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श्री विश्वकर्मा चालीसा - 2 - Shree Vishwakarma Chalisa - 2

Vishwakarma Chalisa 2

श्री विश्वकर्मा चालीसा - 2 - Shree Vishwakarma Chalisa - 2
॥ दोहा ॥
मनु मय त्वष्टा विश्वकर्मा, शिल्प कर्म आधार ।
तीन लोक चौदह भुवन, करनी का विस्तार ॥

॥ सोरठा ॥
प्रत्न सुपर्ण महाराज, सनग सनातन अहिभून ।
शिल्पन के सरताज, आदि शिल्प के गुरु तुम ॥

॥ चौपाई ॥
जगत गुरु जग ईश पियारे ।
विश्वकर्मा महाराज हमारे ॥
देव दनुज सबके दुख टारे ।
दीनन के तुम हो रखवारे ॥
जल, थल, पर्वत और अकाशा ।
चान्द सूर्य नित करहिं प्रकाशा ॥
नाथ तुम्हारी अद्भुत करनी ।
महिमा अमित जाहि नहिं बरनी ॥
सृष्टि आदि कर्ता हो स्वामी ।
बार बार है तुम्हें नमामी ॥
भव निधि पड़े बहुत दुख पाये ।
सब तजि शरन तुम्हारी आये ॥
जप तप भजन न होय गोसाईम् ।
बन्धे कीट मर्कट की नाईम् ॥
बन्धन छोर हमें अपनाओ ।
निज चरणों का दास बनाओ ॥
जयति जयति विश्वकर्मा स्वामी ।
मम उर बसहु नाथ विज्ञानी ॥
सुमिरन भजन तुम्हारा भावै ।
बुरे कर्म से मन हट जावै ॥
साधु सन्त के तुम रखवारे ।
भक्त जनन के प्राण पियारे ॥
स्वारथ वश तब भक्ति बिसारी ।
नाथ पड़ा हूं शरण तुम्हारी ॥
तुमहिं भजै अक्षय सुख पावै ।
जन्म जन्म के दुःख बिनसावै ॥
पुरवहु नाथ मनोरथ मोरा ।
मन क्रम वचन दास मैं तोरा ॥
एक लालसा यही हमारी ।
केवल भक्ती चहौं तिहारी ॥
मङ्गल करन अमङ्गल हारी ।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी ॥
आरत-हरण भक्त भय हारी ।
शरण शरण मैं शरण तिहारी ॥
तुम सबके गुरु सबके स्वामी ।
तुम सबहीं के अन्तरवामी ॥
सर्व शक्ति तुम सब आधारा ।
तुमहिं भजै सो उतरहिं पारा ॥
घट घट माहिं तुम्हारो बासा ।
सर्व ठौर जिमि दीप प्रकाशा ॥
यह विधि तुमको जानै कोई ।
भक्त अरु जानी कहिए सोई ॥
जगत पिता तुमहीं हो ईशा ।
याते हम विनवत जगदीशा ॥
नाथ कृपा अब हम पर कीजै ।
भक्ति आपनी हमको दीजै ॥
प्रेम भक्ति बिनु कृपा न होई ।
सर्व शास्त्र में देखै जोई ॥
कर्म योग कर सेवत कोई ।
ज्यों सेदै त्यों ही गति होई ॥
जो हरि ज्योति आप प्रगटाई ।
घर घर में सोई दरशाई ॥
तुम सब ठौर सबन ते न्यारे ।
को लखि सके चरित्र तुम्हारे ॥
तुम सबके प्रभु अन्तरयामी ।
जीव बिसर रहे तुमको स्वामी ॥
विश्वकर्मा को जो कोई ध्यावै ।
होय मुक्ति जीवन फल पावै ॥
डूब न जावे नाव हमारी ।
हम आये हैं शरण तुम्हारी ॥
हम सेवक हैं नाथ तुम्हारे ।
भव सागर से करौ किनारे ॥
सुत पितु मातु न कोई सङ्घाती ।
सब तजि भजन करहुं दिन राती ॥
दीनबन्धु दीनन हितकारी ।
शरण पड़ा हूं नाथ तुम्हारी ॥
विश्वकर्मा ही ब्रह्म कहावै ।
विश्वकर्मा सब सृष्टि रचावै ॥
पढ़ै जो विश्वकर्मा चालीसा ।
सुफल काज हों बीसों बीसा ॥
चालिस दिन जो ध्यान लगावै ।
राजद्रोह से मुक्ति पावै ॥
भूत प्रेत नहिं उनहिं सतावै ।
चालीसा में जो मन लावै ॥
धूप देय अरु जपै हमेशा ।
फिर नहिं पावै दुःख लवलेशा ॥
जो कोई अक्षत पुष्प चढ़ावे ।
होय मुक्त जग फिर नहिं आवै ॥
उसके जीवन का रखवारा ।
रहे नित्य विश्वकर्मा प्यारा ॥
सकल पदारथ करतल ताके ।
बसै ह्रदय विश्वकर्मा जाके ॥

