पर्वतवर्धिन्यष्टकम् (श्री राम कृत)

ईड्यामागमवेदिभिर्मुनिगणैः ध्येयां सदा योगिभिः ।
ध्येयां तुम्बुरुनारदप्रभृतिभिः ब्रह्मादिभिः पूजितां
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ १॥
गौरीं हारकिरीटनूपरलसत्खण्डेन्दुभूषान्वितां
विद्यां वेदशिरोभिरीड्यमहिमामीशानदेहालयाम् ।
भक्ताभीष्टवरप्रदानचतुरां संसारसंहारिणीं
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ २॥
मायामात्रविनोदनिर्मितजगद्रक्षान्तकृत्यान्वितां
सेतौ सादरमागताखिलजगत्क्षेमाय सम्प्रस्थिताम् ।
भक्ताघौघवनानलोज्ज्वलशिखां राजीवनेत्रद्वयां
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ ३॥
दुर्गे गौरि भवानि पार्वति शिवे शर्वाणि रुद्रप्रिये
मातर्लोकजनन्यभीष्टवरदे शैलेन्द्रकन्ये उमे ।
चिन्तातीतपते चिरन्तननुते षड्वक्त्रलीलारते
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ ४॥
गन्धर्वामरयक्षपन्नगवधूसीमन्तलग्नाङ्घ्रिके
भक्ताभीष्टदकल्पकायितभुजे संवीक्षितेशानने ।
कण्ठेन्द्वङ्कितमस्तके त्रिनयने पिताम्बरे श्यामले
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ ५॥
गायत्र्यादिसरित्सरोदधितडाकौघैः सदा सेवितां
राजत्कर्णविलम्बिकुण्डलमणिश्रेणिप्रभारञ्जिताम् ।
उत्तुङ्गस्तनमध्ययुग्मविलसद्धारां करालालकां
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ ६॥
रक्षोराजवदौघचोदनकृपापूर्णावलोकेक्षणे
सर्वव्याकुलतापशोकशमने सांराज्यसौभाग्यदे ।
हत्याघौघविनाशनस्तुतिपदे मृत्युञ्जयार्दाकृते
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ ७॥
चित्तादर्शविकासिवर्ष्मरुचिरामुत्फुल्लवक्त्राम्बुजां
वीक्षालब्धविरिञ्चविष्णुविभवामापत्सहायाङ्घ्रिकाम् ।
देवीं दैवतवृन्दवन्दितपदां दैत्येन्द्रसंहारिणीं
वन्दे पर्वतवर्धितां स्मितमुखीं श्रीरामनाथेश्वरीम् ॥ ८॥
मातर्हैमवतीश्वरि त्रिनयने दाक्षायणीशप्रिये
बालेन्द्वङ्कितमस्तकेऽरुणरुचे षड्वक्त्रपीतस्तने ।
मां रामं जनकात्मजां च सहजं सुग्रीवमुख्यान्कपीन्
सर्वान् त्राहि नमोऽस्तु ते भगवति श्रीरामनाथेश्वरिम् ॥ ९॥
नमो गौर्यै पुनर्नमो शिवे राघवसन्नुते ।
नमो भवान्यै वरदे नमः शङ्करवल्लभे ॥ १०॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
पर्वतवर्धिन्यष्टकम् (Parvata Vardhini Ashtakam) एक अत्यंत विशेष और दुर्लभ स्तोत्र है, जो देवी पार्वती (Goddess Parvati) को समर्पित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी रचना स्वयं भगवान श्री राम (Lord Shri Rama) ने की थी। पौराणिक कथा के अनुसार, लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद, रावण-वध के ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति पाने के लिए श्री राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना करने का निश्चय किया। उस शिवलिंग के साथ पूजा के लिए देवी पार्वती की प्रतिमा भी स्थापित की गई, जिन्हें 'पर्वतवर्धिनी' नाम दिया गया। इस स्तोत्र की रचना श्री राम ने देवी पार्वती की स्तुति और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए की थी। यह स्तोत्र देवी को 'श्रीरामनाथेश्वरीम्' (श्री राम के नाथ, शिव की ईश्वरी) के रूप में संबोधित करता है, जो इसे अद्वितीय बनाता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और अर्थ
यह स्तोत्र भगवान राम की देवी के प्रति गहरी श्रद्धा को दर्शाता है:
सर्व-पूजनीय स्वरूप (Universally Worshipped Form): स्तोत्र में देवी को साधु-संतों, मुनियों, योगियों, ब्रह्मा और अन्य देवताओं द्वारा पूजित बताया गया है। यह उनके सार्वभौमिक और सर्वोच्च स्थान को दर्शाता ਹੈ।
भक्तों के लिए प्रार्थना (Prayer for Devotees): नौवें श्लोक में श्री राम केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि "मां रामं जनकात्मजां च सहजं सुग्रीवमुख्यान्कपीन् सर्वान् त्राहि" कहकर माता सीता, भाई लक्ष्मण, और सुग्रीव सहित पूरी वानर सेना की रक्षा (protection) के लिए प्रार्थना करते हैं। यह एक आदर्श राजा और नेता के गुणों को प्रदर्शित करता ਹੈ।
संसार की संहारिणी और रक्षिणी (Destroyer and Protector of the World): देवी को एक ओर "संसारसंहारिणीं" (संसार का संहार करने वाली) और दूसरी ओर "भक्ताभीष्टवरप्रदानचतुरां" (भक्तों को इच्छित वरदान देने में निपुण) कहा गया है। यह उनके दोहरे स्वरूप को दर्शाता है, जिसमें वे दुष्टों का नाश करती हैं और भक्तों का पालन करती हैं।
श्री राम द्वारा स्तुति (Praised by Shri Rama): अंतिम श्लोक में "राघवसन्नुते" (राघव द्वारा प्रशंसित) शब्द का प्रयोग इस स्तोत्र की दिव्यता और महत्व को और भी बढ़ा देता है। भगवान विष्णु के अवतार द्वारा स्वयं शक्ति की स्तुति करना, शिव और वैष्णव परंपराओं के बीच गहरे संबंध को उजागर करता है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
यह स्तोत्र शिव-पार्वती (Shiva-Parvati) की संयुक्त पूजा के लिए अत्यंत शुभ है, विशेषकर महाशिवरात्रि और नवरात्रि के दौरान।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए, रामनाथस्वामी (शिव) के दर्शन के बाद देवी पर्वतवर्धिनी के समक्ष इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
जो व्यक्ति अपने परिवार, टीम या समूह की रक्षा और कल्याण की कामना करता ਹੈ, उसके लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से लाभकारी है, क्योंकि इसमें स्वयं श्री राम ने अपने पूरे दल के लिए प्रार्थना की है।
इसका नियमित पाठ करने से भक्तों को देवी पार्वती और भगवान राम, दोनों की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सफलता (success) और कल्याण (well-being) सुनिश्चित होता ਹੈ।