भैरव चतुःषष्टि नामावलि (रुद्रयामल तंत्र से व्युत्पन्न)
Bhairava Chatuhshashti Namavali (64 Names derived from Rudrayamala Tantra)

ॐ ह्रीं विशालाक्ष भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं मार्तण्ड भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं मोदकप्रिय भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं स्वच्छन्द भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं विघ्नसन्तुष्ट भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं खेचर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं सचराचर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं रुरु भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं क्रोडदंष्ट्र भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं जटाधर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं विश्वरूप भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं विरूपाक्ष भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं नानारूपधर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं पर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं वज्रहस्त भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं महाकाय भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं चण्ड भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं प्रलयान्तक भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं भूमिकम्प भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं नीलकण्ठ भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं विष्णु भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं कुलपालक भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं मुण्डपाल भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं कामपाल भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं क्रोध भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं पिङ्गलेक्षण भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं अभ्ररूप भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं धरापाल भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं कुटिल भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं मन्त्रनायक भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं रुद्र भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं पितामह भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं उन्मत्त भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं वटुनायक भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं शङ्कर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं भूतवेताल भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं त्रिनेत्र भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं त्रिपुरान्तक भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं वरद भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं पर्वतावास भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं कपाल भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं शशिभूषण भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं हस्तिचर्माम्बरधर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं योगीश भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं ब्रह्मराक्षस भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं सर्वज्ञ भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं सर्वदेवेश भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं सर्वभूतहृदिस्थित भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं भीषण भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं भयहर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं सर्वज्ञ भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं कालाग्नि भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं महारौद्र भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं दक्षिण भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं मुखर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं अस्थिर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं संहार भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं अतिरिक्ताङ्ग भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं नागपाश (कालाग्नि)भैरवाय नमः ।
(ॐ ह्रीं कालाग्निप्रियङ्कर भैरवाय नमः) ।
ॐ ह्रीं प्रियङ्कर भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं घोरनाद भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं विशालाङ्ग(क्ष)भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं योगीश भैरवाय नमः ।
ॐ ह्रीं दक्षसंस्थित भैरवाय नमः ।
(ॐ ह्रीं दक्षसंस्थितयोगीश भैरवाय नमः ।)
॥ इति रुद्रयामलानुसारतः चतुःषष्टिरूपभैरवस्तोत्रव्युत्पन्ना भैरवचतुःषष्टिनामावलिः १ सम्पूर्णा ॥
भैरव चतुःषष्टि नामावलि का परिचय और महत्व (Introduction and Significance)
यह चतुःषष्टि नामावलि (64 Names) भगवान शिव के उग्र स्वरूप भैरव (Bhairava) को समर्पित है। यह नामावलि विशेष रूप से रुद्रयामल तंत्र (Rudrayamala Tantra) में वर्णित एक स्तोत्र से व्युत्पन्न की गई है। तंत्र शास्त्र में, भैरव को काल (Time) और मृत्यु (Death) का नियंत्रक माना जाता है। 64 नामों का यह संग्रह भैरव के समस्त विस्तृत रूपों (Expanded Forms) और उनकी शक्तियों (Powers) का प्रतिनिधित्व करता है। जहां अष्ट भैरव (8 मुख्य रूप) सृष्टि के आठ दिशाओं और तत्वों का नियंत्रण करते हैं, वहीं उनके प्रत्येक उप-रूप (8x8=64) ब्रह्मांड के सूक्ष्म पहलुओं को नियंत्रित करते हैं। इस नामावलि का पाठ साधक को असाधारण सुरक्षा (Extraordinary Protection) और तंत्र सिद्धि (Tantric Accomplishment) प्रदान करता है।
