श्री तुलसी चालीसा - Shree Tulsi Chalisa
Tulsi Chalisa 2

॥ दोहा ॥
श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय।
जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो तुलसी महारानी,
महिमा अमित न जाय बखानी॥
दियो विष्णु तुमको सनमाना,
जग में छायो सुयश महाना॥
विष्णुप्रिया जय जयतिभवानि,
तिहूँ लोक की हो सुखखानी॥
भगवत पूजा कर जो कोई,
बिना तुम्हारे सफल न होई॥
जिन घर तव नहिं होय निवासा,
उस पर करहिं विष्णु नहिं बासा॥
करे सदा जो तव नित सुमिरन,
तेहिके काज होय सब पूरन॥
कातिक मास महात्म तुम्हारा,
ताको जानत सब संसारा॥
तव पूजन जो करैं कुंवारी,
पावै सुन्दर वर सुकुमारी॥
कर जो पूजन नितप्रति नारी,
सुख सम्पत्ति से होय सुखारी॥
वृद्धा नारी करै जो पूजन,
मिले भक्ति होवै पुलकित मन॥
श्रद्धा से पूजै जो कोई,
भवनिधि से तर जावै सोई॥
कथा भागवत यज्ञ करावै,
तुम बिन नहीं सफलता पावै॥
छायो तब प्रताप जगभारी,
ध्यावत तुमहिं सकल चितधारी॥
तुम्हीं मात यंत्रन तंत्रन,
सकल काज सिधि होवै क्षण में॥
औषधि रूप आप हो माता,
सब जग में तव यश विख्याता॥
देव रिषी मुनि औ तपधारी,
करत सदा तव जय जयकारी॥
वेद पुरानन तव यश गाया,
महिमा अगम पार नहिं पाया॥
नमो नमो जै जै सुखकारनि,
नमो नमो जै दुखनिवारनि॥
नमो नमो सुखसम्पति देनी,
नमो नमो अघ काटन छेनी॥
नमो नमो भक्तन दुःख हरनी,
नमो नमो दुष्टन मद छेनी॥
नमो नमो भव पार उतारनि,
नमो नमो परलोक सुधारनि॥
नमो नमो निज भक्त उबारनि,
नमो नमो जनकाज संवारनि॥
नमो नमो जय कुमति नशावनि,
नमो नमो सुख उपजावनि॥
जयति जयति जय तुलसीमाई,
ध्याऊँ तुमको शीश नवाई॥
निजजन जानि मोहि अपनाओ,
बिगड़े कारज आप बनाओ॥
करूँ विनय मैं मात तुम्हारी,
पूरण आशा करहु हमारी॥
शरण चरण कर जोरि मनाऊं,
निशदिन तेरे ही गुण गाऊं॥
क्रहु मात यह अब मोपर दाया,
निर्मल होय सकल ममकाया॥
मंगू मात यह बर दीजै,
सकल मनोरथ पूर्ण कीजै॥
जनूं नहिं कुछ नेम अचारा,
छमहु मात अपराध हमारा॥
बरह मास करै जो पूजा,
ता सम जग में और न दूजा॥
प्रथमहि गंगाजल मंगवावे,
फिर सुन्दर स्नान करावे॥
चन्दन अक्षत पुष्प् चढ़ावे,
धूप दीप नैवेद्य लगावे॥
करे आचमन गंगा जल से,
ध्यान करे हृदय निर्मल से॥
पाठ करे फिर चालीसा की,
अस्तुति करे मात तुलसा की॥
यह विधि पूजा करे हमेशा,
ताके तन नहिं रहै क्लेशा॥
करै मास कार्तिक का साधन,
सोवे नित पवित्र सिध हुई जाहीं॥
है यह कथा महा सुखदाई,
पढ़े सुने सो भव तर जाई॥
तुलसी मैया तुम कल्याणी,
तुम्हरी महिमा सब जग जानी॥
भाव ना तुझे माँ नित नित ध्यावे,
गा गाकर मां तुझे रिझावे॥
॥ दोहा ॥
यह श्रीतुलसी चालीसा, पाठ करे जो कोय।
गोविन्द सो फल पावही, जो मन इच्छा होय॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय।
जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो तुलसी महारानी,
महिमा अमित न जाय बखानी॥
दियो विष्णु तुमको सनमाना,
जग में छायो सुयश महाना॥
विष्णुप्रिया जय जयतिभवानि,
तिहूँ लोक की हो सुखखानी॥
भगवत पूजा कर जो कोई,
बिना तुम्हारे सफल न होई॥
जिन घर तव नहिं होय निवासा,
उस पर करहिं विष्णु नहिं बासा॥
करे सदा जो तव नित सुमिरन,
तेहिके काज होय सब पूरन॥
कातिक मास महात्म तुम्हारा,
ताको जानत सब संसारा॥
तव पूजन जो करैं कुंवारी,
पावै सुन्दर वर सुकुमारी॥
कर जो पूजन नितप्रति नारी,
सुख सम्पत्ति से होय सुखारी॥
वृद्धा नारी करै जो पूजन,
मिले भक्ति होवै पुलकित मन॥
श्रद्धा से पूजै जो कोई,
भवनिधि से तर जावै सोई॥
कथा भागवत यज्ञ करावै,
तुम बिन नहीं सफलता पावै॥
छायो तब प्रताप जगभारी,
ध्यावत तुमहिं सकल चितधारी॥
तुम्हीं मात यंत्रन तंत्रन,
सकल काज सिधि होवै क्षण में॥
औषधि रूप आप हो माता,
सब जग में तव यश विख्याता॥
देव रिषी मुनि औ तपधारी,
करत सदा तव जय जयकारी॥
वेद पुरानन तव यश गाया,
महिमा अगम पार नहिं पाया॥
नमो नमो जै जै सुखकारनि,
नमो नमो जै दुखनिवारनि॥
नमो नमो सुखसम्पति देनी,
नमो नमो अघ काटन छेनी॥
नमो नमो भक्तन दुःख हरनी,
नमो नमो दुष्टन मद छेनी॥
नमो नमो भव पार उतारनि,
नमो नमो परलोक सुधारनि॥
नमो नमो निज भक्त उबारनि,
नमो नमो जनकाज संवारनि॥
नमो नमो जय कुमति नशावनि,
नमो नमो सुख उपजावनि॥
जयति जयति जय तुलसीमाई,
ध्याऊँ तुमको शीश नवाई॥
निजजन जानि मोहि अपनाओ,
बिगड़े कारज आप बनाओ॥
करूँ विनय मैं मात तुम्हारी,
पूरण आशा करहु हमारी॥
शरण चरण कर जोरि मनाऊं,
निशदिन तेरे ही गुण गाऊं॥
क्रहु मात यह अब मोपर दाया,
निर्मल होय सकल ममकाया॥
मंगू मात यह बर दीजै,
सकल मनोरथ पूर्ण कीजै॥
जनूं नहिं कुछ नेम अचारा,
छमहु मात अपराध हमारा॥
बरह मास करै जो पूजा,
ता सम जग में और न दूजा॥
प्रथमहि गंगाजल मंगवावे,
फिर सुन्दर स्नान करावे॥
चन्दन अक्षत पुष्प् चढ़ावे,
धूप दीप नैवेद्य लगावे॥
करे आचमन गंगा जल से,
ध्यान करे हृदय निर्मल से॥
पाठ करे फिर चालीसा की,
अस्तुति करे मात तुलसा की॥
यह विधि पूजा करे हमेशा,
ताके तन नहिं रहै क्लेशा॥
करै मास कार्तिक का साधन,
सोवे नित पवित्र सिध हुई जाहीं॥
है यह कथा महा सुखदाई,
पढ़े सुने सो भव तर जाई॥
तुलसी मैया तुम कल्याणी,
तुम्हरी महिमा सब जग जानी॥
भाव ना तुझे माँ नित नित ध्यावे,
गा गाकर मां तुझे रिझावे॥
॥ दोहा ॥
यह श्रीतुलसी चालीसा, पाठ करे जो कोय।
गोविन्द सो फल पावही, जो मन इच्छा होय॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
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श्री तुलसी चालीसा का परिचय एवं महत्व
श्री तुलसी चालीसा, हिन्दू धर्म में परम पूजनीय और पवित्र पौधे, तुलसी माता (Tulsi Mata) को
समर्पित है। तुलसी जी को केवल एक पौधा नहीं, बल्कि देवी लक्ष्मी का पार्थिव अवतार और भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी,
वृन्दा (Vrinda), का स्वरूप माना जाता है। इसी कारण उन्हें 'विष्णु प्रिया' भी कहा जाता है। कोई
भी वैष्णव अनुष्ठान या भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाती है।
