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श्री सरयू अष्टकम्

श्री सरयू अष्टकम्
श्री सरयू अष्टकम्

नमस्ते सरयू देवि वसिष्ठ तनये शुभे ।
ब्रह्मादि सकलैर्देवैरृषिभिर्नारदादिभिः ॥ १॥
सदा त्वं सेविता देवि तथा सुकृतिभिर्नरैः ।
मानसाच्च समायाते जगतां पाप हारिणि ॥ २॥
स्मरतां पश्यतां देवि पापनाशे पटीयसि ।
ये पिबन्ति जलं देवि त्वदीयं गतमत्सराः ॥ ३॥
स्तनपानं न ते मातुः करिष्यन्ति कदाचन ।
मनु प्रभृतिभिर्मान्यैमानितासि सदा शुभे ॥ ४॥
त्वत्तीर मरणेनैव त्वन्नाम रटनेन च ।
ये त्यजन्ति तनुं देवि ते कृतार्था न संशयः ॥ ५॥
त्वं तु नेत्रोद्भवा देवि हरेर्नारायणस्य हि ।
महिमा तव देवैश्च गीयते च मुहुर्मुहुः ॥ ६॥
तत्र का हि मनः शक्तिः स्तवने मानुषस्य च ।
त्वत्तीरे सर्व तीर्थानि निवसन्ति चतुर्युगे ॥ ७॥
नमो देवि नमो देवि पुनरेव नमो नमः ।
हे वासिष्ठि महाभागे प्रणतं रक्ष बन्धनात् ॥ ८॥

इति श्रीसरयू अष्टकं सम्पूर्णम् ।

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री सरयू अष्टकम् (Shri Sarayu Ashtakam) पवित्र सरयू नदी को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जिसे देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। सरयू नदी का हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्व है क्योंकि यह भगवान श्री राम की जन्मभूमि, पवित्र नगरी अयोध्या (Ayodhya) से होकर बहती है। इस स्तोत्र में सरयू जी के विभिन्न दिव्य उद्गमों का वर्णन है - उन्हें ब्रह्मा के मानसरोवर से उत्पन्न (मानसाच्च समायाते), भगवान विष्णु के नेत्रों से प्रकट (नेत्रोद्भवा देवि हरेः) और महर्षि वसिष्ठ की पुत्री (वसिष्ठ तनये) कहा गया है। यह अष्टकम् सरयू जी की पाप-नाशक शक्ति और उनके तट पर देह-त्याग करने से मिलने वाली मुक्ति की महिमा का गान करता है। यह स्तोत्र भक्तों को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने के लिए देवी सरयू से एक मार्मिक प्रार्थना है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस पवित्र स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से सरयू मैया की कृपा से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • पापों का नाश (Destruction of Sins): स्तोत्र में सरयू जी को "जगतां पाप हारिणि" (जगत के पापों को हरने वाली) और "पापनाशे पटीयसि" (पाप का नाश करने में अत्यंत कुशल) कहा गया है। उनका स्मरण करने, दर्शन करने या उनके जल का पान करने मात्र से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।

  • जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (Liberation from the Cycle of Birth and Death): तीसरे और चौथे श्लोक में कहा गया है कि जो लोग सरयू जल का पान करते हैं, उन्हें फिर से मातृ-गर्भ में नहीं आना पड़ता ("स्तनपानं न ते मातुः करिष्यन्ति कदाचन")। यह जन्म-मरण के बंधन (bondage of birth and death) से मुक्ति का स्पष्ट संकेत है।

  • निश्चित मोक्ष की प्राप्ति (Guaranteed Liberation): पांचवें श्लोक में यह आश्वासन दिया गया है कि जो व्यक्ति सरयू के तट पर अपने प्राण त्यागता है या उनके नाम का रटन करता है, वह निश्चित रूप से कृतार्थ हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। यह मोक्ष (Moksha) प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है।

  • सर्व-तीर्थों का फल (Fruit of All Pilgrimages): सातवें श्लोक के अनुसार, सरयू के तट पर सभी तीर्थ चारों युगों से निवास करते हैं। अतः, सरयू में स्नान करने या उनके तट पर रहने से सभी तीर्थों की यात्रा (pilgrimage) का पुण्य फल प्राप्त होता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद करना अत्यंत शुभ होता है।

  • राम नवमी (Rama Navami), विवाह पंचमी, और अयोध्या से जुड़े अन्य पर्वों पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी है।

  • अयोध्या की यात्रा करने पर, सरयू नदी में स्नान करते समय या उनके तट पर बैठकर इस स्तोत्र का पाठ करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

  • घर पर पूजा करते समय भी एक पात्र में जल रखकर उसे सरयू का स्वरूप मानकर इस स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है, जिससे घर में पवित्रता और शांति का वास होता है।