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श्री शनि चालीसा (दूसरा संस्करण) - Shree Shani Chalisa (Version 2)

Shani Chalisa 2

श्री शनि चालीसा (दूसरा संस्करण) - Shree Shani Chalisa (Version 2)
॥ दोहा ॥
श्री शनिश्चर देवजी, सुनहु श्रवण मम् टेर।
कोटि विघ्ननाशक प्रभो, करो न मम् हित बेर॥

॥ सोरठा ॥
तव स्तुति हे नाथ, जोरि जुगल कर करत हौं।
करिये मोहि सनाथ, विघ्नहरन हे रवि सुव्रन।

॥ चौपाई ॥
शनिदेव मैं सुमिरौं तोही।
विद्या बुद्धि ज्ञान दो मोही॥
तुम्हरो नाम अनेक बखानौं।
क्षुद्रबुद्धि मैं जो कुछ जानौं॥
अन्तक, कोण, रौद्रय मनाऊँ।
कृष्ण बभ्रु शनि सबहिं सुनाऊँ॥
पिंगल मन्दसौरि सुख दाता।
हित अनहित सब जग के ज्ञाता॥
नित जपै जो नाम तुम्हारा।
करहु व्याधि दुःख से निस्तारा॥
राशि विषमवस असुरन सुरनर।
पन्नग शेष सहित विद्याधर॥
राजा रंक रहहिं जो नीको।
पशु पक्षी वनचर सबही को॥
कानन किला शिविर सेनाकर।
नाश करत सब ग्राम्य नगर भर॥
डालत विघ्न सबहि के सुख में।
व्याकुल होहिं पड़े सब दुःख में॥
नाथ विनय तुमसे यह मेरी।
करिये मोपर दया घनेरी॥
मम हित विषम राशि महँवासा।
करिय न नाथ यही मम आसा॥
जो गुड़ उड़द दे बार शनीचर।
तिल जव लोह अन्न धन बस्तर॥
दान दिये से होंय सुखारी।
सोइ शनि सुन यह विनय हमारी॥
नाथ दया तुम मोपर कीजै।
कोटिक विघ्न क्षणिक महँ छीजै॥
वंदत नाथ जुगल कर जोरी।
सुनहु दया कर विनती मोरी॥
कबहुँक तीरथ राज प्रयागा।
सरयू तोर सहित अनुरागा॥
कबहुँ सरस्वती शुद्ध नार महँ।
या कहुँ गिरी खोह कंदर महँ॥
ध्यान धरत हैं जो जोगी जनि।
ताहि ध्यान महँ सूक्ष्म होहि शनि॥
है अगम्य क्या करूँ बड़ाई।
करत प्रणाम चरण शिर नाई॥
जो विदेश से बार शनीचर।
मुड़कर आवेगा निज घर पर॥
रहैं सुखी शनि देव दुहाई।
रक्षा रवि सुत रखैं बनाई॥
जो विदेश जावैं शनिवारा।
गृह आवैं नहिं सहै दुखारा॥
संकट देय शनीचर ताही।
जेते दुखी होई मन माही॥
सोई रवि नन्दन कर जोरी।
वन्दन करत मूढ़ मति थोरी॥
ब्रह्मा जगत बनावन हारा।
विष्णु सबहिं नित देत अहारा॥
हैं त्रिशूलधारी त्रिपुरारी।
विभू देव मूरति एक वारी॥
इकहोइ धारण करत शनि नित।
वंदत सोई शनि को दमनचित॥
जो नर पाठ करै मन चित से।
सो नर छूटै व्यथा अमित से॥
हौं सुपुत्र धन सन्तति बाढ़े।
कलि काल कर जोड़े ठाढ़े॥
पशु कुटुम्ब बांधन आदि से।
भरो भवन रहिहैं नित सबसे॥
नाना भाँति भोग सुख सारा।
अन्त समय तजकर संसारा॥
पावै मुक्ति अमर पद भाई।
जो नित शनि सम ध्यान लगाई॥
पढ़ै प्रात जो नाम शनि दस।
रहैं शनिश्चर नित उसके बस॥
पीड़ा शनि की कबहुँ न होई।
नित उठ ध्यान धरै जो कोई॥
जो यह पाठ करैं चालीसा।
होय सुख साखी जगदीशा॥
चालिस दिन नित पढ़ै सबेरे।
पातक नाशै शनी घनेरे॥
रवि नन्दन की अस प्रभुताई।
जगत मोहतम नाशै भाई॥
याको पाठ करै जो कोई।
सुख सम्पति की कमी न होई॥
निशिदिन ध्यान धरै मनमाहीं।
आधिव्याधि ढिंग आवै नाहीं॥

