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श्री शारदाष्टकम् (नारायण गुरु कृत)

श्री शारदाष्टकम् (नारायण गुरु कृत)
श्रीशारदाष्टकम्

व्याप्यवाङ्मयमिदं जगत्स्थिता
व्यातनोतु मम देवताश्रियम् ।
कापिहस्तपरिवादिनीगळत्
काकळीलयकलाकुतूहला ॥ १॥
सात्विकीगुणविलासचित्रिता
यात्मनः परमपावनीकला ।
सा शिवानि विदधातु शारदा
शारदेन्दुकिरणोज्ज्वलाकृतिः ॥ २॥
देवि! नैव मतभेदनिर्गमान्
दुर्गमाञ्जिगमिषाम्यहं पथः ।
त्वां परां गतिमुपैमि कातरः
शारदे श्रुतिविशारदार्चिते ॥ ३॥
अम्ब योगिमृगितां पराभिधां
त्वां विभिन्नपरिणामसुन्दरीम् ।
पुष्कलार्त्थविभवामुपास्महे
स्फोटदर्शितविचित्रविभ्रमाम् ॥ ४॥
लुप्तरागसरणीस्सुनिश्चिता
लोकसङ्ग्रहविधौ पटीयसी ।
काचनाम्ब! धिषणाभवन्मयी
कर्मकौशलजुषा निषेव्यते ॥ ५॥
अव्यपेक्षसुभगा प्रगीयसे
त्वं मयाम्ब! धुतभेद वेदना ।
सा स्वयं रसमयी रतिः परा
प्रत्यगात्मपरमात्मगोचरा ॥ ६॥
रुद्धचित्तमरुतां सदाम्ब मे
रोचसे स्थितिरहो महोदया ।
पूर्णबोधपरिबाधितभ्रमा
पौरुषी पृथगलिङ्गसाक्षिणी ॥ ७॥
अस्तिभातिसुखमात्रलक्षणे
यन्मरौ जगदिदं मरीचिका ।
सा सदा हृदि मयाम्ब! निष्कला
संविदौपनिषदं निधीयसे ॥ ८॥
जय नारायणगुरुप्रिये शिवगिरीश्वरी शारदे ।
चतुरास्याक्षिशरच्चन्द्रमरीचिके ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री शारदाष्टकम् (Shri Sharada Ashtakam) महान समाज सुधारक और अद्वैत वेदांत के ज्ञाता, श्री नारायण गुरु (Shri Narayana Guru) द्वारा रचित एक गहन दार्शनिक स्तोत्र है। यह स्तुति देवी शारदा (Goddess Sharada) को समर्पित है, जो ज्ञान और कला की देवी सरस्वती का ही एक रूप हैं। इस स्तोत्र की विशिष्टता यह है कि यह देवी को केवल ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप में नहीं, बल्कि उपनिषदों में वर्णित परब्रह्म, अर्थात् 'सत्-चित्-आनंद' स्वरूप (अस्ति-भाति-सुख-मात्र-लक्षणे) के रूप में देखता है। अंतिम पंक्ति "जय नारायणगुरुप्रिये शिवगिरीश्वरी शारदे" से यह स्पष्ट होता है कि यह स्तोत्र शिवगिरी में नारायण गुरु द्वारा प्रतिष्ठित शारदा देवी को संबोधित है। यह अष्टकम् भक्ति और ज्ञान योग का एक अद्भुत संगम है, जो देवी की शरण में जाकर परम सत्य का बोध करने की प्रार्थना करता है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस दार्शनिक स्तोत्र का पाठ करने से साधक को गहरे आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • आध्यात्मिक ज्ञान और विवेक (Spiritual Knowledge and Wisdom): यह स्तोत्र सीधे तौर पर देवी से 'श्री' अर्थात् आध्यात्मिक सम्पदा और ज्ञान की याचना करता है। इसका पाठ करने से साधक की बुद्धि निर्मल होती है और उसे सत्य-असत्य का भेद करने वाला विवेक (discernment) प्राप्त होता है।

  • अद्वैत बोध की प्राप्ति (Realization of Non-duality): स्तोत्र देवी को "पूर्णबोधपरिबाधितभ्रमा" (पूर्ण ज्ञान से भ्रम को बाधित करने वाली) और "प्रत्यगात्मपरमात्मगोचरा" (जीवात्मा और परमात्मा दोनों की अनुभूति कराने वाली) के रूप में देखता है। इसका चिंतन करने से अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के सिद्धांतों को समझने में सहायता मिलती है।

  • कर्म कौशल (Skill in Action): पांचवें श्लोक में कहा गया है कि कर्म में कुशल व्यक्ति देवी की बुद्धि-स्वरूपा का ही आश्रय लेते हैं। इसका अर्थ है कि देवी की कृपा से व्यक्ति को अपने सांसारिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों को कुशलतापूर्वक और बिना आसक्ति के करने की क्षमता प्राप्त होती है, जो कर्म योग (Karma Yoga) का सार है।

  • मन की शांति और शरणागति (Mental Peace and Surrender): तीसरे श्लोक में भक्त अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहता है कि वह जटिल दार्शनिक मार्गों पर नहीं चल सकता, इसलिए वह कातर होकर देवी की ही शरण लेता है। यह शरणागति का भाव (feeling of surrender) अहंकार को कम करता है और मन को शांत करता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह स्तोत्र ज्ञान के साधकों, विद्यार्थियों, और दार्शनिक चिंतन में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

  • सरस्वती पूजा (Vasant Panchami), नवरात्रि (विशेषकर शारदीय नवरात्रि) और गुरु पूर्णिमा के दिन इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।

  • इसका पाठ सुबह के समय, ध्यान या स्वाध्याय से पहले करना चाहिए, ताकि चित्त ज्ञान ग्रहण करने के लिए तैयार हो सके।

  • पाठ करते समय केवल शब्दों के उच्चारण पर ही नहीं, बल्कि उनके गहरे दार्शनिक अर्थों पर भी मनन करने का प्रयास करना चाहिए।