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श्री काली चालीसा (संस्करण २) - Shree Kali Chalisa (Version 2)

Shree Kali Chalisa

श्री काली चालीसा (संस्करण २) - Shree Kali Chalisa (Version 2)
॥ दोहा ॥
जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज।
वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय निकुंज॥
जयति कपाली कालिका, कंकाली सुख दानि।
कृपा करहु वरदायिनी, निज सेवक अनुमानि॥

॥ चौपाई ॥
जय जय जय काली कंकाली।
जय कपालिनी, जयति कराली॥
शंकर प्रिया, अपर्णा, अम्बा।
जय कपर्दिनी, जय जगदम्बा॥
आर्या, हला, अम्बिका, माया।
कात्यायनी उमा जगजाया॥
गिरिजा गौरी दुर्गा चण्डी।
दाक्षाणायिनी शाम्भवी प्रचंडी॥
पार्वती मंगला भवानी।
विश्वकारिणी सती मृडानी॥
सर्वमंगला शैल नन्दिनी।
हेमवती तुम जगत वन्दिनी॥
ब्रह्मचारिणी कालरात्रि जय।
महारात्रि जय मोहरात्रि जय॥
तुम त्रिमूर्ति रोहिणी कालिका।
कूष्माण्डा कार्तिका चण्डिका॥
तारा भुवनेश्वरी अनन्या।
तुम्हीं छिन्नमस्ता शुचिधन्या॥
धूमावती षोडशी माता।
बगला मातंगी विख्याता॥
तुम भैरवी मातु तुम कमला।
रक्तदन्तिका कीरति अमला॥
शाकम्भरी कौशिकी भीमा।
महातमा अग जग की सीमा॥
चन्द्रघण्टिका तुम सावित्री।
ब्रह्मवादिनी मां गायत्री॥
रूद्राणी तुम कृष्ण पिंगला।
अग्निज्वाला तुम सर्वमंगला॥
मेघस्वना तपस्विनि योगिनी।
सहस्राक्षि तुम अगजग भोगिनी॥
जलोदरी सरस्वती डाकिनी।
त्रिदशेश्वरी अजेय लाकिनी॥
पुष्टि तुष्टि धृति स्मृति शिव दूती।
कामाक्षी लज्जा आहूती॥
महोदरी कामाक्षि हारिणी।
विनायकी श्रुति महा शाकिनी॥
अजा कर्ममोही ब्रह्माणी।
धात्री वाराही शर्वाणी॥
स्कन्द मातु तुम सिंह वाहिनी।
मातु सुभद्रा रहहु दाहिनी॥
नाम रूप गुण अमित तुम्हारे।
शेष शारदा बरणत हारे॥
तनु छवि श्यामवर्ण तव माता।
नाम कालिका जग विख्याता॥
अष्टादश तब भुजा मनोहर।
तिनमहँ अस्त्र विराजत सुन्दर॥
शंख चक्र अरू गदा सुहावन।
परिघ भुशण्डी घण्टा पावन॥
शूल बज्र धनुबाण उठाए।
निशिचर कुल सब मारि गिराए॥
शुंभ निशुंभ दैत्य संहारे।
रक्तबीज के प्राण निकारे॥
चौंसठ योगिनी नाचत संगा।
मद्यपान कीन्हैउ रण गंगा॥
कटि किंकिणी मधुर नूपुर धुनि।
दैत्यवंश कांपत जेहि सुनि-सुनि॥
कर खप्पर त्रिशूल भयकारी।
अहै सदा सन्तन सुखकारी॥
शव आरूढ़ नृत्य तुम साजा।
बजत मृदंग भेरी के बाजा॥
रक्त पान अरिदल को कीन्हा।
प्राण तजेउ जो तुम्हिं न चीन्हा॥
लपलपाति जिव्हा तव माता।
भक्तन सुख दुष्टन दुःख दाता॥
लसत भाल सेंदुर को टीको।
बिखरे केश रूप अति नीको॥
मुंडमाल गल अतिशय सोहत।
भुजामल किंकण मनमोहन॥
प्रलय नृत्य तुम करहु भवानी।
जगदम्बा कहि वेद बखानी॥
तुम मशान वासिनी कराला।
भजत तुरत काटहु भवजाला॥
बावन शक्ति पीठ तव सुन्दर।
जहाँ बिराजत विविध रूप धर॥
विन्धवासिनी कहूँ बड़ाई।
कहँ कालिका रूप सुहाई॥
शाकम्भरी बनी कहँ ज्वाला।
महिषासुर मर्दिनी कराला॥
कामाख्या तव नाम मनोहर।
पुजवहिं मनोकामना द्रुततर॥
चंड मुंड वध छिन महं करेउ।
देवन के उर आनन्द भरेउ॥
सर्व व्यापिनी तुम माँ तारा।
अरिदल दलन लेहु अवतारा॥
खलबल मचत सुनत हुँकारी।
अगजग व्यापक देह तुम्हारी॥
तुम विराट रूपा गुणखानी।
विश्व स्वरूपा तुम महारानी॥
उत्पत्ति स्थिति लय तुम्हरे कारण।
करहु दास के दोष निवारण॥
माँ उर वास करहू तुम अंबा।
सदा दीन जन की अवलंबा॥
तुम्हारो ध्यान धरै जो कोई।
ता कहँ भीति कतहुँ नहिं होई॥
विश्वरूप तुम आदि भवानी।
महिमा वेद पुराण बखानी॥
अति अपार तव नाम प्रभावा।
जपत न रहन रंच दुःख दावा॥
महाकालिका जय कल्याणी।
जयति सदा सेवक सुखदानी॥
तुम अनन्त औदार्य विभूषण।
कीजिए कृपा क्षमिये सब दूषण॥
दास जानि निज दया दिखावहु।
सुत अनुमानित सहित अपनावहु॥
जननी तुम सेवक प्रति पाली।
करहु कृपा सब विधि माँ काली॥
पाठ करै चालीसा जोई।
तापर कृपा तुम्हारी होई॥

