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Sri Chamundeshwari Ashtottara Shatanamavali – श्रीचामुण्डेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली

Sri Chamundeshwari Ashtottara Shatanamavali – श्रीचामुण्डेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली
॥ अथ श्री चामुण्डाम्बाष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॐ श्री चामुण्डायै नमः । ॐ श्री महामायायै नमः । ॐ श्रीमत्सिंहासनेश्वर्यै नमः । ॐ श्रीविद्यावेद्यमहिमायै नमः । ॐ श्रीचक्रपुरवासिन्यै नमः । ॐ श्रीकण्ठदयितायै नमः । ॐ गौर्यै नमः । ॐ गिरिजायै नमः । ॐ भुवनेश्वर्यै नमः । ॐ महाकाल्यै नमः । १० ॐ महाल्क्ष्म्यै नमः । ॐ माहावाण्यै नमः । ॐ मनोन्मण्यै नमः । ॐ सहस्रशीर्ष संयुक्तायै नमः । ॐ सहस्रकरमण्डितायै नमः । ॐ कौसुंभवसनोपेतायै नमः । ॐ रत्नकञ्चुकधारिण्यै नमः । ॐ गणेशस्कन्दजनन्यै नमः । ॐ जपाकुसुम भासुरायै नमः । ॐ उमायै नमः । २० ॐ कात्यायिन्यै नमः । ॐ दुर्गायै नमः । ॐ मन्त्रिण्यै नमः । ॐ दण्डिन्यै नमः । ॐ जयायै नमः । ॐ कराङ्गुलिनखोत्पन्न नारायण दशाकृतये नमः । ॐ सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेवितायै नमः । ॐ इन्द्राक्ष्यै नमः । ॐ बगलायै नमः । ॐ बालायै नमः । ३० ॐ चक्रेश्यै नमः । ॐ विजयाऽम्बिकायै नमः । ॐ पञ्चप्रेतासनारूढायै नमः । ॐ हरिद्राकुङ्कुमप्रियायै नमः । ॐ महाबलाऽद्रिनिलयायै नमः । ॐ महिषासुरमर्दिन्यै नमः । ॐ मधुकैटभसंहर्त्र्यै नमः । ॐ मधुरापुरनायिकायै नमः । ॐ कामेश्वर्यै नमः । ॐ योगनिद्रायै नमः । ४० ॐ भवान्यै नमः । ॐ चण्डिकायै नमः । ॐ सत्यै नमः । ॐ चक्रराजरथारूढायै नमः । ॐ सृष्टिस्थित्यन्तकारिण्यै नमः । ॐ अन्नपूर्णायै नमः । ॐ ज्वलःजिह्वायै नमः । ॐ कालरात्रिस्वरूपिण्यै नमः । ॐ निशुंभ शुंभदमन्यै नमः । ॐ रक्तबीजनिषूदिन्यै नमः । ५० ॐ ब्राह्म्यादिमातृकारूपायै नमः । ॐ शुभायै नमः । ॐ षट्चक्रदेवतायै नमः । ॐ मूलप्रकृतिरूपायै नमः । ॐ आर्यायै नमः । ॐ पार्वत्यै नमः । ॐ परमेश्वर्यै नमः । ॐ बिन्दुपीठकृतावासायै नमः । ॐ चन्द्रमण्डलमध्यकायै नमः । ॐ चिदग्निकुण्डसंभूतायै नमः । ६० ॐ विन्ध्याचलनिवासिन्यै नमः । ॐ हयग्रीवागस्त्य पूजितायै नमः । ॐ सूर्यचन्द्राग्निलोचनायै नमः । ॐ जालन्धरसुपीठस्थायै नमः । ॐ शिवायै नमः । ॐ दाक्षायण्यै नमः । ॐ ईश्वर्यै नमः । ॐ नवावरणसम्पूज्यायै नमः । ७० ॐ नवाक्षरमनुस्तुतायै नमः । ॐ नवलावण्यरूपाड्यायै नमः । ॐ द्वात्रिंशत्ज्वलतायुधायै नमः । ॐ कामेशबद्धमाङ्गल्यायै नमः । ॐ चन्द्ररेखा विभूषितायै नमः । ॐ चराचरजगद्रूपायै नमः । ॐ नित्यक्लिन्नायै नमः । ॐ अपराजितायै नमः । ॐ ओड्यान्नपीठनिलयायै नमः । ॐ ललितायै नमः । ॐ विष्णुसोदर्यै नमः । ॐ दंष्ट्राकरालवदनायै नमः । ८० ॐ वज्रेश्यै नमः । ॐ वह्निवासिन्यै नमः । ॐ सर्वमङ्गलरूपाड्यायै नमः । ॐ सच्चिदानन्द विग्रहायै नमः । ॐ अष्टादशसुपीठस्थायै नमः । ॐ भेरुण्डायै नमः । ॐ भैरव्यै नमः । ॐ परायै नमः । ॐ रुण्डमालालसत्कण्ठायै नमः । ॐ भण्डासुरविमर्धिन्यै नमः । ९० ॐ पुण्ड्रेक्षुकाण्ड कोदण्डायै नमः । ॐ पुष्पबाण लसत्करायै नमः । ॐ शिवदूत्यै नमः । ॐ वेदमात्रे नमः । ॐ शाङ्कर्यै नमः । ॐ सिंहवाहिन्यै नमः । ॐ चतुः षष्ट्यूपचाराड्यायै नमः । ॐ योगिनीगणसेवितायै नमः । ॐ वनदुर्गायै नमः । ॐ भद्रकाल्यै नमः । १०० ॐ कदम्बवनवासिन्यै नमः । ॐ चण्डमुण्ड शिरःछेत्र्यै नमः । ॐ महाराज्ञ्यै नमः । ॐ सुधामय्यै नमः । ॐ श्रीचक्रवरताटङ्कायै नमः । ॐ श्रीशैलभ्रमराम्बिकायै नमः । ॐ श्रीराजराजवरदायै नमः । ॐ श्रीमत्त्रिपुरसुन्दर्यै नमः ॥ १०८ ॥ इति श्री चामुण्डाम्बाष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

श्रीचामुण्डेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली: तात्विक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Mystical Secrets)

सनातन शाक्त परंपरा में माता चामुण्डेश्वरी की उपासना अत्यंत जाग्रत और शीघ्र फलदायी मानी गई है। श्रीचामुण्डेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली केवल 108 नामों का एक साधारण संकलन नहीं है, बल्कि यह तंत्र शास्त्र, श्रीविद्या (Sri Vidya) और दुर्गा सप्तशती (Devi Mahatmyam) का एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी समन्वय है। 'चामुण्डा' शब्द की उत्पत्ति चण्ड और मुण्ड नामक दो महाभयंकर असुरों के वध से हुई है। जब देवी ने अपने घोर उग्र रूप में इन असुरों का शीश काटकर माता अंबिका को भेंट किया, तब उन्हें 'चामुण्डा' की उपाधि प्राप्त हुई (चण्डमुण्ड शिरःछेत्र्यै नमः)।
उग्र और सौम्य का अद्भुत एकीकरण: इस नामावली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देवी के उग्र (Fierce) और सौम्य (Benevolent) दोनों रूपों को एक साथ प्रस्तुत करती है। एक ओर देवी 'ज्वलःजिह्वायै' (लपलपाती हुई अग्नि जैसी जीभ वाली), 'रुण्डमालालसत्कण्ठायै' (मुंडमाल धारिणी), और 'दंष्ट्राकरालवदनायै' (भयंकर दांतों वाली) हैं। वहीं दूसरी ओर, वे साक्षात् ललिता त्रिपुरसुन्दरी हैं। उन्हें 'श्रीविद्यावेद्यमहिमायै' (जिनकी महिमा श्रीविद्या से जानी जाती है), 'कौसुंभवसनोपेतायै' (सुंदर कौसुंभ वस्त्र धारण करने वाली), और 'श्रीमत्त्रिपुरसुन्दर्यै' कहा गया है। यह दर्शाता है कि जो माता दुष्टों के लिए साक्षात् कालरात्रि हैं, वही अपने भक्तों के लिए परम सुंदरी राजराजेश्वरी हैं।
श्रीचक्र और तंत्र का रहस्य: नामावली में स्पष्ट रूप से तंत्र के सर्वोच्च चक्र 'श्री यंत्र' का वर्णन है। देवी को 'श्रीचक्रपुरवासिन्यै', 'नवावरणसम्पूज्यायै' (श्री यंत्र के नौ आवरणों में पूजित), और 'बिन्दुपीठकृतावासायै' (श्री यंत्र के मध्य बिंदु में निवास करने वाली) कहा गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि माता चामुण्डेश्वरी की यह विशेष नामावली 'समयाचार' और 'कौलाचार' दोनों ही तांत्रिक पद्धतियों में सर्वोच्च मानी जाती है।

