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श्री आञ्जनेय स्तोत्रम् (रं रं रं)

श्री आञ्जनेय स्तोत्रम् (रं रं रं)
रं रं रं रक्तवर्णं दिनकरवदनं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं रं रं रं रम्यतेजं गिरिचलनकरं कीर्तिपञ्चादिवक्त्रम् । रं रं रं राजयोगं सकलशुभनिथिं सप्तभेतालभेद्यं रं रं रं राक्षसान्तं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि ॥१॥
खं खं खं खड्गहस्तं विषज्वरहरणं वेदवेदाङ्गदीपं खं खं खं खड्गरूपं त्रिभुवननिलयं देवतासुप्रकाश । खं खं खं कल्पवृक्षं मणिमयमकुटं मायमायास्वरूपं खं खं खं कालचक्रं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि ॥२॥
इं इं इं इन्द्रवन्द्यं जलनिधिकलनं सौम्यसाम्राज्यलाभं इं इं इं सिद्धयोगं नतजनसदयं आर्यपूजार्चिताङ्गम् । इं इं इं सिंहनादं अमृतकरतलं आदि अन्त्यप्रकाशं इं इं इं चित्स्वरूपं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि ॥३॥
सं सं सं साक्षिरूपं विकसितवदनं पिङ्गालाक्षं सुरक्षं सं सं सं सत्यगीतं सकल मुनिस्तुतं शास्त्रसम्पत्करीयम् । सं सं सं सामवेदं निपुणसुललितं नित्यतत्त्वं स्वरूपं सं सं सं सावधानं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि ॥४॥
हं हं हं हंसरूपं स्फुटविकटमुखं सूक्ष्मसूक्ष्मावतारं हं हं हं अन्तरात्मं रविशशिनयनं रम्यगम्भीरभीमम् । हं हं हं अट्टहासं सुरवरनिलयं ऊर्ध्वरोमं करालं हं हं हं हंसहंसं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि ॥५॥
॥ इति आञ्जनेयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री आञ्जनेय स्तोत्रम् (रं रं रं) एक अत्यंत शक्तिशाली, दुर्लभ और गोपनीय स्तुति है, जिसे "बीज मंत्रात्मक स्तोत्र" (Bija Mantratmaka Stotram) कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका प्रत्येक श्लोक एक शक्तिशाली बीज मंत्र (seed mantra) की पुनरावृत्ति से आरंभ होता है, जैसे 'रं', 'खं', 'इं', 'सं' और 'हं'। तंत्र शास्त्र के अनुसार, बीज मंत्र किसी भी देवता की मूल ध्वनि-ऊर्जा होते हैं, जो ब्रह्मांडीय शक्ति को धारण करते हैं। यह स्तोत्र भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के उग्र, तेजस्वी और रक्षक स्वरूप का सीधा आह्वान करता है। इसका पाठ साधक के चारों ओर एक अभेद्य आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का निर्माण करता है और तीव्र गति से फल प्रदान करता है।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ

बीज मंत्रों से युक्त होने के कारण इस स्तोत्र के लाभ अत्यंत तीव्र और अचूक माने जाते हैं:
  • शत्रु और राक्षसी शक्तियों का नाश (Destruction of Enemies and Demonic Forces): 'रं रं रं राक्षसान्तं' पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि यह स्तोत्र शत्रुओं और राक्षसी बाधाओं का अंत करने वाला है। अग्नि तत्व के बीज मंत्र 'रं' से यह शक्ति और भी बढ़ जाती है।
  • विष और ज्वर से मुक्ति (Relief from Poison and Fever): 'खं खं खं खड्गहस्तं विषज्वरहरणं' का अर्थ है कि यह स्तोत्र विष (poison) और ज्वर (fever) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को भी हरने की क्षमता रखता है। यह शारीरिक और मानसिक, दोनों प्रकार के विषों का शमन करता है।
  • भय और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा (Protection from Fear and Negative Energy): हनुमान जी का 'पिङ्गालाक्षं सुरक्षं' और 'रौद्र' स्वरूप साधक को सभी प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय, प्रेत बाधा, और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक चेतना का जागरण (Awakening of Spiritual Consciousness): बीज मंत्र सीधे साधक के चक्रों पर प्रभाव डालते हैं। 'हं हं हं हंसरूपं' और 'अन्तरात्मं' जैसे उल्लेख साधक की आंतरिक चेतना और कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सहायक होते हैं।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ केवल पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और सात्विक intentions के साथ ही करना चाहिए।
  • इसका पाठ करने के लिए मंगलवार (Tuesday) या शनिवार (Saturday) का दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान के बाद, हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने एक लाल आसन पर बैठकर, घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  • पाठ से पहले हनुमान जी से अपनी रक्षा की प्रार्थना करें। पूर्ण एकाग्रता और स्पष्ट, ऊर्जावान उच्चारण के साथ कम से कम 5, 11 या 21 बार इसका पाठ करें।
  • किसी गंभीर संकट, शत्रु बाधा या अज्ञात भय की स्थिति में इसका पाठ तत्काल राहत प्रदान करने वाला माना जाता है।