॥ त्वरित रुद्र मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य त्वरित रुद्र मंत्रस्य अथर्वण ऋषिः, अनुष्टुप्छंदः, त्वरित रुद्र संज्ञिका देवता, नमः इति बीजम्, अस्तु इति शक्तिः, त्वरित रुद्र प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
ध्यान:रुद्रं चतुर्भुजं देवं त्रिनेत्रं वरदाभयम् ।
दधानमूर्ध्व हस्ताभ्यां शूलं डमरुमेव च ॥
अंकसंस्थामुमां पद्मे दधानं च करद्वये ।
आद्ये करद्वये कुंभं मातुलुंगं च बिभ्रतम् ॥
मंत्र:ॐ यो रुद्रोऽग्नौ यो अप्सु ओषधीषु यो रुद्रो विश्वा भुवना विवेश तस्मै रुद्राय नमोऽस्तु ।
विनियोग:अस्य त्वरित रुद्र मंत्रस्य अथर्वण ऋषिः, अनुष्टुप्छंदः, त्वरित रुद्र संज्ञिका देवता, नमः इति बीजम्, अस्तु इति शक्तिः, त्वरित रुद्र प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
ध्यान:रुद्रं चतुर्भुजं देवं त्रिनेत्रं वरदाभयम् ।
दधानमूर्ध्व हस्ताभ्यां शूलं डमरुमेव च ॥
अंकसंस्थामुमां पद्मे दधानं च करद्वये ।
आद्ये करद्वये कुंभं मातुलुंगं च बिभ्रतम् ॥
मंत्र:ॐ यो रुद्रोऽग्नौ यो अप्सु ओषधीषु यो रुद्रो विश्वा भुवना विवेश तस्मै रुद्राय नमोऽस्तु ।
॥ अर्थ ॥
जो रुद्र अग्नि में हैं, जो जल में हैं, जो ओषधियों में हैं, और जिन्होंने समस्त भुवनों में प्रवेश किया है (जो सर्वव्यापी हैं), उन भगवान रुद्र को हमारा नमस्कार है।
जो रुद्र अग्नि में हैं, जो जल में हैं, जो ओषधियों में हैं, और जिन्होंने समस्त भुवनों में प्रवेश किया है (जो सर्वव्यापी हैं), उन भगवान रुद्र को हमारा नमस्कार है।
परिचय एवं महत्व
त्वरित रुद्र मन्त्र भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली मन्त्र है। यह मन्त्र न केवल शिव की कृपा प्राप्त कराता है, बल्कि साधक की सभी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाओं को भी पूर्ण करता है। जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है, यह मन्त्र शिव को अत्यन्त प्रिय है और इसके प्रभाव से शंकर स्वयं साक्षात् दर्शन देते हैं।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: अथर्वण
- छंद: अनुष्टुप्
- देवता: त्वरित रुद्र संज्ञिका
- बीज: नमः
- शक्ति: अस्तु
- प्रयोजन: त्वरित रुद्र प्रीत्यर्थे (त्वरित रुद्र की प्रसन्नता के लिए)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
रुद्रं चतुर्भुजं देवं त्रिनेत्रं वरदाभयम् ।
दधानमूर्ध्व हस्ताभ्यां शूलं डमरुमेव च ॥
अंकसंस्थामुमां पद्मे दधानं च करद्वये ।
आद्ये करद्वये कुंभं मातुलुंगं च बिभ्रतम् ॥
दधानमूर्ध्व हस्ताभ्यां शूलं डमरुमेव च ॥
अंकसंस्थामुमां पद्मे दधानं च करद्वये ।
आद्ये करद्वये कुंभं मातुलुंगं च बिभ्रतम् ॥
अर्थ: मैं उन भगवान रुद्र का ध्यान करता हूँ, जो चार भुजाओं वाले, तीन नेत्रों वाले और वर तथा अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं। जिन्होंने अपने ऊपर के दो हाथों में शूल (त्रिशूल) और डमरू धारण किया हुआ है। जिनकी गोद में माँ उमा (पार्वती) विराजमान हैं और जिन्होंने अपने (अन्य) दोनों हाथों में कमल, अमृत कलश (कुंभ) और मातुलुंग (बिजौरा नींबू) फल धारण किया हुआ है।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
यो रुद्रोऽग्नौ (Yo Rudro Agnau): जो रुद्र अग्नि में स्थित हैं।
यो अप्सु (Yo Apsu): जो जल में स्थित हैं।
यो ओषधीषु (Yo Oshadheesh): जो ओषधियों (वनस्पतियों) में स्थित हैं।
विश्वा भुवना (Vishva Bhuvana): समस्त भुवनों (संसार) में।
विवेश (Vivesha): प्रविष्ट हैं (व्याप्त हैं)।
तस्मै रुद्राय नमोऽस्तु: उन भगवान रुद्र को नमस्कार है।
संपूर्ण अर्थ: जो रुद्र अग्नि में हैं, जो जल में हैं, जो ओषधियों में हैं, और जिन्होंने समस्त भुवनों में प्रवेश किया है (जो सर्वव्यापी हैं), उन भगवान रुद्र को हमारा नमस्कार है।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
पुत्र प्राप्ति
जिसके घर में पुत्र नहीं है, इस मंत्र के अनुष्ठान से निश्चय ही पुत्र लाभ होता है। यह पुत्र कामाक्षियों के लिए एक अमोघ मन्त्र है।
सर्व कार्य सिद्धि
इस मंत्र के सिद्ध होने से साधक को अपने जीवन के सभी कार्यों, चाहे वे भौतिक हों या आध्यात्मिक, में निश्चित रूप से सिद्धि प्राप्त होती है।
शिव दर्शन
यह मंत्र शिव को प्रसन्न करता है और साधक को भगवान शंकर के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है।
मनोकामना पूर्ति
शिव स्वयं साधक की इच्छा को पूर्ण करते हैं।
मंत्र सिद्धि की विधि
इस मंत्र की सिद्धि के लिए निम्नलिखित विधान बताया गया है:
- जप संख्या: सवा लाख (1,25,000) मंत्र का जप करने से यह मंत्र सिद्ध होता है।
- ब्रह्मचर्य: इसकी साधना काल में साधक को पूर्ण ब्रह्मचर्य (Celibacy) का पालन करना अनिवार्य है।
- अनुष्ठान: विधि-विधान और पवित्रता के साथ अनुष्ठान पूर्ण करने पर ही अभीष्ट फल (जैसे पुत्र लाभ) की प्राप्ति होती है।