नामावली का आध्यात्मिक और कुण्डलिनी विज्ञान (Kundalini & Esoteric Significance)

यह नामावली साधक के भीतर सोई हुई शक्तियों (कुण्डलिनी) को जाग्रत करने का एक अचूक मंत्र-विज्ञान है। इसमें मानव शरीर के सूक्ष्म चक्रों और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रत्यक्ष वर्णन मिलता है।
  • षट्चक्र देवता: देवी को 'षट्चक्रदेवतायै' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे हमारे शरीर के छह चक्रों (मूलाधार से आज्ञा चक्र तक) को नियंत्रित करने वाली कुण्डलिनी शक्ति हैं। 'चिदग्निकुण्डसंभूतायै' (चेतना रूपी अग्नि कुंड से प्रकट होने वाली) नाम इसी आंतरिक योग की ओर संकेत करता है।
  • पञ्चप्रेतासनारूढायै: तंत्र में यह एक अत्यंत गूढ़ अवस्था है। पञ्चप्रेत का अर्थ है ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव—जब ये परम शक्ति के बिना होते हैं तो शव (प्रेत) के समान निष्क्रिय होते हैं। माता चामुण्डा इन पाँचों देवों के आसन पर विराजमान होकर सृष्टि का संचालन करती हैं।
  • दशावतार की उत्पत्ति: नाम 26 — 'कराङ्गुलिनखोत्पन्न नारायण दशाकृतये' यह दर्शाता है कि भगवान विष्णु के दसों अवतार (मत्स्य, कूर्म, वराह, राम, कृष्ण आदि) माता चामुण्डा (ललिता) के हाथों के नाखूनों की चमक से ही उत्पन्न हुए हैं। यह शाक्त दर्शन का सर्वोच्च सिद्धांत है जहाँ देवी को विष्णु की भी आदि-कारण माना गया है।
  • भण्डासुर और महिषासुर का नाश: 'भण्डासुरविमर्धिन्यै' और 'महिषासुरमर्दिन्यै' नाम क्रमशः अज्ञान (भण्डासुर) और अहंकार (महिषासुर) के नाश के प्रतीक हैं। देवी हमारे भीतर के इन आसुरी तत्वों का संहार कर हमें शुद्ध चेतना की ओर ले जाती हैं।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

आगम शास्त्रों के अनुसार, जो साधक पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ माँ चामुण्डेश्वरी के इन 108 नामों का नित्य पाठ करता है, उसे लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार के अप्रत्याशित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश: 'निशुंभ शुंभदमन्यै' और 'रक्तबीजनिषूदिन्यै' नामों के प्रभाव से साधक के जीवन में मौजूद गुप्त या प्रकट शत्रु, ईर्ष्या करने वाले लोग और किसी भी प्रकार की तांत्रिक बाधा (Black Magic) जड़ से नष्ट हो जाती है।
  • श्रीविद्या और कुण्डलिनी जागरण: 'बिन्दुपीठकृतावासायै' और 'षट्चक्रदेवतायै' के उच्चारण से साधक की कुण्डलिनी शक्ति ऊर्ध्वगामी होती है और उसे ध्यान व योग की उच्च अवस्थाएं स्वतः प्राप्त होने लगती हैं।
  • सौभाग्य और अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति: देवी को 'महाल्क्ष्म्यै' और 'हरिद्राकुङ्कुमप्रियायै' कहा गया है। इस नामावली के नित्य जप से घर में धन, धान्य, ऐश्वर्य और अखंड सौभाग्य का वास होता है। दरिद्रता कभी पास नहीं फटकती।
