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श्री भुवनेश्वर्यष्टकम्

श्री भुवनेश्वर्यष्टकम्
भुवनेश्वरीं नमस्यामो भक्तकल्पद्रुमां सदा ।
वरदां कामदां शान्तां कृष्णातीरनिवासिनीम् ॥ १॥

सर्वसिद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदे शुभे ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ २॥

सर्वाभयप्रदे देवि सर्वदुष्टविनाशिनि ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ ३॥

सर्व क्लेशहरे देवि महाविष्णुस्वरूपिणी ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ ४॥

अन्तर्यामिस्वरूपेण स्थिते सर्वत्र सर्वगे ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ ५॥

भवनाश करे देवि भवभेषजदायिनी ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ ६॥

अविद्यापटलध्वंसि महानन्देऽभयप्रदे ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ ७॥

संसारतरणोपाये निर्जरैरूपसेविते ।
भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी ॥ ८॥

जय जय अम्बिके सिद्धप्रदे । अभिष्टदायिनी मुक्तिप्रदे ।
अभयप्रदे भक्तकामदे । महानन्दे भवानी ।
सर्वव्यापके विष्णुरूपिणी । महाकाली दुःखहारिणी ।
अज्ञानपटलध्वंसकारिणी । देवी मृडानी सर्वगे ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री भुवनेश्वर्यष्टकम् (Shri Bhuvaneshvari Ashtakam) देवी भुवनेश्वरी को समर्पित एक सरल और शक्तिशाली स्तोत्र है। माँ भुवनेश्वरी (Goddess Bhuvaneshwari) दस महाविद्याओं में से चौथी महाविद्या हैं और उनका नाम 'भुवन' (संसार) और 'ईश्वरी' (स्वामिनी) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ ہے 'संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी'। वे आकाश और स्थान (space) की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो सृष्टि को धारण करती हैं और उसका पोषण करती हैं। यह अष्टकम् देवी के करुणामय और वरदायक स्वरूप की स्तुति करता है। इसकी प्रत्येक पंक्ति "भुवनेश्वरी महाकालि मनोभीष्ट प्रदायिनी" (हे भुवनेश्वरी, हे महाकाली, मन की इच्छाओं को प्रदान करने वाली) दोहराती है, जो इस स्तोत्र के मुख्य उद्देश्य - मनोकामना पूर्ति (fulfillment of desires) - पर जोर देती है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

यह स्तोत्र देवी के सर्वव्यापी और सर्व-फलदायक स्वरूप का गुणगान करता है:

  • भक्तों के लिए कल्पवृक्ष (Wish-Fulfilling Tree for Devotees): पहली ही पंक्ति में उन्हें "भक्तकल्पद्रुमां" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं, जो उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं।

  • भुक्ति और मुक्ति की दात्री (Giver of Worldly Pleasures and Liberation): "सर्वसिद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदे शुभे" - यह पंक्ति दर्शाती ہے कि माँ भुवनेश्वरी सभी सिद्धियों के साथ-साथ सांसारिक भोग (भुक्ति) और आध्यात्मिक मोक्ष (mukti/liberation), दोनों को प्रदान करने वाली हैं।

  • सर्वव्यापी और अंतर्यामी (Omnipresent and All-Knowing): "अन्तर्यामिस्वरूपेण स्थिते सर्वत्र सर्वगे" - इसका अर्थ है कि वे अंतर्यामी रूप में सभी के भीतर और बाहर, हर जगह व्याप्त हैं। वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना हैं।

  • अज्ञान और भव-बंधन का नाश (Destroyer of Ignorance and Worldly Bonds): उन्हें "अविद्यापटलध्वंसि" (अविद्या के परदे को नष्ट करने वाली) और "भवनाश करे देवि" (संसार के बंधन को नष्ट करने वाली) कहा गया है। उनका ध्यान करने से अज्ञान (ignorance) दूर होता ہے और व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता ہے।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस अष्टकम् का पाठ किसी भी दिन, विशेषकर शुक्रवार (Friday) को, प्रातःकाल या संध्याकाल में किया जा सकता है।

  • गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri), जो महाविद्याओं की साधना के लिए विशेष मानी जाती है, में इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।

  • जो व्यक्ति सांसारिक सुख, धन-संपत्ति (wealth and prosperity), और सभी प्रकार की सिद्धियों की कामना करता है, उसे इस अष्टकम् का नियमित पाठ करना चाहिए।

  • पाठ करते समय माँ भुवनेश्वरी के शांत, सौम्य और वरदायिनी स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। उन्हें लाल पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है।