महावाराही अष्टोत्तरशतनामावलिः
Mahavarahi Ashtottarashatanamavali

ॐ नमो वराहवदनायै नमः ।
ॐ नमो वाराह्यै नमः ।
ॐ वररूपिण्यै नमः ।
ॐ क्रोडाननायै नमः ।
ॐ कोलमुख्यै नमः ।
ॐ जगदम्बायै नमः ।
ॐ तरुण्यै नमः ।
ॐ विश्वेश्वर्यै नमः ।
ॐ शङ्खिन्यै नमः ।
ॐ चक्रिण्यै नमः ॥ १०॥
ॐ खड्गशूलगदाहस्तायै नमः ।
ॐ मुसलधारिण्यै नमः ।
ॐ हलसकादि समायुक्तायै नमः ।
ॐ भक्तानामभयप्रदायै नमः ।
ॐ इष्टार्थदायिन्यै नमः ।
ॐ घोरायै नमः ।
ॐ महाघोरायै नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ वार्ताल्यै नमः ।
ॐ जगदीश्वर्यै नमः ॥ २०॥
ॐ अन्धे अन्धिन्यै नमः ।
ॐ रुन्धे रुन्धिन्यै नमः ।
ॐ जम्भे जम्भिन्यै नमः ।
ॐ मोहे मोहिन्यै नमः ।
ॐ स्तम्भे स्तम्भिन्यै नमः ।
ॐ देवेश्यै नमः ।
ॐ शत्रुनाशिन्यै नमः ।
ॐ अष्टभुजायै नमः ।
ॐ चतुर्हस्तायै नमः ।
ॐ उन्मत्तभैरवाङ्गस्थायै नमः ॥ ३०॥
ॐ कपिलालोचनायै नमः ।
ॐ पञ्चम्यै नमः ।
ॐ लोकेश्यै नमः ।
ॐ नीलमणिप्रभायै नमः ।
ॐ अञ्जनाद्रिप्रतीकाशायै नमः ।
ॐ सिंहारूढायै नमः ।
ॐ त्रिलोचनायै नमः ।
ॐ श्यामलायै नमः ।
ॐ परमायै नमः ।
ॐ ईशान्यै नमः ॥ ४०॥
ॐ नील्यै नमः ।
ॐ इन्दीवरसन्निभायै नमः ।
ॐ कणस्थानसमोपेतायै नमः ।
ॐ कपिलायै नमः ।
ॐ कलात्मिकायै नमः ।
ॐ अम्बिकायै नमः ।
ॐ जगद्धारिण्यै नमः ।
ॐ भक्तोपद्रवनाशिन्यै नमः ।
ॐ सगुणायै नमः ।
ॐ निष्कलायै नमः ॥ ५०॥
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ नित्यायै नमः ।
ॐ विश्ववशङ्कर्यै नमः ।
ॐ महारूपायै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ महेन्द्रितायै नमः ।
ॐ विश्वव्यापिन्यै नमः ।
ॐ देव्यै नमः ।
ॐ पशूनामभयकारिण्यै नमः ।
ॐ कालिकायै नमः ॥ ६०॥
ॐ भयदायै नमः ।
ॐ बलिमांसमहाप्रियायै नमः ।
ॐ जयभैरव्यै नमः ।
ॐ कृष्णाङ्गायै नमः ।
ॐ परमेश्वरवल्लभायै नमः ।
ॐ नुदायै नमः ।
ॐ स्तुत्यै नमः ।
ॐ सुरेशान्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मादिवरदायै नमः ।
ॐ स्वरूपिण्यै नमः ॥ ७०॥
ॐ सुरानामभयप्रदायै नमः ।
ॐ वराहदेहसम्भूतायै नमः ।
ॐ श्रोणिवारालसे नमः ।
ॐ क्रोधिन्यै नमः ।
ॐ नीलास्यायै नमः ।
ॐ शुभदायै नमः ।
ॐ शुभवारिण्यै नमः ।
ॐ शत्रूणां वाक्स्तम्भनकारिण्यै नमः ।
ॐ कटिस्तम्भनकारिण्यै नमः ।
ॐ मतिस्तम्भनकारिण्यै नमः ॥ ८०॥
ॐ साक्षीस्तम्भनकारिण्यै नमः ।
ॐ मूकस्तम्भिन्यै नमः ।
ॐ जिह्वास्तम्भिन्यै नमः ।
ॐ दुष्टानां निग्रहकारिण्यै नमः ।
ॐ शिष्टानुग्रहकारिण्यै नमः ।
ॐ सर्वशत्रुक्षयकरायै नमः ।
ॐ शत्रुसादनकारिण्यै नमः ।
ॐ शत्रुविद्वेषणकारिण्यै नमः ।
ॐ भैरवीप्रियायै नमः ।
ॐ महामायाविनोदिन्यै नमः ॥ ९०॥
ॐ यन्त्ररूपायै नमः ।<
ॐ तन्त्ररूपिण्यै नमः ।
ॐ पीठात्मिकायै नमः ।
ॐ देवदेव्यै नमः ।
ॐ श्रेयस्कारिण्यै नमः ।
ॐ चिन्तितार्थप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ भक्तालक्ष्मीविनाशिन्यै नमः ।
ॐ सम्पत्प्रदायै नमः ।
ॐ सौख्यकारिण्यै नमः ।
ॐ महज्ज्वलन्त्यै नमः ॥ १००॥
ॐ स्वप्नवाराह्यै नमः ।
ॐ भगवत्यै नमो नमः ।
ॐ ईश्वर्यै नमः ।
ॐ सर्वाराध्यायै नमः ।
ॐ सर्वमयायै नमः ।
ॐ सर्वलोकात्मिकायै नमः ।
ॐ महिषनाशिन्यै नमः ।