॥ दोहा ॥
जय तारा, जय दक्षिणा, कलावती सुखमूल।
शरणागत 'भक्त' है, रहहु सदा अनुकूल॥

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श्री काली चालीसा का परिचय एवं महत्व

श्री काली चालीसा, आदि पराशक्ति माँ दुर्गा के सबसे प्रचंड और शक्तिशाली स्वरूप, महाकाली, को समर्पित है। 'काल' का अर्थ है समय, और माँ काली समय की भी नियंत्रक हैं, जो सृष्टि का आरंभ और अंत करती हैं। उनका श्याम वर्ण और भयावह स्वरूप दुष्टों में भय उत्पन्न करता है, परन्तु भक्तों के लिए वह अत्यंत करुणामयी और सुरक्षा प्रदान करने वाली माँ हैं। यह चालीसा माँ के विभिन्न नामों (जैसे तारा, छिन्नमस्ता, भैरवी) और उनके द्वारा किए गए दुष्ट-संहार (शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज) का गुणगान करती है। यह हमें सिखाती है कि माँ काली की उपासना से जीवन के सबसे गहरे अंधकार और भय पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।

काली चालीसा पाठ के विस्तृत लाभ

इस शक्तिशाली चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से माँ काली की असीम कृपा प्राप्त होती है:
  • भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति (Freedom from Fear and Negative Energies): "तुम्हारो ध्यान धरै जो कोई। ता कहँ भीति कतहुँ नहिं होई॥" माँ काली का ध्यान करने वाले भक्त के मन से हर प्रकार का भय समाप्त हो जाता है। उनकी कृपा से भूत-प्रेत और अन्य नकारात्मक शक्तियां पास नहीं आतीं।
  • पापों का नाश और संकटों से रक्षा (Destruction of Sins and Protection from Dangers): दोहे में कहा गया है, "हरनि ओघ अघ पुंज", अर्थात वे पापों के समूह का नाश करने वाली हैं। माँ अपने भक्तों को सभी संकटों से बचाती हैं ("सदा दीन जन की अवलंबा")।
  • शत्रुओं पर विजय (Victory Over Enemies): माँ काली दुष्टों का संहार करने वाली देवी हैं। उनकी उपासना करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और कोई भी अनिष्ट नहीं कर पाता।
  • मनोकामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of Desires): माँ कामाख्या के रूप में वे भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी करती हैं ("पुजवहिं मनोकामना द्रुततर")। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से उनकी शरण में आता है, माँ उसकी सभी इच्छाएं पूरी करती हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष (Spiritual Growth and Liberation): "तुम मशान वासिनी कराला। भजत तुरत काटहु भवजाला॥" माँ काली की भक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र (भवजाल) को काटकर साधक को मोक्ष प्रदान करती है।

पाठ करने की विधि

  • माँ काली की पूजा के लिए शनिवार का दिन और अमावस्या की रात्रि विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। नवरात्रि में भी उनका पाठ अत्यंत फलदायी होता है।
  • पूजा के लिए रात्रि का समय सर्वोत्तम है। स्नान करके काले या लाल वस्त्र धारण करें और दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजा स्थल पर माँ काली का चित्र या मूर्ति स्थापित करें और उनके समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  • उन्हें लाल गुड़हल (hibiscus) के फूल और मिठाई का भोग लगाएं।
  • पूर्ण श्रद्धा, साहस और एकाग्र मन से चालीसा का पाठ करें। पाठ के बाद माँ की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा याचना करें।