श्री सङ्कटाष्टकम्

नमो कासिनी वासिनी गङ्गतीरे
सदा अर्चितं चन्दनं रक्तपुष्पम् ।
सदा वन्दितं पूजितं सर्वदेवं
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ १॥
नमो मोहिनी मोहितं भूतसैन्यं
सदा चन्द्रबदनी हंसैर्विहारम् ।
सदा मृगनयनी त्रिगुणरूपवर्णी
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ २॥
नमो खड्गहस्ते गले रुण्डमाला
नमो गर्जितं भूमिकम्पायमाना ।
सदा मर्दितो भूतमहिषासुरश्च
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ ३॥
नमो मुक्तिदेवी नमो वेदमाता
सदा योगिनी योगिनी योगगम्या ।
सदा कामिनी मोहितं कामराज्यं
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ ४॥
नमो पुष्पशय्या गले रुण्डमाला
सदा कोकिला काञ्चनं रूपवर्णी ।
सदा रणविषे शत्रुसंहारकरणी
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ ५॥
इदं पञ्चरत्नं पठेत् प्रातकाले
हरेत् पाप तन के बढ़े धर्मज्ञानम् ।
सदा दुःख में कष्ट में रक्ष पालं
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ ६॥
तुही सङ्कटे योगिनी योगधारं
तुही कामिनी मोहितं कामराज्यम् ।
तुही विश्वमाता करे खड्गधारं
नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी ॥ ७॥
सङ्कटाष्टकमिदं पुण्यं प्रातःकाले पठेन्नरः
तस्य पीडा विनिर्याति सर्वकामफलं लभेत् ॥ ८॥
इति सङ्कटाष्टकं सम्पूर्णम् ।
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री सङ्कटाष्टकम् (Shri Sankatashtakam), देवी दुर्गा के 'संकट' हरने वाले स्वरूप, माँ संकटा (Sankata Devi) को समर्पित एक अत्यंत प्रभावी स्तोत्र है। 'संकट' का अर्थ है 'खतरा' या 'कठिनाई'। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह स्तोत्र जीवन में आने वाली सभी प्रकार की विपत्तियों, कष्टों और संकटों को दूर करने के लिए रचा गया है। प्रत्येक श्लोक का अंत "नमो सङ्कटा कष्टहरणी भवानी" से होता है, जो देवी भवानी के उस रूप को नमन है जो कष्टों का हरण करती हैं। इस स्तोत्र में देवी को काशी-वासिनी (resident of Kashi) कहा गया है, जो वाराणसी में स्थित उनके प्रसिद्ध संकटा माता मंदिर की ओर संकेत करता है। यह स्तोत्र देवी के मोहिनी, रौद्र (खड्गधारिणी), और योगिनी स्वरूपों का वर्णन करते हुए उन्हें ही अंतिम रक्षक और विश्वमाता के रूप में पूजता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
इस स्तोत्र की फलश्रुति और श्लोकों में वर्णित गुणों के आधार पर, इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
समस्त संकट और पीड़ा का नाश (Destruction of All Dangers and Pains): फलश्रुति स्पष्ट रूप से कहती है, "तस्य पीडा विनिर्याति"। जो व्यक्ति प्रातःकाल इसका पाठ करता है, उसकी सभी पीड़ाएं और संकट दूर हो जाते हैं। यह स्तोत्र जीवन की कठिन परिस्थितियों में एक सुरक्षा कवच (protective shield) के रूप में कार्य करता है।
सर्वकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): फलश्रुति का दूसरा भाग है "सर्वकामफलं लभेत्", जिसका अर्थ है कि साधक को सभी इच्छित फलों की प्राप्ति होती है। माँ संकटा न केवल संकट हरती हैं, बल्कि भक्त की सभी मनोकामनाएं (all desires) भी पूर्ण करती हैं।
पापों का नाश और धर्म-ज्ञान की वृद्धि (Destruction of Sins and Increase in Dharma/Knowledge): छठे श्लोक में कहा गया है कि यह "पंचरत्न" स्तोत्र पापों का हरण करता है और धर्म तथा ज्ञान में वृद्धि करता है। यह आंतरिक शुद्धि (inner purification) और नैतिक बल प्रदान करता है।
शत्रुओं पर विजय (Victory over Enemies): देवी को "शत्रुसंहारकरणी" (युद्ध में शत्रुओं का संहार करने वाली) के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी उपासना से साधक को अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (in the morning) करना सर्वोत्तम है।
मंगलवार और शुक्रवार (Tuesday and Friday) देवी की पूजा के लिए विशेष दिन हैं। इन दिनों में पाठ करने से शीघ्र फल मिलता है।
नवरात्रि (Navaratri) के नौ दिनों में, विशेषकर अष्टमी तिथि को, इसका पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है।
जब भी जीवन में कोई विशेष संकट, भय या बाधा आए, तो माँ संकटा का ध्यान करके पूरी श्रद्धा से इस अष्टकम् का पाठ करना चाहिए। स्तोत्र के अनुसार, उनकी पूजा में चन्दन और लाल पुष्प ("रक्तपुष्पम्") का विशेष महत्व है।