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भीष्म पितामह और उत्तरायण: मृत्यु के लिए क्यों चुना मकर संक्रांति का दिन? | Bhishma Pitamah Story

भीष्म पितामह और उत्तरायण: मृत्यु के लिए क्यों चुना मकर संक्रांति का दिन? | Bhishma Pitamah Story
बाणों की शैया पर भीष्म पितामह और श्री कृष्ण - महाभारत का दृश्य

भीष्म प्रतिज्ञा और उत्तरायण का रहस्य

58 दिन मृत्यु की प्रतीक्षा

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) केवल तिल-गुड़ खाने का त्योहार नहीं है, इसका संबंध जीवन के अंतिम सत्य यानी 'मृत्यु और मोक्ष' से है।

महाभारत के इतिहास में एक ऐसी घटना घटी जिसने इस दिन को अमर बना दिया। वह घटना थी—कुरू वंश के पितामह भीष्म का अपनी इच्छानुसार प्राण त्यागना। आखिर क्यों तीरों की शैया (Arrow Bed) पर लेटे हुए भीष्म ने 58 दिनों तक असहनीय पीड़ा सही, लेकिन अपने प्राण नहीं छोड़े? आइए जानते हैं इस रहस्यमयी कथा को।

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1. 'इच्छामृत्यु' का वरदान (The Boon of Iccha Mrityu)

भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था। उन्होंने अपने पिता राजा शांतनु के सुख के लिए आजीवन ब्रह्मचारी रहने की भीषण प्रतिज्ञा ली थी। इस त्याग से प्रसन्न होकर उनके पिता ने उन्हें 'इच्छामृत्यु' का वरदान दिया था।

  • अर्थ: "हे पुत्र! मृत्यु तुझे तब तक छू भी नहीं सकेगी, जब तक तू स्वयं उसका आहावान न करे।"

इसी वरदान के कारण वे काल (Time) और मृत्यु (Death) पर भी विजय पा चुके थे।

2. शर-शैया और 58 दिनों का इंतज़ार

महाभारत के युद्ध के 10वें दिन, अर्जुन ने शिखंडी को ढाल बनाकर भीष्म पर अनगिनत बाण चलाए। उनका पूरा शरीर तीरों से छलनी हो गया और वे रथ से नीचे गिरे। लेकिन उनका शरीर धरती को नहीं छुआ, बल्कि तीरों की एक 'शर-शैया' (Bed of Arrows) पर टिक गया। उस समय सूर्य दक्षिणायन (Dakshinayan) में थे।

समस्या: शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन (देवताओं की रात्रि) में मरने वाले जीव को मोक्ष नहीं मिलता, उसे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में आना पड़ता है। भीष्म, जो 8 वसुओं में से एक थे, 'मुक्ति' चाहते थे।

भीष्म की प्रतिज्ञा:


"जब तक सूर्य देव अपनी दिशा बदलकर उत्तर की ओर (उत्तरायण) नहीं हो जाते, मैं इन तीरों की चुभन सहूँगा, लेकिन प्राण नहीं त्यागूंगा।"

3. उत्तरायण का महत्व: अंधकार से प्रकाश की ओर

जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब उत्तरायण (Uttarayan) शुरू होता है।

  • दक्षिणायन: अंधकार और पितृ लोक का प्रतीक।
  • उत्तरायण: प्रकाश और देव लोक का द्वार।

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श्रीमद्भगवद्गीता (8.24) में भगवान कृष्ण कहते हैं:

अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छह महीनों में शरीर त्यागने वाले ब्रह्मज्ञानी पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

उत्तरायण काल मोक्ष का द्वार है, इसीलिए योगिजन इस समय की प्रतीक्षा करते हैं।

4. भीष्म नीति: अंतिम ज्ञान (The Final Wisdom)

भीष्म पितामह 58 दिनों तक तीरों पर लेटे रहे। इस दौरान युद्ध समाप्त हुआ। युधिष्ठिर (पांडव) उनके पास आए। तब भीष्म ने उन्हें 'राजधर्म' और 'मोक्षधर्म' का उपदेश दिया।

  • एक राजा को प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
  • धर्म और अधर्म में क्या भेद है?
  • शांति कैसे मिलती है?

यह संवाद महाभारत के 'शांति पर्व' में दर्ज है, जिसे भीष्म नीति कहा जाता है।

5. मोक्ष की प्राप्ति (The Final Journey)

माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (मकर संक्रांति के बाद) को जब सूर्य पूरी तरह उत्तरायण हो गए, तब भीष्म ने अपनी आँखें खोलीं।

  • सामने भगवान श्री कृष्ण चतुर्भुज रूप में खड़े थे।
  • उन्होंने कृष्ण की स्तुति की और योग क्रिया द्वारा अपने प्राणों को ब्रह्मरंध्र से बाहर निकाल दिया।
  • उनका तेज (Soul) सीधा आकाश में जाकर विलीन हो गया।
भीष्म अष्टमी और तर्पण

भीष्म पितामह निसंतान थे, इसलिए हर साल माघ शुक्ल अष्टमी को श्रद्धालु उनके लिए 'भीष्म तर्पण' करते हैं। मान्यता है कि उनका तर्पण करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।

शिक्षा (Lesson):


भीष्म का जीवन सिखाता है कि 'संकल्प' (Determination) से बड़ा कोई बल नहीं है। अगर मनुष्य ठान ले, तो वह समय और मृत्यु को भी अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर कर सकता है।


नमन है ऐसे महायोद्धा को! 🙏


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भीष्म पितामह कितने दिनों तक बाणों की शैया पर रहे?

भीष्म पितामह महाभारत युद्ध के 10वें दिन गिरे और उत्तरायण आने तक 58 दिनों तक तीरों की शैया पर लेटे रहे।

भीष्म ने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण का इंतज़ार क्यों किया?

शास्त्रों के अनुसार, उत्तरायण (देवताओं का दिन) में शरीर त्यागने से आत्मा को सीधा मोक्ष प्राप्त होता है और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है।

भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान किसने दिया था?

उन्हें यह वरदान उनके पिता राजा शांतनु ने उनकी भीषण प्रतिज्ञा और त्याग से प्रसन्न होकर दिया था।

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