स्रोत: रुद्रयामल तंत्र और नामावलि की व्युत्पत्ति (Source: Rudrayamala Tantra and Derivation)
इस नामावलि का आधिकारिक स्रोत रुद्रयामल तंत्र (Rudrayamala Tantra) है, जो शैव और शाक्त परंपराओं में एक अत्यंत प्रामाणिक (Authoritative) ग्रंथ माना जाता है। नामावलि के अंत में स्पष्ट उल्लेख है: "॥ इति रुद्रयामलानुसारतः चतुःषष्टिरूपभैरवस्तोत्रव्युत्पन्ना भैरवचतुःषष्टिनामावलिः १ सम्पूर्णा ॥"। इसका अर्थ है कि ये 64 नाम सीधे रुद्रयामल में वर्णित चतुःषष्टिरूपभैरवस्तोत्र (Stotra of 64 Forms of Bhairava) से निकाले गए हैं। तंत्र ग्रंथों में, स्तोत्रों से नामावलि या सहस्रनामों का निर्माण एक सामान्य प्रक्रिया है, जिससे भक्त मंत्रों के रूप में देवता के गुणों का स्मरण कर सकें। यह नामावलि भैरव के अष्ट-अष्ट (Eight-by-Eight) विभाजन को दर्शाती है, जिसमें असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, और संहार जैसे प्रमुख भैरव रूपों के साथ उनके विभिन्न आयामों (Various Dimensions) को शामिल किया गया है।
नामावलि में निहित बीज मंत्र और गहन अर्थ (Bija Mantra and Deep Meaning)
प्रत्येक नाम के आरंभ में ॐ ह्रीं (Om Hrim) बीज मंत्र का प्रयोग किया गया है। ॐ (Om) परम चेतना (Supreme Consciousness) का प्रतीक है। ह्रीं (Hrim) को माया बीज (Maya Bija) या शक्ति बीज कहा जाता है। यह बीज मंत्र त्रिपुरा सुंदरी (Tripura Sundari) और भुवनेश्वरी (Bhuvaneshwari) से जुड़ा है, जो यह दर्शाता है कि भैरव की पूजा शक्ति (देवी) के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है। यह संयोजन भैरव को केवल विनाशक नहीं, बल्कि सृष्टि (Creation), पालन (Sustenance), और संहार (Destruction) तीनों का स्वामी सिद्ध करता है। नामावलि में विश्वरूप भैरव (Universal Form), कालाग्नि भैरव (Fire of Time), और योगीश भैरव (Lord of Yogis) जैसे नाम शामिल हैं, जो दर्शाते हैं कि भैरव ही समस्त योगिक (Yogic) और भौतिक (Material) शक्तियों के मूल हैं।
प्रमुख भैरव रूपों का समावेश (Inclusion of Key Bhairava Forms)
यह नामावलि भैरव के विभिन्न आक्रामक (Fierce) और सौम्य (Gentle) दोनों रूपों को समाहित करती है। यह 64 नाम भैरव के अष्ट भैरव (Ashta Bhairava) स्वरूपों के विस्तार को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, इसमें असिताङ्ग भैरव (Black-limbed Bhairava), रुरु भैरव (Deer Bhairava), चण्ड भैरव (Fierce Bhairava), और संहार भैरव (Destruction Bhairava) के उप-रूपों का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, वटुनायक भैरव (Batuka Bhairava) का उल्लेख उनकी बाल-स्वरूप और शीघ्र फलदायी प्रकृति को दर्शाता है। पितामह भैरव (Grandfather Bhairava) और विष्णु भैरव (Vishnu Bhairava) जैसे नाम यह सिद्ध करते हैं कि भैरव सभी प्रमुख देवताओं के कार्यों और गुणों को अपने में समाहित करते हैं, जो उनकी सर्वोच्चता (Supremacy) को स्थापित करता है।
नामावलि के पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits of Reciting the Namavali)
भैरव चतुःषष्टि नामावलि का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक को अनेक आध्यात्मिक (Spiritual) और भौतिक (Material) लाभ प्राप्त होते हैं। भैरव को क्षेत्रपाल (Protector of the Region) भी कहा जाता है, इसलिए यह नामावलि सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं और बाधाओं (Obstacles) से मुक्ति दिलाती है।
- भय निवारण (Removal of Fear): भयहर भैरवाय नमः नाम का जाप करने से सभी प्रकार के भय (Fear) और चिंताएं (Anxieties) दूर होती हैं।
- शत्रु दमन (Subduing Enemies): भीषण भैरव और चण्ड भैरव के नाम शत्रुओं पर विजय और सुरक्षा (Security) प्रदान करते हैं।
- तंत्र सिद्धि (Tantric Accomplishment): यह नामावलि मन्त्रनायक भैरव को समर्पित होने के कारण तंत्र साधना में शीघ्र सफलता (Quick Success) दिलाती है।
- रोग मुक्ति (Freedom from Illness): कालाग्नि भैरव का स्मरण शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं (Sufferings) को जलाकर समाप्त कर देता है।
- मोक्ष प्राप्ति (Attainment of Liberation): पर भैरव और सर्वज्ञ भैरव के नाम आध्यात्मिक उन्नति और मुक्ति (Moksha) की ओर मार्गदर्शन करते हैं।
नामावलि पाठ करने की विधि (Method of Recitation)
भैरव की पूजा अत्यंत शुद्धि (Purity) और समर्पण (Devotion) के साथ की जानी चाहिए। इस नामावलि का पाठ करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना उत्तम माना जाता है:
- समय: भैरव की पूजा के लिए कालरात्रि (Kalaratri), अष्टमी (Ashtami), और चतुर्दशी (Chaturdashi) तिथियाँ सर्वोत्तम हैं। शनिवार या मंगलवार को भी पाठ किया जा सकता है।
- स्थान और दिशा: पूजा स्थल स्वच्छ होना चाहिए। साधक को दक्षिण दिशा (Dakshina) की ओर मुख करके बैठना चाहिए, क्योंकि भैरव को दक्षिण भैरव भी कहा जाता है।
- सामग्री: भैरव को सरसों का तेल, उड़द की दाल से बने पकवान, और लाल या काले वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। रुद्राक्ष की माला से जाप करना शुभ (Auspicious) होता है।
- संकल्प: पाठ शुरू करने से पहले अपनी मनोकामना (Intention) या संकल्प (Vow) स्पष्ट रूप से लेना चाहिए। प्रत्येक नाम के अंत में नमः (Salutations) का उच्चारण करना अनिवार्य है।