॥ दोहा ॥
आदि सृष्टि आधार तुम, रचना विविध प्रकार ।
नाथ तुम्हारी कृपा बिन, केहि विधि उतरूं पार ॥
हाथ जोड़ विनती करूं, धरुं चरण माथ ।
पूर्ण होय मम कामना, यह वर दीजै कर्तार ॥

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श्री विश्वकर्मा चालीसा (संस्करण 2) का परिचय एवं महत्व

श्री विश्वकर्मा चालीसा का यह दूसरा संस्करण भी सृष्टि के आदि अभियंता, भगवान विश्वकर्मा (Lord Vishwakarma) को ही समर्पित है। इस चालीसा में उनके 'जगत गुरु' स्वरूप और ज्ञान-विज्ञान के प्रदाता के रूप में उनकी महिमा पर अधिक बल दिया गया है। इसमें उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सृजन, पालन और कल्याणकारी गुणों से युक्त बताया गया है।
इस संस्करण में विशेष रूप से उनके द्वारा रचित दिव्य अस्त्र-शस्त्रों जैसे विष्णु चक्र (Vishnu Chakra), शिव का त्रिशूल, इंद्र का धनुष, और पुष्पक विमान का उल्लेख है, जो उनकी असाधारण शिल्प कला (craftsmanship) और तकनीकी ज्ञान को दर्शाता है। यह चालीसा उन सभी भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो ज्ञान, विज्ञान और कला के क्षेत्र में उन्नति करना चाहते हैं।

विश्वकर्मा चालीसा पाठ के विस्तृत लाभ (फलश्रुति)

इस चालीसा के अंतिम छंद (Chhand) में इसके पाठ से प्राप्त होने वाले मुख्य लाभों का सार दिया गया है, जो साधक के जीवन को सफल और सुखमय बनाते हैं:
  • विघ्नों और सांसारिक बंधनों से मुक्ति (Freedom from Obstacles and Worldly Bonds): "भव फंद विघ्नों से उसे, प्रभु विश्वकर्मा दूर कर।" जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से इस चालीसा का पाठ या श्रवण करता है, भगवान विश्वकर्मा उसे सांसारिक बंधनों और सभी प्रकार के विघ्नों (obstacles) से मुक्त कर देते हैं।
  • कष्टों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति (Destruction of Sufferings and Attainment of Salvation): "मोक्ष सुख देंगे अवश्य ही, कष्ट विपदा चूर कर॥" भगवान विश्वकर्मा की कृपा से भक्त के सभी कष्ट और विपदाएं दूर हो जाती हैं और उसे अंत में मोक्ष (salvation) का परम सुख अवश्य प्राप्त होता है।
  • मनोकामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of Desires): "मोर मनोरथ पूर्ण कर, विश्वकर्मा दुष्टारि॥" चालीसा के आरंभ में ही यह प्रार्थना की गई है कि दुष्टों का नाश करने वाले हे विश्वकर्मा प्रभु, मेरे सभी मनोरथों को पूर्ण करें। उनकी उपासना से सभी सात्विक इच्छाएं पूरी होती हैं।
  • सुख-समृद्धि की प्राप्ति (Blessings of Happiness and Prosperity): "दे शिक्षा दुख दारिद्र नाश्यो। सुख समृद्धि जगमहँ परकाश्यो॥" भगवान विश्वकर्मा की दी हुई शिक्षा और कौशल से दुःख और दरिद्रता का नाश होता है तथा जीवन में सुख-समृद्धि (prosperity) का प्रकाश फैलता है।

पाठ करने की विधि

  • भगवान विश्वकर्मा की पूजा के लिए विश्वकर्मा पूजा का दिन (कन्या संक्रांति, जो प्रायः 17 सितंबर को होती है) सबसे महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, किसी भी नए कार्य, व्यापार या निर्माण को शुरू करने से पहले उनकी पूजा करना शुभ होता है।
  • प्रातःकाल स्नान करके अपने कार्यस्थल, दुकान या फैक्ट्री को स्वच्छ करें। अपने औजारों (tools) और मशीनों की भी सफाई करें और उन पर तिलक लगाएं।
  • भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उनके समक्ष घी का दीपक और धूप जलाएं।
  • उन्हें पीले पुष्प, अक्षत, फल और मिष्ठान्न अर्पित करें।
  • इसके बाद, पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ श्री विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करें। पाठ के उपरांत आरती करें और अपने कार्य में कुशलता, सुरक्षा (safety) और सफलता के लिए प्रार्थना करें।