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नरहर्यष्टकम्

नरहर्यष्टकम्
यद्धितं तव भक्तानामस्माकं नृहरे हरे ।
तदाशु कार्यं कार्यज्ञ प्रळयार्कायुतप्रभ ॥ १॥

रटत्सटोग्र भ्रुकुटीकठोरकुटिलेक्षण ।
नृपञ्चास्य ज्वलज्ज्वालोज्ज्वलास्यारीन्हरे हर ॥ २॥

उन्नद्धकर्णविन्यास विवृतानन भीषण ।
गतदूषण मे शत्रून् हरे नरहरे हर ॥ ३॥

हरे शिखिशिखोद्भास्वदुरः क्रूरनखोत्कर ।
अरीन् संहर दंष्ट्रोग्रस्फुरज्जिह्व नृसिंह मे ॥ ४॥

जठरस्थजगज्जाल करकोट्युद्यतायुध ।
कटिकल्पतटित्कल्पवसनारीन् हरे हर ॥ ५॥

रक्षोध्यक्षबृहद्वक्षोरुक्षकुक्षिविदारण ।
नरहर्यक्ष मे शत्रुपक्षकक्षं हरे दह ॥ ६॥

विधिमारुतशर्वेन्द्रपूर्वगीर्वाणपुङ्गवैः ।
सदा नतांङ्घ्रिद्वन्द्वारीन् नरसिंह हरे हर ॥ ७॥

भयङ्करोर्वलङ्कार वरहुङ्कारगर्जित ।
हरे नरहरे शत्रून्मम संहर संहर ॥ ८॥

वादिराजयतिप्रोक्तं नरहर्यष्टकं नवम् ।
पठन्नृसिंहकृपया रिपून् संहरति क्षणात् ॥ ९॥

॥ इति श्रीमद्वादिराजपूज्यचरणविरचितं नरहर्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

नरहर्यष्टकम् (Narahari Ashtakam) भगवान विष्णु के उग्र अवतार, श्री नरसिंह (Lord Narasimha), को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। 'नरहरि' का अर्थ है 'मनुष्य-सिंह', जो भगवान के आधे मानव और आधे सिंह के दिव्य स्वरूप को दर्शाता है। इस अष्टकम् की रचना 15वीं शताब्दी के महान माध्व संत, दार्शनिक और कवि, श्री वादिराज तीर्थ (Shri Vadiraja Tirtha) ने की थी। यह स्तोत्र अपनी तीव्र ऊर्जा और फलश्रुति के लिए जाना जाता है, जिसमें मुख्य रूप से शत्रुओं के तत्काल विनाश के लिए प्रार्थना की गई है। प्रत्येक श्लोक भगवान के रौद्र रूप, जैसे जलती हुई ज्वाला जैसी आँखें, क्रूर नाखून, और भयंकर गर्जना का वर्णन करता है, और उनसे शत्रुओं को 'हर' (नष्ट) करने का आग्रह करता है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)

यह स्तोत्र भगवान नरसिंह के शरणागत-रक्षक और दुष्ट-विनाशक स्वरूप पर केंद्रित है:

  • शत्रुओं का शीघ्र नाश (Instant Destruction of Enemies): इस स्तोत्र का सर्वप्रमुख लाभ इसकी फलश्रुति में ही निहित है - "पठन्नृसिंहकृपया रिपून् संहरति क्षणात्"। अर्थात, जो इस नरहर्यष्टकम् का पाठ करता है, वह श्री नृसिंह की कृपा से क्षण भर में अपने शत्रुओं का संहार (destroys enemies) कर देता है।

  • भय और बाधाओं से मुक्ति (Freedom from Fear and Obstacles): भगवान नरसिंह का रौद्र रूप भक्तों के लिए अभय का वरदान है। उनके भयंकर हुंकार और गर्जना का ध्यान करने से सभी प्रकार के भय और जीवन में आने वाली बाधाएं (obstacles) दूर हो जाती हैं।

  • कार्य सिद्धि (Fulfillment of Tasks): पहले श्लोक में भक्त भगवान को 'कार्यज्ञ' (कार्यों को जानने वाले) कहकर संबोधित करता है और प्रार्थना करता है कि जो भी उसके लिए हितकारी है, उसे शीघ्र पूरा करें। यह कार्य सिद्धि (success in endeavors) के लिए एक शक्तिशाली प्रार्थना है।

  • देवताओं द्वारा पूजित (Worshipped by the Gods): स्तोत्र में उल्लेख है कि ब्रह्मा, वायु, शिव और इंद्र जैसे प्रमुख देवता भी सदा भगवान नरसिंह के चरणों की वंदना करते हैं। यह उनके परम और सर्वोच्च स्वरूप को दर्शाता है, जिनकी शरण लेने से सभी प्रकार की सुरक्षा (protection) प्राप्त होती हैं।।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक अत्यंत उग्र स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ केवल तभी करना चाहिए जब आप किसी गंभीर शत्रु बाधा, कानूनी मामलों या किसी बड़े संकट से जूझ रहे हों।

  • इसका पाठ करने का सबसे शुभ दिन शनिवार (Saturday) है, जो भगवान नरसिंह से जुड़ा माना जाता है।

  • पाठ शुरू करने से पहले भगवान नरसिंह का ध्यान करें और उनसे अपनी समस्या के निवारण के लिए स्पष्ट रूप से प्रार्थना करें। पाठ पूर्ण एकाग्रता और शुद्ध उच्चारण के साथ किया जाना चाहिए।

  • नरसिंह जयंती के दिन या किसी विशेष संकट के समय इस अष्टकम् का पाठ करने से भगवान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है और शत्रु बाधा शांत होती हैं।।