नटराजाष्टकम्

शङ्करमन्तकमानहरं स्मरदाहकलोचनमेणधरम् ।
साञ्जलियोगिपतञ्जलिसन्नुतमिन्दुकलाधरमब्जमुखं
मञ्जुलशिञ्जितरञ्जितकुञ्चितवामपदं भज नृत्यपतिम् ॥ १॥
पिङ्गलतुङ्गजटावलिभासुरगङ्गममङ्गलनाशकरं
पुङ्गववाहमुमाङ्गधरं रिपुभङ्गकरं सुरलोकनतम् ।
भृङ्गविनीलगलं गणनाथसुतं भज मानस पापहरं
मङ्गलदं वररङ्गपतिं भवसङ्गहरं धनराजसखम् ॥ २॥
पाणिनिसूत्रविनिर्मितिकारणपाणिलसड्डमरूत्थरवं
माधवनादितमर्दलनिर्गतनादलयोद्धृतवामपदम् ।
सर्वजगत्प्रलयप्रभुवह्निविराजितपाणिमुमालसितं
पन्नगभूषणमुन्नतसन्नुतमानम मानस साम्बशिवम् ॥ ३॥
चण्डगुणान्वितमण्डलखण्डनपण्डितमिन्दुकलाकलितं
दण्डधरान्तकदण्डकरं वरताण्डवमण्डितहेमसभम् ।
अण्डकराण्डजवाहसखं नम पाण्डवमध्यममोदकरं
कुण्डलशोभितगण्डतलं मुनिवृन्दनुतं सकलाण्डधरम् ॥ ४॥
व्याघ्रपदानतमुग्रतरासुरविग्रहमर्दिपदाम्बुरुहं
शक्रमुखामरवर्गमनोहरनृत्यकरं श्रुतिनुत्यगुणम् ।
व्यग्रतरङ्गितदेवधुनीधृतगर्वहरायतकेशचयं
भार्गवरावणपूजितमीशमुमारमणं भज शूलधरम् ॥ ५॥
आसुरशक्तिविनाशकरं बहुभासुरकायमनङ्गरिपुं
भूसुरसेवितपादसरोरुहमीश्वमक्षरमुक्षधृतम् ।
भास्करशीतकराक्षमनातुरमाश्वरविन्दपदं भज तं
नश्वरसंसृतिमोहविनाशमहस्करदन्तनिपातकरम् ॥ ६॥
भूतिकरं सितभूतिधरं गतनीतिहरं वरगीतिनुतं
भक्तियुतोत्तममुक्तिकरं समशक्तियुतं शुभभुक्तिकरम् ।
भद्रकरोत्तमनामयुतं श्रुतिसामनुतं नम सोमधरं
स्तुत्यगुणं भज नित्यमगाधभवाम्बुधितारकनृत्यपतिम् ॥ ७॥
शूलधरं भवजालहरं निटिलाग्निधरं जटिलं धवलं
नीलगलोज्वलमङ्गलसद्गिरिराजसुतामृदुपाणितलम् ।
शैलकुलाधिपमौलिनतं छलहीनमुपैमि कपालधरं
कालविषाशमनन्तमिलानुतमद्भुतलास्यकरं गिरिशम् ॥ ८॥
चित्तहरातुलनृत्तपतिप्रियवृत्तकृतोत्तमगीतिमिमां
प्रातरुमापतिसन्निधिगो यदि गायति भक्तियुतो मनसि ।
सर्वसुखं भुवि तस्य भवत्यमराधिपदुर्लभमत्यधिकं
नास्ति पुनर्जनिरेति च धाम स शाम्भवमुत्तममोदकरम् ॥ ९॥
इति नटराजाष्टकं सम्पूर्णम् ।
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
नटराजाष्टकम् (Nataraja Ashtakam) भगवान शिव के नटराज (Nataraja) स्वरूप को समर्पित एक गहन और लयबद्ध स्तोत्र है। नटराज का अर्थ है 'नृत्य के राजा'। यह स्वरूप भगवान शिव की ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में कल्पना करता है, जिनका तांडव (Tandava) नृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (माया) और अनुग्रह (कृपा) की पंच क्रियाओं का प्रतीक है। यह अष्टकम् भगवान नटराज के दिव्य स्वरूप, उनके आभूषणों (जैसे गंगा, चंद्रमा, सर्प) और उनके ब्रह्मांडीय कार्यों का सुंदर वर्णन करता है। प्रत्येक श्लोक भगवान के एक अलग पहलू की स्तुति करता है, जो उन्हें नृत्य के स्वामी, अमंगल का नाश करने वाले और भवसागर से पार कराने वाले के रूप में पूजता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
यह स्तोत्र शिव के गतिशील और लयबद्ध स्वरूप का ध्यान करने के लिए प्रेरित करता है, जिसके निम्नलिखित लाभ हैं:
सर्व सुखों की प्राप्ति (Attainment of All Happiness): फलश्रुति में कहा गया है, "सर्वसुखं भुवि तस्य भवत्यमराधिपदुर्लभमत्यधिकं" - अर्थात, जो भक्त प्रातःकाल उमापति (शिव) के सानिध्य में इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक गान करता है, उसे इस पृथ्वी पर वे सभी सुख प्राप्त होते हैं जो देवराज इंद्र के लिए भी दुर्लभ हैं।
पुनर्जन्म से मुक्ति (Liberation from Rebirth): स्तोत्र का सबसे बड़ा लाभ यह है कि "नास्ति पुनर्जनिः" - ऐसे भक्त का फिर से जन्म नहीं होता है। वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
शिवधाम की प्राप्ति (Attainment of Shiva's Abode): अंतिम पंक्ति में कहा गया हैं। "एति च धाम स शाम्भवमुत्तममोदकरम्" - वह भक्त भगवान शिव के आनंदमय और उत्तम धाम को प्राप्त करता है। यह मोक्ष (Moksha) का सर्वोच्च रूप है।
कला और संगीत में निपुणता (Proficiency in Arts and Music): चूँकि यह स्तोत्र नृत्य और संगीत के देवता को समर्पित है, इसलिए कलाकारों, नर्तकों और संगीतकारों द्वारा इसका पाठ करने से उन्हें अपनी कला में दैवीय कृपा और निपुणता प्राप्त होती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ समय प्रातःकाल (morning), भगवान शिव के सानिध्य में है, जैसा कि फलश्रुति में बताया गया है।
महाशिवरात्रि (Mahashivratri), प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat), और विशेष रूप से 'आद्रा दर्शनम' (Arudra Darshanam) के दिन, जो भगवान नटराज को समर्पित है, इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।
पाठ करते समय भगवान नटराज के ब्रह्मांडीय नृत्य का ध्यान करना चाहिए - एक पैर से अज्ञान के दानव को दबाते हुए और दूसरे पैर को उठाए हुए, जो मोक्ष का प्रतीक है।
इसकी लयबद्ध प्रकृति के कारण, इसे संगीत के साथ गाने या सुनते हुए ध्यान करने से मन शीघ्र ही एकाग्र होता है और एक दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।