ॐ बृहद्वाराह्यै नमः ॥ १०८॥
इति वाराह्यष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ।
इस नामावली का विशिष्ट महत्व
महावाराही अष्टोत्तरशतनामावलिः (Mahavarahi Ashtottarashatanamavali) 108 शक्तिशाली मंत्रों का संग्रह है, जो शक्ति की उग्र स्वरूपा वाराही देवी (Goddess Varahi) को समर्पित है। वाराही देवी, श्रीविद्या (Sri Vidya) परंपरा में ललिता त्रिपुरसुन्दरी की प्रधान सेनापति (Commander-in-Chief) मानी जाती हैं और उन्हें 'दंडनाथ' (Dandanatha) भी कहा जाता है। वराह (सूअर) के मुख वाली यह देवी सप्त-मात्रिकाओं में से एक हैं। इस नामावली का पाठ विशेष रूप से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने, काले जादू के प्रभावों को नष्ट करने और खोई हुई संपत्ति या भूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह नामावली साधक को अदम्य साहस और सुरक्षा प्रदान करती है।
नामावली के प्रमुख भाव और लाभ
इन 108 नामों में देवी की अनंत शक्तियों का वर्णन है, जो साधक को निम्नलिखित लाभ प्रदान करते हैं:
शत्रु नाश और विजय (Destruction of Enemies and Victory): वाराही देवी को "शत्रुनाशिनी" कहा जाता है। "ॐ शत्रुनाशिन्यै नमः" और "ॐ सर्वशत्रुक्षयकरायै नमः" जैसे मंत्रों का जाप शत्रुओं (enemies) और विरोधियों पर निश्चित विजय दिलाता है, चाहे वह कोर्ट केस (court cases) हो या जीवन का कोई अन्य संघर्ष।
स्तंभन शक्ति (Paralyzing Negative Forces): यह नामावली देवी की स्तंभन (Stambhana) शक्ति के लिए प्रसिद्ध है। "ॐ जम्भे जम्भिन्यै नमः", "ॐ मोहे मोहिन्यै नमः", और "ॐ स्तम्भे स्तम्भिन्यै नमः" का पाठ शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और गति को रोक देता है, जिससे वे साधक का अहित नहीं कर पाते।
काले जादू से रक्षा (Protection from Black Magic): वाराही देवी तांत्रिक शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। इनका नियमित पाठ "अभिचार" (काले जादू) और बुरी नजर (evil eye) के प्रभाव को तुरंत नष्ट कर देता है।
भूमि और संपत्ति लाभ (Gain of Land and Property): चूंकि वराह अवतार ने पृथ्वी को बचाया था, इसलिए उनकी शक्ति वाराही देवी भूमि विवाद (land disputes) सुलझाने और अचल संपत्ति प्राप्त करने में अत्यंत सहायक मानी जाती हैं।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
वाराही देवी की पूजा के लिए रात्रि (Night time) का समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। विशेष रूप से मध्यरात्रि में की गई साधना शीघ्र फलदायी होती है।
पंचमी (Panchami), अष्टमी (Ashtami) और अमावस्या की तिथियां वाराही साधना के लिए अत्यंत शुभ हैं। नवरात्रि के दौरान भी इनका पाठ विशेष फल देता है।
साधक को लाल वस्त्र धारण करके, लाल चंदन या रक्त-पुष्प (जैसे गुड़हल) देवी को अर्पित करते हुए इन 108 नामों का पाठ करना चाहिए। प्रत्येक नाम के साथ "नमः" बोलते हुए फूल या कुमकुम चढ़ाना (अर्चन करना) अत्यंत लाभकारी है।
भोग के रूप में देवी को अनार (pomegranate), उरद की दाल से बने व्यंजन या गुड़ का नैवेद्य अर्पित करना चाहिए।