श्री शीतलाष्टकम् (स्कन्दपुराण)

॥ विनियोग ॥
अस्य श्रीशीतलास्तोत्रस्यमहादेव ऋषिः।
अनुष्टुप् छन्दः। शीतला देवता।
लक्ष्मीर्बीजम्। भवानी शक्तिः।
सर्वविस्फोटकनिवृत्यर्थेजपे विनियोगः॥
ईश्वर उवाच।
वन्देऽहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोपेतांशूर्पालङ्कृतमस्तकाम्॥1॥
वन्देऽहं शीतलां देवींसर्वरोगभयापहाम्।
यामासाद्य निवर्तेतविस्फोटकभयं महत्॥2॥
शीतले शीतले चेतियो ब्रूयद्दाहपीडितः।
विस्फोटकभयं घोरंक्षिप्रं तस्य प्रणश्यति॥3॥
यस्त्वामुदकमध्ये तुध्यात्वा सम्पूजयेन्नरः।
विस्फोटकभयं घोरंगृहे तस्य न जायते॥4॥
शीतले ज्वरदग्धस्यपूतिगन्धयुतस्य च।
प्रणष्टचक्षुषःपुंसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम्॥5॥
शीतले तनुजान् रोगान्नृणां हरसि दुस्त्यजान्।
विस्फोटकविदीर्णानांत्वमेकाऽमृतवर्षिणी॥6॥
गलगण्डग्रहा रोगा येचान्ये दारुणा नृणाम्।
त्वदनुध्यानमात्रेणशीतले यान्ति सङ्क्षयम्॥7॥
न मन्त्रो नौषधं तस्यपापरोगस्य विद्यते।
त्वामेकां शीतले धात्रींनान्यां पश्यामि देवताम्॥8॥
॥ फल श्रुति ॥
मृणालतन्तुसदृशींनाभिहृन्मध्यसंस्थिताम्।
यस्त्वां सञ्चिन्तयेद्देवितस्य मृत्युर्न जायते॥9॥
अष्टकं शीतलादेव्यायो नरः प्रपठेत्सदा।
विस्फोटकभयं घोरंगृहे तस्य न जायते॥10॥
श्रोतव्यं पठितव्यं चश्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः।
उपसर्गविनाशायपरं स्वस्त्ययनं महत्॥11॥
शीतले त्वं जगन्माताशीतले त्वं जगत्पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्रीशीतलायै नमो नमः॥12॥
रासभो गर्दभश्चैवखरो वैशाखनन्दनः।
शीतलावाहनश्चैवदूर्वाकन्दनिकृन्तनः॥13॥
एतानि खरनामानिशीतलाग्रे तु यः पठेत्।
तस्य गेहे शिशूनां चशीतलारुङ् न जायते॥14॥
शीतलाष्टकमेवेदं नदेयं यस्यकस्यचित्।
दातव्यं च सदा तस्मैश्रद्धाभक्तियुताय वै॥15॥
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री शीतलाष्टकम् (Shri Sheetala Ashtakam), जो पवित्र स्कन्द पुराण (Skanda Purana) से लिया गया है और जिसे स्वयं भगवान शिव (ईश्वर) ने कहा है, देवी शीतला की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। 'शीतला' का अर्थ है 'शीतलता प्रदान करने वाली'। वे देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं, जो विशेष रूप से ज्वर (बुखार), चेचक (विस्फोटक), और अन्य संक्रामक चर्म रोगों से रक्षा करती हैं। इस स्तोत्र में उनके विशिष्ट स्वरूप का ध्यान किया जाता है - वे गर्दभ (गधे) पर विराजमान हैं, दिगंबरा हैं, और उनके हाथों में झाड़ू (मार्जनी) और कलश है तथा सिर पर सूप (शूर्प) सुशोभित है। यह प्रतीकात्मक रूप स्वच्छता के महत्व को दर्शाता है, क्योंकि झाड़ू और सूप सफाई के उपकरण हैं, जो रोगों को दूर रखने के लिए आवश्यक है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
इस स्तोत्र की फलश्रुति और श्लोकों में रोगों से रक्षा और आरोग्य के स्पष्ट लाभ वर्णित हैं:
विस्फोटक (चेचक) के भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Pox Diseases): स्तोत्र में बार-बार कहा गया है कि इसका पाठ करने से "विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते" अर्थात् उसके घर में चेचक जैसी महामारियों का भयंकर भय उत्पन्न नहीं होता। यह स्तोत्र परिवार, विशेषकर बच्चों को इन रोगों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच (protective shield) की तरह काम करता है।
सभी रोगों का नाश (Destruction of All Diseases): देवी को "सर्वरोगभयापहाम्" (सभी रोगों के भय को हरने वाली) कहा गया है। ज्वर, गलगण्ड, और अन्य दारुण रोगों का नाश उनके ध्यान मात्र से हो जाता है। उन्हें ज्वर से पीड़ित और अपनी दृष्टि खो चुके व्यक्ति के लिए "जीवनौषधम्" अर्थात् जीवनदायिनी औषधि कहा गया है।
अकाल मृत्यु से रक्षा (Protection from Untimely Death): नौवें श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति नाभि और हृदय के मध्य में स्थित देवी का ध्यान करता है, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती। यह दीर्घायु (long life) का आशीर्वाद प्रदान करता है।
बच्चों की सुरक्षा (Protection of Children): स्तोत्र के अंत में देवी के वाहन, गर्दभ के विभिन्न नामों का पाठ करने का विशेष विधान है। ऐसा करने वाले के घर में शिशुओं को शीतला रोग (जैसे चेचक, खसरा आदि) नहीं होता है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) के दिन करना अत्यंत फलदायी होता है, जो होली के आठवें दिन मनाई जाती है।
किसी भी प्रकार की महामारी, ज्वर या त्वचा संबंधी रोग होने पर, जल के पात्र को सामने रखकर देवी का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। उस जल को फिर रोगी पर छिड़कने या उसे पिलाने से लाभ मिलता है।
इसका पाठ श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाना चाहिए। स्तोत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसे किसी अश्रद्धालु व्यक्ति को नहीं देना चाहिए, बल्कि केवल उसी को देना चाहिए जिसके मन में श्रद्धा और भक्ति (faith and devotion) हो।
परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए इसका नियमित पाठ किया जा सकता है।