श्री भद्रकाल्यष्टकम्

मालालोलकलापकालकबरीभारावलीभासुरीम् ।
कारुण्यामृतवारिराशिलहरीपीयूषवर्षावलीं
बालांबां ललितालकामनुदिनं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ १॥
हेलादारितदारिकासुरशिरःश्रीवीरपाणोन्मद-
श्रेणीशोणितशोणिमाधरपुटीं वीटीरसास्वादिनीम् ।
पाटीरादिसुगन्धिचूचुकतटीं शाटीकुटीरस्तनीं
घोटीवृन्दसमानधाटियुयुधीं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ २॥
बालार्कायुतकोटिभासुरकिरीटामुक्तमुग्धालक-
श्रेणीनिन्दितवासिकामरुसरोजाकाञ्चलोरुश्रियम् ।
वीणावादनकौशलाशयशयश्र्यानन्दसन्दायिनी-
मम्बामम्बुजलोचनामनुदिनं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ३॥
मातङ्गश्रुतिभूषिणीं मधुधरीवाणीसुधामोषिणीं
भ्रूविक्षेपकटाक्षवीक्षणविसर्गक्षेमसंहारिणीम् ।
मातङ्गीं महिषासुरप्रमथिनीं माधुर्यधुर्याकर-
श्रीकारोत्तरपाणिपङ्कजपुटीं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ४॥
मातङ्गाननबाहुलेयजननीं मातङ्गसंगामिनीं
चेतोहारितनुच्छवीं शफरिकाचक्षुष्मतीमम्बिकाम् ।
जृंभत्प्रौढिनिशुंभशुंभमथिनीमंभोजभूपूजितां
सम्पत्सन्ततिदायिनीं हृदि सदा श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ५॥
आनन्दैकतरङ्गिणीममलहृन्नालीकहंसीमणीं
पीनोत्तुङ्गघनस्तनां घनलसत्पाटीरपङ्कोज्ज्वलाम् ।
क्षौमावीतनितंबबिंबरशनास्यूतक्वणत् किङ्किणीं
एणांङ्कांबुजभासुरास्यनयनां श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ६॥
कालांभोदकलायकोमलतनुच्छायाशितीभूतिमत्-
संख्यानान्तरितस्तनान्तरलसन्मालाकिलन्मौक्तिकाम् ।
नाभीकूपसरोजनालविलसच्छातोदरीशापदीं
दूरीकुर्वयि देवि, घोरदुरितं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ७॥
आत्मीयस्तनकुंभकुङ्कुमरजःपङ्कारुणालंकृत-
श्रीकण्ठौरसभूरिभूतिममरीकोटीरहीरायिताम् ।
वीणापाणिसनन्दनन्दितपदामेणीविशालेक्षणां
वेणीह्रीणितकालमेघपटलीं श्रीभद्रकालीं भजे ॥ ८॥
फलश्रुतिः
देवीपादपयोजपूजनमिति श्रीभद्रकाल्यष्टकं
रोगौघाघघनानिलायितमिदं प्रातः प्रगेयं पठन् ।
श्रेयः श्रीशिवकीर्तिसम्पदमलं सम्प्राप्य सम्पन्मयीं
श्रीदेवीमनपायिनीं गतिमयन् सोऽयं सुखी वर्तते ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री भद्रकाल्यष्टकम् (Shri Bhadrakalyashtakam) देवी के भद्रकाली (Bhadrakali) स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और काव्यात्मक स्तोत्र है। 'भद्र' का अर्थ है 'कल्याणकारी' और 'काली' का अर्थ है 'समय और अंधकार की देवी'। इस प्रकार, भद्रकाली देवी का वह उग्र स्वरूप हैं जो दुष्टों का संहार करके भक्तों का कल्याण करती हैं। यह अष्टकम् देवी के सौंदर्य, पराक्रम और कृपा का एक साथ वर्णन करता है। इसमें उनके काले केशों की तुलना मधुमक्खियों से, उनके क्रोध की तुलना प्रलय की अग्नि से, और उनकी करुणा की तुलना अमृत की वर्षा से की गई है। यह स्तोत्र देवी के उन सभी रूपों को नमन करता है, जिन्होंने महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ और दारिका जैसे असुरों का वध किया।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को देवी भद्रकाली की कृपा से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:
रोग और पापों का नाश (Destruction of Diseases and Sins): फलश्रुति में कहा गया है, "रोगौघाघघनानिलायितमिदं" - अर्थात यह अष्टकम् रोगों के समूह और पापों के बादल के लिए तेज हवा के समान है, जो उन्हें उड़ाकर नष्ट कर देता है।
यश, कीर्ति और संपत्ति की प्राप्ति (Attainment of Fame, Glory, and Wealth): जो भक्त प्रातःकाल इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे "श्रेयः श्रीशिवकीर्तिसम्पदमलं" - अर्थात कल्याण, शिव की कृपा, कीर्ति और प्रचुर धन-संपत्ति (wealth and prosperity) की प्राप्ति होती है।
अटल सद्गति और सुख (Eternal Salvation and Happiness): पाठक को "अनपायिनीं गतिमयन् सोऽयं सुखी वर्तते" - अर्थात उसे कभी नष्ट न होने वाली सद्गति (मोक्ष) प्राप्त होती ہے और वह इस लोक में भी सुखी रहता है।
संतान और सौभाग्य (Progeny and Good Fortune): स्तोत्र में देवी को "सम्पत्सन्ततिदायिनीं" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे अपने भक्तों को संपत्ति के साथ-साथ उत्तम संतान (good progeny) का वरदान भी देती हैं।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (in the morning) में, पवित्र होकर करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
नवरात्रि (Navratri) के दिनों में, विशेषकर अष्टमी और नवमी तिथि को, इस अष्टकम् का पाठ करने से देवी भद्रकाली की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
यह स्तोत्र शत्रुओं से सुरक्षा (protection from enemies), रोगों से मुक्ति और जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए एक अत्यंत प्रभावी उपाय है।
पाठ करते समय देवी के उग्र और साथ ही कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान करना चाहिए और उनसे अपने सभी कष्टों को हरने की प्रार्थना करनी चाहिए।