श्री धन्वन्तरि कृपाष्टकम्

जातं धन्वन्तरिं देवं भगवन्तं सदा भजे ॥ १॥
शास्त्रेषु वर्णितं रूपं दिव्यौषधिकराम्बुजम् ।
नित्यशः प्रणमामीशं धन्वन्तरिं कृपाऽर्णवम् ॥ २॥
शङ्खचक्रकराम्भोजं मङ्गलदण्डधारिणम् ।
धन्वन्तरिं हृदा वन्दे प्रचुरगुणसागरम् ॥ ३॥
इन्द्रादिसुरवृन्दैश्च गन्धर्वादिप्रपूजितम् ।
असीमकरुणासिन्धुं धन्वन्तरिं समाश्रये ॥ ४॥
वन्दारुवृन्दगेयञ्च ध्येयं सद्भिः सुधीवरैः ।
एवं धन्वन्तरिं वन्दे चारुदर्शनरूपिणम् ॥ ५॥
सर्वदा सर्वसम्पूज्यं निगमागमवर्णितम् ।
आनन्दसमधिष्ठानं धन्वन्तरिं भजे प्रियम् ॥ ६॥
ज्ञान-विज्ञानकेन्द्रञ्च जगच्चारुहितास्पदम् ।
औषधिदानसद्धेतुं नौमि धन्वन्तरिं मुदा ॥ ७॥
श्रेयस्करं दयासिन्धुं दीनबन्धुं नमाम्यहम् ।
धन्वन्तरिं महाभागं महामङ्गलरूपकम् ॥ ८॥
आरोग्यदानदातारं धन्वन्तरिकृपाष्टकम् ।
राधासर्वेश्वराद्येन शरणान्तेन निर्मितम् ॥ ९॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री धन्वन्तरि कृपाष्टकम् (Shri Dhanvantari Kripashtakam) भगवान विष्णु के अवतार, देवों के वैद्य और आयुर्वेद (Ayurveda) के जनक, भगवान धन्वन्तरि (Lord Dhanvantari) को समर्पित एक अत्यंत शुभ स्तोत्र है। पौराणिक कथा के अनुसार, वे समुद्र मंथन के समय अपने हाथों में अमृत कलश (pot of nectar) लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें स्वास्थ्य, आरोग्य और दीर्घायु का देवता माना जाता है। यह अष्टकम् उनके इन्हीं करुणामय और आरोग्यदाता स्वरूप की स्तुति करता है। प्रत्येक श्लोक उनके गुणों, जैसे दिव्य औषधियों को धारण करने वाले, करुणा के सागर और मंगलकारी रूप का वर्णन करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान धन्वन्तरि की कृपा प्राप्त होती है, जिससे सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
यह स्तोत्र भगवान धन्वन्तरि के आरोग्य प्रदायक स्वरूप पर केंद्रित है:
आरोग्य के दाता (Bestower of Health): स्तोत्र का नाम ही 'कृपाष्टकम्' है, और अंतिम श्लोक इसे "आरोग्यदानदातारं" कहता है, जिसका अर्थ है कि यह स्तोत्र अच्छा स्वास्थ्य (good health) और आरोग्य प्रदान करने वाला है।
दिव्य वैद्य का स्वरूप (Form of the Divine Physician): "दिव्यौषधिकराम्बुजम्" - उनके कमल रूपी हाथों में दिव्य औषधियां हैं। उनका ध्यान करने से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है।
ज्ञान-विज्ञान के केंद्र (Center of Knowledge and Science): उन्हें "ज्ञान-विज्ञानकेन्द्रञ्च" कहा गया है, जो दर्शाता है कि वे केवल रोगों को ही नहीं, बल्कि अज्ञान को भी दूर करते हैं और आयुर्वेद के गूढ़ ज्ञान-विज्ञान के मूल स्रोत हैं।
दीनबन्धु और कल्याणकारी (Friend of the Helpless and Benefactor): उन्हें "दीनबन्धुं" और "श्रेयस्करं" कहा गया है, अर्थात वे दीनों और दुखियों के मित्र हैं और सभी का कल्याण (well-being) करने वाले हैं।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस अष्टकम् का पाठ करने का सबसे शुभ अवसर धनतेरस (Dhanteras) या 'धनत्रयोदशी' है, जिसे भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य दिवस (जयंती) माना जाता ਹੈ।
जो व्यक्ति किसी रोग से पीड़ित है या जो उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता है, उसे प्रतिदिन, विशेषकर प्रातःकाल में, इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
आयुर्वेदिक चिकित्सकों और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए इस स्तोत्र का पाठ करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता ਹੈ, क्योंकि इससे उन्हें अपने कार्य में दैवीय सहायता और सफलता मिलती है।
पाठ करते समय भगवान धन्वन्तरि के उस स्वरूप का ध्यान करें जिसमें वे एक हाथ में अमृत कलश और दूसरे हाथ में दिव्य औषधियां धारण किए हुए हैं, और उनसे उत्तम स्वास्थ्य एवं आरोग्य के लिए प्रार्थना करें।