श्री गणेश अष्टकम् (गायत्री रचित)

निराकारसंसारसारं परेशम् ।
जगन्मङ्गलं विश्ववन्द्यं पवित्रं,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ १॥
प्रसन्नं सदा ब्रह्मरूपं तुरीयं,
सदैकाश्रयं प्राणिनामेकमात्रम् ।
परं नित्यमानन्दकन्दं निरीहं,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ २॥
गुरुं ज्ञानिनां योगिनां तत्त्वरूपं,
तथा प्राणिनां विघ्ननाशं गणेशम् ।
सदा मङ्गलं पार्वतीपुत्रमेकं,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ ३॥
सदूर्वादलं कुङ्कुमं रक्तपुष्पं,
तथा चन्दनं सुन्दरं रक्तवस्त्रम् ।
सदा धारकं ज्ञानमूर्तिं ह्यखण्डं,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ ४॥
सुसौम्यं निजं निर्विकल्पं वरेण्यं,
सुज्ञानं सुखं सत्स्वरूपं सुगम्यम् ।
सुसिद्धं मुनीशं महेशस्य पुत्रं,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ ५॥
सदा ध्यायमाना गणेशञ्च देवाः,
तथा प्रार्थयन्तश्च वेदाः गणेशम् ।
गणेशाश्रये सन्ति जीवाः समस्ताः,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ ६॥
प्रभुं धर्मकामार्थं मोक्षप्रदं तं,
पुनः पुत्रदं ज्ञानदं सर्वदं च ।
तथा साधकं सर्वकामप्रदञ्च,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ ७॥
अहं त्वां सदा प्रार्थये भो गणेश,
प्रसन्नो भवन् सर्वदा बुद्धिनाथ ।
परं दर्शनं मां ददातु ह्यनन्त,
प्रभुं सिद्धिदं तं गणेशं नमामि ॥ ८॥
प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा ये पठन्ति नराः सदा ।
श्रीगणेशाष्टकं स्तोत्रं सुखदं मोक्षदं भवेत् ॥ ९॥
॥ इति गायत्रीस्वरूप ब्रह्मचारीविरचितं श्रीगणेशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
यह श्री गणेश अष्टकम् (Shri Ganesh Ashtakam), जिसकी रचना गायत्री स्वरूप ब्रह्मचारी ने की है, भगवान गणेश की स्तुति में एक अत्यंत गहन और दार्शनिक स्तोत्र है। सामान्य स्तुतियों से भिन्न, यह अष्टकम् भगवान गणेश के निर्गुण (attributeless) और निराकार स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करता है, जो अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के दर्शन के अनुरूप है। इसमें गणेश जी को 'अजं' (अजन्मा), 'निर्मलं' (निर्मल), 'निर्गुणं' (गुणों से परे), और 'ज्ञानरूपं' (ज्ञान का स्वरूप) कहा गया है। यह स्तोत्र हमें याद दिलाता ਹੈ कि भगवान गणेश केवल हाथी के सिर वाले देवता ही नहीं, बल्कि वे स्वयं परब्रह्म हैं, जो संसार के सार और सभी कारणों के परम कारण हैं।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
यह स्तोत्र साधक को गणेश जी के तात्विक स्वरूप से जोड़ता है, जिसके अनेक लाभ हैं:
निर्गुण ब्रह्म का ध्यान (Meditation on the Formless Brahman): यह अष्टकम् हमें सिखाता है कि गणेश जी का ध्यान केवल उनके सगुण रूप (हाथी-मुख, मोदक) तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनका वास्तविक स्वरूप निराकार, नित्य और आनंद का स्रोत है।
सर्व-मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): सातवें श्लोक में उन्हें धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष (Dharma, Artha, Kama, Moksha), इन चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाला कहा गया है। वे साधक की सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
ज्ञान और बुद्धि के दाता (Bestower of Knowledge and Intellect): "गुरुं ज्ञानिनां योगिनां तत्त्वरूपं" - वे ज्ञानियों और योगियों के गुरु और तत्त्व-स्वरूप हैं। 'बुद्धिनाथ' के रूप में वे अपने भक्तों को श्रेष्ठ बुद्धि और विवेक (intellect and wisdom) प्रदान करते हैं।
फलश्रुति - सुख और मोक्ष (Benefit - Happiness and Liberation): अंतिम श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया ਹੈ, "श्रीगणेशाष्टकं स्तोत्रं सुखदं मोक्षदं भवेत्" - अर्थात, जो व्यक्ति प्रातःकाल पवित्र होकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे जीवन में सुख (happiness) और अंत में मोक्ष (liberation) की प्राप्ति होती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
फलश्रुति के अनुसार, इस अष्टकम् का पाठ प्रातःकाल (in the morning), स्नान आदि से पवित्र होकर, प्रतिदिन करना चाहिए।
गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) और प्रत्येक बुधवार (Wednesday) को इस स्तोत्र का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता ਹੈ।
पाठ करते समय गणेश जी के ज्ञान-स्वरूप, शांत और निर्गुण ब्रह्म रूप का ध्यान करना चाहिए।
यह स्तोत्र उन साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो भक्ति के साथ-साथ ज्ञान मार्ग पर चलकर परमतत्व को समझना चाहते हैं।