श्री जानकीजीवनाष्टकम्

तमर्भकं दर्पकदर्पचौरं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ १॥
श्रुत्वैव यो भूपतिमात्तवाचं वनं गतस्तेन न नोदितोऽपि ।
तं लीलयाह्लादविषादशून्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ २॥
जटायुषो दीनदशां विलोक्य प्रियावियोगप्रभवं च शोकम् ।
यो वै विसस्मारतमार्द्रचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ३॥
यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम् ।
तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ४॥
यद्ध्याननिर्धूतवियोगवह्निर्विदेहबाला विबुधारिवन्याम् ।
प्राणान्दधे प्राणमयं प्रभुं तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ५॥
यस्यातिवीर्याम्बुधिवीचिराजौ वंश्यैरहो वैश्रवणो विलीनः ।
तं वैरिविध्वंसनशीललीलं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ६॥
यद्रूपराकेशमयूखमालानुरञ्जिता राजरमापि रेजे ।
तं राघवेन्द्रं विबुधेन्द्रवन्द्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ७॥
एवं कृता येन विचित्रलीला मायामनुष्येण नृपच्छलेन ।
तं वै मरालं मुनिमानसानां श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ८॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री जानकीजीवनाष्टकम् (Shri Janaki Jivana Ashtakam) भगवान श्री राम की स्तुति में रचा गया एक अनूठा और भावपूर्ण स्तोत्र है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि यह श्री राम को सीधे संबोधित करने के बजाय उन्हें 'जानकीजीवन' अर्थात "जानकी के जीवन" (The Life of Janaki) के रूप में पूजता है। यह दृष्टिकोण श्री राम और माता सीता के अविभाज्य और अनन्य प्रेम संबंध को उजागर करता है। प्रत्येक श्लोक का अंत "श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि" (मैं उन जानकी के जीवन को नमन करता हूँ) से होता है। यह अष्टकम् रामायण की विभिन्न घटनाओं का स्मरण कराता है, लेकिन हर घटना में श्री राम के चरित्र के उन पहलुओं पर जोर देता है जो उनकी करुणा, कर्तव्यपरायणता और समभाव को दर्शाते हैं।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
यह स्तोत्र भगवान राम के आदर्श गुणों का ध्यान करने के लिए प्रेरित करता है:
समभाव और कर्तव्यपरायणता (Equanimity and Dutifulness): "तं लीलयाह्लादविषादशून्यं" - यह पंक्ति उस राम को नमन करती है जो पिता के वचन सुनकर वन जाते समय हर्ष और विषाद, दोनों से परे थे। यह हमें सुख-दुःख में समभाव (equanimity) बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
असीम करुणा (Infinite Compassion): "जटायुषो दीनदशां विलोक्य... यो वै विसस्मारतमार्द्रचित्तं" - जटायु की दीन दशा को देखकर श्री राम अपने प्रिय (सीता) के वियोग का दुःख भी भूल गए। यह उनकी असीम करुणा (compassion) को दर्शाता है, जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझते हैं।
शरणागत वत्सलता (Love for the Surrendered): "यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्" - उन्होंने वालि द्वारा सताए गए सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया। यह उनके 'शरणागतवत्सल' गुण को प्रकट करता है, जहाँ वे अपनी शरण में आए हुए की हर प्रकार से रक्षा करते हैं।
माया में भी परम सत्य (The Ultimate Reality even in Illusion): अंतिम श्लोक में उन्हें "मायामनुष्येण नृपच्छलेन" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि उन्होंने एक राजा के छल से मायावी मनुष्य का रूप धारण कर ये लीलाएं कीं। वे वास्तव में मुनियों के मन-मानस के हंस (परमात्मा) हैं।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस स्तोत्र का पाठ राम नवमी और विवाह पंचमी के दिन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
जो दम्पति अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य की कामना करते हैं, उनके लिए इस अष्टकम् का नित्य पाठ करना विशेष लाभकारी है।
इसका पाठ करने से व्यक्ति के हृदय में भगवान राम के आदर्श गुणों का संचार होता है और उसे जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
चूंकि यह स्तोत्र सीता-राम के युगल स्वरूप को उनके प्रेम के माध्यम से पूजता है, इसका पाठ करने से भक्तों को युगल सरकार की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है।