रीव (Hayagriva) स्वरूप—जो ज्ञान और विद्या के अधिष्ठाता देव हैं—का विशेष आह्वान किया गया है। यह स्तोत्र भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संगम है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ और अवतार

इस स्तोत्र में भगवान के लीला अवतारों के माध्यम से उनकी रक्षा शक्ति और ज्ञान शक्ति का वर्णन है:
  • अवतारों का क्रम (Sequence of Avatars): मत्स्य (Matsya), कूर्म (Kurma), वराह (Varaha), नृसिंह (Narasimha), वामन (Vamana), परशुराम (Bhargava), राम (Raghav), कृष्ण (Yadava), बुद्ध (Buddha), और कल्कि (Kalki) को नमन किया गया है।
  • हयग्रीव उपासना (Worship of Hayagriva): श्लोक संख्या 4 से 8 तक विशेष रूप से 'हयाननाय' (जिनका मुख घोड़े के समान है - Lord Hayagriva) को समर्पित हैं। उन्हें शंख, अक्षमाला, और पुस्तक धारण किए हुए ज्ञान मुद्रा में वर्णित किया गया है।
  • विघ्न नाश (Removal of Obstacles): स्तोत्र में भगवान को 'विश्वग्विधूत-विघ्नाय' कहा गया है, जिसका अर्थ है जो सम्पूर्ण जगत के विघ्नों और बाधाओं को नष्ट कर देते हैं।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भक्तों को बहुमुखी लाभ प्राप्त होते हैं:
  • विद्या और ज्ञान की प्राप्ति (Acquisition of Knowledge): चूँकि यह स्तोत्र भगवान हयग्रीव को समर्पित है, यह छात्रों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी है। इससे स्मरण शक्ति और बुद्धि का विकास होता है।
  • सुरक्षा और भय मुक्ति (Protection from Fear): नृसिंह और वराह जैसे उग्र अवतारों का स्मरण करने से शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) से रक्षा होती है।
  • समस्त कामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of Desires): "दसावतारैस्त्रिदसार्थदाय" पंक्ति बताती है कि भगवान अपने दस अवतारों के माध्यम से भक्तों और देवताओं के सभी उद्देश्यों को पूरा करते हैं।
  • दोष निवारण (Removal of Defects): यह स्तोत्र 'विदोष' (दोष रहित) स्वरूप का ध्यान कराता है, जिससे साधक के पाप और दोष नष्ट हो जाते हैं।

पाठ करने की विधि

  • एकादशी (Ekadashi) और गुरुवार (Thursday) के दिन इसका पाठ विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • स्नान के बाद भगवान विष्णु या हयग्रीव के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।
  • तुलसी दल अर्पित करें और कम से कम एक बार पूर्ण श्रद्धा के साथ इस स्तोत्र का पाठ करें।
  • परीक्षा के दिनों में या किसी नए कार्य के आरंभ में इसका पाठ सफलता सुनिश्चित करता है।