  • वाकसिद्धि और ज्ञान का संचार: 'माहावाण्यै' और 'सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेवितायै' (जिनके दाएँ-बाएँ रमा और वाणी चंवर डुलाती हैं) के स्मरण से साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है और उसे अद्वितीय ज्ञान प्राप्त होता है।
  • महाभय से मुक्ति और अभय दान: 'कालरात्रिस्वरूपिण्यै' और 'भद्रकाल्यै' नामों के प्रभाव से साधक के मन से अकाल मृत्यु, रोग, दुर्घटना और ग्रहों के दुष्ट प्रभाव का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
  • सर्वमङ्गल और मोक्ष: 'सर्वमङ्गलरूपाड्यायै' और 'सच्चिदानन्द विग्रहायै' नामों के जप से जीवन में सभी ओर से मंगल समाचार मिलते हैं और अंत में साधक जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

चामुण्डेश्वरी माता की उपासना उग्र और सौम्य दोनों पद्धतियों से की जा सकती है। चूँकि यह नामावली 'श्रीविद्या' से युक्त है, इसलिए इसे अत्यंत पवित्रता के साथ करना चाहिए।
दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर लाल आसन पर विराजमान हों। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें। माता चामुण्डेश्वरी, ललिता त्रिपुरसुन्दरी या श्रीयंत्र का चित्र/विग्रह स्थापित करें। गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। देवी को कुमकुम या रोली का तिलक करें। तदुपरांत एकाग्र चित्त से इन 108 नामों का 'ॐ' और 'नमः' के साथ पाठ करें।
पुष्प अर्चन (अर्चन विधि): नामावली में श्लोक 19 ('जपाकुसुम भासुरायै नमः') स्पष्ट करता है कि देवी को जपा कुसुम (लाल गुड़हल) अत्यंत प्रिय है। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ माता को एक लाल गुड़हल या कुमकुम मिश्रित अक्षत (चावल) अर्पित करने से यह पाठ 'कल्पवृक्ष' के समान फलदायी हो जाता है। 'हरिद्राकुङ्कुमप्रियायै' के अनुसार हल्दी और कुमकुम अवश्य चढ़ाएं।
विशिष्ट मुहूर्त और अवसर: इस नामावली के सिद्धि प्रयोग के लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि, अष्टमी, महानवमी, चतुर्दशी और प्रत्येक शुक्रवार तथा मंगलवार का दिन सर्वोत्कृष्ट माना गया है। श्रीचक्र (श्री यंत्र) के सम्मुख बैठकर शुक्रवार को इसका पाठ करने से घर में प्रत्यक्ष चमत्कारिक लाभ अनुभव होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. देवी को 'चामुण्डेश्वरी' या 'चामुण्डा' क्यों कहा जाता है?
दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब देवी ने अपने भयंकर उग्र रूप में 'चण्ड' और 'मुण्ड' नामक दो महापराक्रमी असुरों का शीश काटकर माता अंबिका को भेंट किया, तब माता ने उन्हें 'चामुण्डा' नाम का वरदान दिया।
2. इस नामावली में चामुण्डा के साथ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के नाम क्यों हैं?