यह चालीसा वृन्दा के पतिव्रता धर्म, उनके श्राप के कारण भगवान विष्णु के पत्थर (शालिग्राम) बनने और स्वयं तुलसी के पौधे के रूप में प्रकट होने की पौराणिक कथा का वर्णन करती है। यह उनके दिव्य गुणों और महत्व को दर्शाती है। घर में तुलसी का पौधा रखना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह न केवल वातावरण को शुद्ध करता है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) को भी दूर रखता है।
यह चालीसा वृन्दा के पतिव्रता धर्म, उनके श्राप के कारण भगवान विष्णु के पत्थर (शालिग्राम) बनने और स्वयं तुलसी के पौधे के रूप में प्रकट होने की पौराणिक कथा का वर्णन करती है। यह उनके दिव्य गुणों और महत्व को दर्शाती है। घर में तुलसी का पौधा रखना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह न केवल वातावरण को शुद्ध करता है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) को भी दूर रखता है।
तुलसी चालीसा पाठ के विस्तृत लाभ (फलश्रुति)
श्री तुलसी चालीसा का पाठ करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। इसके मुख्य लाभ चालीसा के अंतिम
दोहों में स्पष्ट रूप से बताए गए हैं:
- मनोकामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of Wishes): "गोविन्द सो फल पावही, जो मन इच्छा होय।" इस चालीसा का पाठ करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं भगवान गोविन्द (विष्णु) की कृपा से पूर्ण होती हैं।
- सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य (Prosperity and Good Health): "सुख सम्पत्ति से होय सुखारी।" तथा "निर्मल होय सकल ममकाया॥" माता तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-संपत्ति (wealth and prosperity) आती है और शरीर निरोगी (healthy) रहता है।
- उत्तम वर की प्राप्ति (Blessing for a Good Husband): "तव पूजन जो करैं कुंवारी, पावै सुन्दर वर सुकुमारी॥" जो अविवाहित कन्याएं माँ तुलसी का पूजन करती हैं, उन्हें सुयोग्य और सुंदर वर की प्राप्ति होती है।
- पापों से मुक्ति और मोक्ष (Freedom from Sins and Salvation): "श्रद्धा से पूजै जो कोई, भवनिधि से तर जावै सोई॥" जो भी पूरी श्रद्धा से माँ तुलसी की पूजा करता है, वह इस भवसागर से पार हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पाठ करने की विधि (Method of Recitation)
- तुलसी चालीसा का पाठ करने के लिए गुरुवार (Thursday), एकादशी (Ekadashi) और कार्तिक मास (Kartik Maas) का समय विशेष रूप से शुभ होता है। वैसे इसका नित्य पाठ भी किया जा सकता है।
- प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में स्थापित तुलसी के पौधे को प्रणाम करें।
- तुलसी जी को शुद्ध जल अर्पित करें (रविवार और एकादशी को छोड़कर)। उनके समक्ष गाय के घी का दीपक (deepdan) जलाएं और धूप दिखाएं।
- इसके बाद शांत मन से श्री तुलसी चालीसा का पाठ करें।
- पाठ के उपरांत, माँ तुलसी की परिक्रमा करें और उनसे घर में सुख-शांति, आरोग्य और भगवान विष्णु की भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करें।