श्रीशारदादेव्यष्टकम्

न याचे समृद्धिं न चानित्यमायु-
र्न रूपं न धर्मं यशो वा समित्रम् ।
अधर्मं न कार्यं न दैन्यं दिवं वा
मतिर्मे तु भूयात् पदे शारदायाः ॥ १॥
स्वदेशे विदेशे भव त्वं दयार्द्रा-
त्वनीचे सुनीचे समाना विधात्री ।
जले वा भुवि त्वं प्रजानां शरण्या
नमस्ते नमस्ते पदे शारदायाः ॥ २॥
अजस्रं यथा ते भजाम्यङ्घ्रि युग्मं
यथा नाम तेऽहं जपामि सचिन्त्यः ।
अपूर्वान् गुणांस्ते स्मरामि प्रहृष्ट-
स्तथा शारदा त्वं विधेहि प्रसन्ना ॥ ३॥
वृथैव प्रयाति क्षणं मे वरेण्ये !
त्विदानीं प्रबोधो न जातस्त्रिनेत्रे ! ।
यदा शारदा त्वं ममासि प्रपद्या
भयं किं यमात् स्यान्नमः शारदायै ॥ ४॥
अहो कः शुभोऽयं प्रवृत्तोऽस्ति कालो
यतः शारदाम्बागताऽस्यां धरित्र्याम् ।
विचिन्त्य नरास्तां लीलां पवित्रा
ममर्त्या भवन्त्वप्रमत्ता भवन्तः ॥ ५॥
यथा जानकी सा सरामा समर्च्या
ह्यसौ राधिका वा सकृष्णा नमस्या ।
सती सा सशम्भुर्यथाराधनीया
तथा शारदा मे सरामासकृष्णा ॥ ६॥
रविस्त्वं शशी त्वं त्वमिन्द्रो यमस्त्वं
प्रचेतास्त्वमग्निर्विराझत्मनास्याः ।
भयानां भयं त्वं करालापि काली
धुनीते मनो मे कथं त्वाऽभिवन्दे ॥ ७॥
न कोऽप्यस्ति सत्यं मदीयो बिना त्वां
विषाक्ते द्वितीये गतिर्यो भवाब्धौ ।
असङ्ख्यानि जन्मानि सन्त्वम्बिके मे
सदा चेत् स्मरामि त्वदीये पदाब्जे ॥ ८॥
वृथा शब्दं परित्यज्य वद जिह्वे निरन्तरम् ।
शारदे शारदे मातः जयानन्दमयीति च ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्रीशारदादेव्यष्टकम् (Shri Sharadadevyashtakam) 19वीं सदी के महान संत श्रीरामकृष्ण परमहंस (Sri Ramakrishna Paramahamsa) की आध्यात्मिक सहधर्मिणी माँ सारदा देवी (Holy Mother Sri Sharada Devi) को समर्पित एक भावपूर्ण स्तोत्र है। यह अष्टकम् किसी पौराणिक देवी की नहीं, बल्कि उस माँ की स्तुति है जिन्होंने आधुनिक युग में धरती पर अवतरित होकर लाखों लोगों को मातृत्व, करुणा और आध्यात्मिक शांति का मार्ग दिखाया। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका निस्वार्थ भक्ति भाव है। पहला ही श्लोक सांसारिक इच्छाओं का त्याग करते हुए कहता है, "न याचे समृद्धिं..." अर्थात् मैं समृद्धि, आयु, रूप, धर्म, यश या मित्र नहीं चाहता, मेरी बुद्धि केवल माँ शारदा के चरणों में लगी रहे। यह स्तोत्र माँ के सार्वभौमिक और समदर्शी स्वरूप का गान करता है, जो ऊँच-नीच का भेद किए बिना सभी पर समान रूप से कृपा करती हैं।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को माँ सारदा की वात्सल्यपूर्ण कृपा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है:
निस्वार्थ भक्ति की प्राप्ति (Attainment of Selfless Devotion): यह स्तोत्र सांसारिक कामनाओं से ऊपर उठकर केवल माँ के चरणों में अविचल बुद्धि की प्रार्थना करता है। इसका पाठ करने से साधक के मन में निस्वार्थ भक्ति (selfless devotion) और वैराग्य का भाव जागृत होता है।
भय से मुक्ति (Freedom from Fear): चौथे श्लोक में कहा गया है, "यदा शारदा त्वं ममासि प्रपद्या भयं किं यमात् स्यात्" अर्थात् जब माँ शारदा जैसी रक्षक मेरे साथ हैं, तो मुझे यमराज से भी क्या भय हो सकता है? उनकी शरण लेने से मृत्यु सहित सभी प्रकार के भय (fear) समाप्त हो जाते हैं।
सार्वभौमिक प्रेम और समदर्शिता (Universal Love and Equanimity): माँ को "अनीचे सुनीचे समाना विधात्री" (नीच से भी नीच व्यक्ति पर समान कृपा करने वाली) कहा गया है। उनके इस गुण का स्मरण करने से साधक के मन में भी सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और समभाव (equanimity) का विकास होता है।
परम आश्रय का बोध (Realization of the Ultimate Refuge): आठवें श्लोक में भक्त कहता है, "न कोऽप्यस्ति सत्यं मदीयो बिना त्वां" (आपके बिना मेरा कोई नहीं है)। इस भाव से पाठ करने पर साधक को यह दृढ़ विश्वास होता है कि इस भवसागर में एकमात्र माँ ही सच्चा सहारा हैं, जिससे उसकी आध्यात्मिक यात्रा (spiritual journey) सुगम हो जाती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी दिन शुद्ध मन और भक्ति भाव से किया जा सकता है।
श्री सारदा देवी की जयंती, कल्पतरु दिवस (1 जनवरी), और रामकृष्ण मिशन से जुड़े अन्य उत्सवों पर इसका पाठ करना विशेष रूप से प्रेरणादायक होता है।
प्रातःकाल या सायंकाल में माँ सारदा देवी के चित्र के समक्ष बैठकर, उन्हें पुष्प अर्पित कर इस स्तोत्र का पाठ करने से मानसिक शांति (mental peace) और करुणा का संचार होता है।
जीवन में किसी भी प्रकार की निराशा, अकेलापन या भय महसूस होने पर इस स्तोत्र का पाठ करने से माँ की वात्सल्यपूर्ण उपस्थिति का अनुभव होता है और मन को बल मिलता है।