यह इस स्तोत्र का सबसे गूढ़ रहस्य है। तंत्र शास्त्र मानता है कि जो शक्ति उग्र रूप में चामुण्डा (शत्रु विनाशक) है, वही शांत रूप में 'श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी' (जगत का पालन करने वाली राजराजेश्वरी) है। यह नामावली दोनों रूपों का पूर्ण समन्वय है।
3. 'पञ्चप्रेतासनारूढायै' का क्या तांत्रिक अर्थ है?
तंत्र में पञ्चप्रेत का अर्थ है—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव। बिना 'शक्ति' के ये पांचों शिव 'शव' (प्रेत) के समान निष्क्रिय हैं। देवी इन पांचों के आसन पर विराजमान होकर ही संपूर्ण सृष्टि को चेतना और ऊर्जा प्रदान करती हैं।
4. नामावली में 'जपाकुसुम भासुरायै' का क्या महत्व है?
जपा कुसुम का अर्थ है लाल गुड़हल का फूल (Hibiscus)। यह देवी को अत्यंत प्रिय है। इसका अर्थ है कि लाल गुड़हल के फूलों से देवी की पूजा करने पर वे अतिशीघ्र प्रसन्न होती हैं और साधक के तेज को बढ़ाती हैं।
5. 'नवावरणसम्पूज्यायै' और 'बिन्दुपीठकृतावासायै' का क्या अर्थ है?
ये नाम 'श्री यंत्र' (Sri Chakra) से संबंधित हैं। श्री यंत्र में नौ आवरण (परतें) होते हैं और उसके सबसे मध्य भाग को 'बिंदु पीठ' कहते हैं, जहाँ साक्षात् माता त्रिपुरसुन्दरी (चामुण्डेश्वरी) निवास करती हैं।
6. क्या इस पाठ से कुण्डलिनी जागरण संभव है?
हाँ, इसमें 'षट्चक्रदेवतायै' और 'चिदग्निकुण्डसंभूतायै' जैसे नाम हैं। ये सीधे तौर पर मनुष्य के छह चक्रों और मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी अग्नि से जुड़े हैं, जिनके नित्य स्मरण से योग सिद्धि प्राप्त होती है।
7. क्या कोई भी व्यक्ति इस नामावली का पाठ कर सकता है?
बिल्कुल। यद्यपि इसमें अत्यंत उच्च तांत्रिक नाम हैं, फिर भी पूर्ण सात्विकता, पवित्रता और माता के प्रति अटूट श्रद्धा रखकर कोई भी साधारण साधक इसका पाठ कर सकता है।
8. नारायण के दसों अवतारों और देवी का क्या संबंध है?
नाम 26 के अनुसार (नखोत्पन्न नारायण दशाकृतये), भण्डासुर के साथ युद्ध के समय देवी के हाथों के नाखूनों से ही भगवान विष्णु के दसों अवतार प्रकट हुए थे। देवी ही समस्त अवतारों की मूल कारण हैं।
9. 'ओड्यान्नपीठनिलयायै' और 'जालन्धरसुपीठस्थायै' का क्या अर्थ है?
ये तंत्र और शाक्त परंपरा के चार प्रमुख शक्तिपीठों (कामगिरि, पूर्णगिरि, ओड्यान्न और जालन्धर) के नाम हैं। देवी इन पीठों की मुख्य अधिष्ठात्री शक्ति हैं।
10. पाठ का सबसे उत्तम समय और दिन कौन सा है?
इस पाठ के लिए शुक्रवार (ललिता स्वरूप के लिए) और मंगलवार (चामुण्डा स्वरूप के लिए) सबसे श्रेष्ठ दिन हैं। नवरात्रि की अष्टमी, महानवमी और रात्रिकाल (निशीथ काल) में किया गया पाठ अमोघ सिद्धि देता है।