॥ दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों 'विमल' तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥
जो स्तुति दशरथ जी कियो, सम्मुख शनि निहार।
सरस सुभाषा में वही, ललिता लिखें सुधार॥

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श्री शनि चालीसा (संस्करण २) का परिचय एवं महत्व

यह श्री शनि चालीसा का एक विशिष्ट और दुर्लभ संस्करण है। इसके अंतिम दोहे से ज्ञात होता है कि इसकी रचना 'विमल' जी ने की है और यह उस स्तुति पर आधारित है जिसे राजा दशरथ ने शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए किया था। भगवान शनि सूर्य देव के पुत्र और न्याय के देवता हैं, जो व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान उनके प्रकोप को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस चालीसा का पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह चालीसा भगवान शनि के विभिन्न नामों का स्मरण करती है और भक्त की पीड़ा हरने की प्रार्थना करती है।

इस चालीसा के पाठ के विस्तृत लाभ

इस चालीसा का भक्तिपूर्वक पाठ करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और भक्तों को निम्नलिखित लाभ प्रदान करते हैं:
  • विघ्नों का नाश (Destruction of Obstacles): चालीसा की शुरुआत ही "कोटि विघ्ननाशक प्रभो" से होती है, जिसका अर्थ है कि शनिदेव करोड़ों बाधाओं का नाश करने वाले हैं। इसका पाठ जीवन के हर क्षेत्र में आने वाली रुकावटों को दूर करता है।
  • साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों में कमी (Relief from Sade Sati and Dhaiyya): शनि की महादशा के दौरान होने वाली परेशानियों, मानसिक तनाव और आर्थिक समस्याओं को कम करने के लिए यह पाठ एक अचूक उपाय है।
  • ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति (Attainment of Knowledge and Wisdom): "विद्या बुद्धि ज्ञान दो मोही" पंक्ति में साधक शनिदेव से ज्ञान और विवेक का वरदान मांगता है, जिससे सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • धन, संपत्ति और संतान सुख (Blessings of Wealth, Property, and Progeny): चालीसा में वर्णित है "हौं सुपुत्र धन सन्तति बाढ़े" और "सुख सम्पति की कमी न होई", जिसका अर्थ है कि इसके पाठ से धन, संपत्ति और उत्तम संतान का सुख प्राप्त होता है।
  • रोग और व्याधियों से मुक्ति (Freedom from Diseases): "करहु व्याधि दुःख से निस्तारा" और "आधिव्याधि ढिंग आवै नाहीं" जैसी पंक्तियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि शनिदेव की कृपा से शारीरिक और मानसिक रोगों से छुटकारा मिलता है।

पाठ करने की विधि

  • इस चालीसा का पाठ करने का सर्वोत्तम दिन शनिवार है।
  • सूर्यास्त के बाद, स्नान करके स्वच्छ नीले या काले वस्त्र पहनें और पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • शनिदेव की मूर्ति या चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  • उन्हें काले तिल, उड़द, गुड़ या लोहे से बनी वस्तु अर्पित कर सकते हैं।
  • पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता से चालीसा का कम से कम एक बार पाठ करें। चालीसा के अनुसार, 40 दिनों तक नियमित पाठ करने से यह सिद्ध होती है और साधक भवसागर से पार हो जाता है।