॥ त्र्यम्बक मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य त्र्यम्बक मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, त्र्यम्बक पार्वतीपतिर्देवता, त्र्यं बीजम्, बं शक्तिः, कं कीलकम्, सर्वार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:हस्ताभ्यां कलशद्वयामृत रसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम्॥
अंकन्यस्त करद्वयामृतघटं कैलासकांतं शिवम्,
स्वच्छांभोजगतं नवेन्दु मुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे॥
मंत्र:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
विनियोग:अस्य त्र्यम्बक मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, त्र्यम्बक पार्वतीपतिर्देवता, त्र्यं बीजम्, बं शक्तिः, कं कीलकम्, सर्वार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:हस्ताभ्यां कलशद्वयामृत रसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम्॥
अंकन्यस्त करद्वयामृतघटं कैलासकांतं शिवम्,
स्वच्छांभोजगतं नवेन्दु मुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे॥
मंत्र:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
॥ अर्थ ॥
हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और हर जीव का पोषण करते हैं। जैसे पकी हुई ककड़ी अपने तने के बंधन से स्वतः ही मुक्त हो जाती है, वैसे ही हमें भी मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दें, पर अमरता से वंचित न करें।
हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और हर जीव का पोषण करते हैं। जैसे पकी हुई ककड़ी अपने तने के बंधन से स्वतः ही मुक्त हो जाती है, वैसे ही हमें भी मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दें, पर अमरता से वंचित न करें।
उत्पत्ति एवं महत्व
त्र्यम्बक मंत्र, जिसे विश्वभर में महामृत्युंजय मंत्र के नाम से जाना जाता है, हिन्दू धर्म के सबसे शक्तिशाली और पूजनीय मंत्रों में से एक है। इसका उल्लेख ऋग्वेद (मंडल 7, सूक्त 59, मंत्र 12) में मिलता है और यह यजुर्वेद में भी पाया जाता है। 'त्र्यम्बक' का अर्थ है 'तीन नेत्रों वाले', जो भगवान शिव का एक प्रमुख नाम है। यह मंत्र 'कालभक्षी' माना गया है, अर्थात यह काल (समय और मृत्यु) का भक्षण करने वाला है। जिनकी आयु कम हो या जो असाध्य रोगों से पीड़ित हों, उनके लिए इस मंत्र का अनुष्ठान जीवन-रक्षक माना गया है।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: वसिष्ठ
- छंद: अनुष्टुप्
- देवता: त्र्यम्बक पार्वतीपति
- बीज: त्र्यं
- शक्ति: बं
- कीलकम्: कं
- प्रयोजन: सर्वार्थ सिद्धयर्थे (सभी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
हस्ताभ्यां कलशद्वयामृत रसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम्॥
अंकन्यस्त करद्वयामृतघटं कैलासकांतं शिवम्,
स्वच्छांभोजगतं नवेन्दु मुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे॥
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम्॥
अंकन्यस्त करद्वयामृतघटं कैलासकांतं शिवम्,
स्वच्छांभोजगतं नवेन्दु मुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे॥
अर्थ: मैं उन त्रिनेत्र देव का भजन करता हूँ, जो अपने दो हाथों से अमृत से भरे दो कलशों से अपना मस्तक सींच रहे हैं, और दो हाथों से मृग और अक्षमाला धारण किए हुए हैं, तथा अन्य दो हाथों में परशु धारण करते हैं। जिनकी गोद में अमृत का घट है, जो कैलाश पर विराजमान शिव हैं, जो स्वच्छ कमल पर आसीन हैं और जिनके मुकुट पर बालचंद्र सुशोभित है।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
ॐ (Om): आदिम ब्रह्मांडीय ध्वनि, परम सत्य।
त्र्यम्बकं (Tryambakam): तीन नेत्रों वाले (भगवान शिव)।
यजामहे (Yajamahe): हम पूजा करते हैं, सम्मान करते हैं।
सुगन्धिं (Sugandhim): सुगंधित, पुण्यमय कीर्ति वाले।
पुष्टिवर्धनम् (Pushtivardhanam): जो पोषण और जीवन शक्ति को बढ़ाते हैं।
उर्वारुकमिव (Urvarukamiva): ककड़ी की तरह।
बन्धनान् (Bandhanan): बंधन से (यहाँ तने के बंधन से)।
मृत्योर्मुक्षीय (Mrityormukshiya): मृत्यु से मुक्त कर दें।
माऽमृतात् (Maamritat): मुझे अमरता से (वंचित) नहीं।
संपूर्ण अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और हर जीव का पोषण करते हैं। जैसे पकी हुई ककड़ी अपने तने के बंधन से स्वतः ही मुक्त हो जाती है, वैसे ही हमें भी मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दें, पर अमरता से वंचित न करें।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
इंद्रियों पर विजय
एक लाख जप करने से व्यक्ति अपनी समस्त इंद्रियों को जीत लेता है, जिससे मन शांत और एकाग्र होता है।
शत्रुओं पर पूर्ण विजय
मंत्र सिद्ध होने पर साधक अपने सभी ज्ञात और अज्ञात शत्रुओं पर पूर्ण विजय प्राप्त करता है।
इच्छा मृत्यु का वरदान
इस मंत्र की उच्चतम सिद्धि 'इच्छा मृत्यु' है, अर्थात साधक को अपनी इच्छा से शरीर त्यागने का अधिकार प्राप्त होता है।
दीर्घायु और आरोग्य
यह मंत्र अकाल मृत्यु, दुर्घटना और असाध्य रोगों से रक्षा करता है, तथा साधक को उत्तम स्वास्थ्य और लम्बी आयु प्रदान करता है।
मंत्र सिद्धि की विधि
इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए एक विशेष अनुष्ठान का विधान है:
- जप संख्या: सर्वप्रथम इस मंत्र का एक लाख (1,00,000) बार जाप किया जाता है।
- पूजा विधान: जाप के दौरान भगवान शिव पर बिल्व (बेल पत्र), पलाश के पुष्प आदि चढ़ाना चाहिए।
- मंत्र सिद्धि: विधि-विधान से एक लाख जप पूर्ण करने और शिव को प्रिय वस्तुएं अर्पित करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है।
