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महामृत्युञ्जयाष्टकम्

महामृत्युञ्जयाष्टकम्
ॐ मृत्युञ्जय ! परेशान जगदामयनाशन ! ।
तव ध्यानेन देवेश ! मृत्युं प्राप्तोऽपि जीवति ॥ १॥

पञ्चास्यदोर्द्दण्डदशाङ्घ्रिनेमदिनेशभालेन्दुयुतं गणेशैः ।
वामाङ्गसंस्थागिरिजासमेतं वन्दे महामृत्युविनाशरूपम् ॥ २॥

देवं मृत्युविनाशनं भयहरं साम्राज्यमुक्तिप्रदं
नानाभूतगणान्वितं दिवि पदैर्देवैः सदा सेवितम् ।
अज्ञानान्धकनाशनं शुभकरं विद्यासुसौख्यप्रदं
सर्वं सर्वपतिं महेश्वरहरं मृत्युञ्जयं भावये ॥ ३॥

वन्दे ईशानदेवाय नमस्तस्मै पिनाकिने ।
आदिमध्यान्तरूपाय मृत्युनाशं करोतु मे ॥ ४॥

नमस्तस्मै भगवते कैलासाचलवासिने ।
नमो ब्रह्मेन्द्ररूपाय मृत्युञ्जय प्रसीद मे ॥ ५॥

नमो विष्ण्वर्करूपाय नमो ज्ञानस्वरूपिणे ।
मृत्युं नाशयतामाशु मृत्युञ्जय प्रसीद मे ॥ ६॥

त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं पञ्चास्याय नमो नमः ।
दोर्द्दण्डचापाय नमो मम मृत्युं विनाशय ॥ ७॥

नमोऽर्धेन्दुस्वरूपाय नमो दिग्वसनाय च ।
नमो भक्तार्तिहन्त्रे च मम मृत्युं विनाशय ॥ ८॥

मृत्युञ्जयाष्टकं दिव्यं त्रिकाले यः पठेन्नरः ।
अपमृत्युर्व्रजेत्तस्य सत्यं सत्यं शिवाज्ञया ॥ ९॥

अर्धरात्रे जपेन्नित्यं चतुरशीतिसङ्ख्यया ।
काले मृत्युर्विनश्येत अकालाल्पस्य का कथा ॥ १०॥

आलस्येनाप्रसङ्गेन श्रद्धाहीनेन चेतसा ।
पठेद्यद्यप्यकालेषु ध्रुवं मृत्युं निवारये ॥ ११॥

॥ इति महामृत्युञ्जयाष्टकम् ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

महामृत्युञ्जयाष्टकम् (Mahamrityunjaya Ashtakam) भगवान शिव के 'मृत्युंजय' अर्थात मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र (Mahamrityunjaya Mantra) का ही एक विस्तृत और काव्यात्मक रूप है। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य मृत्यु के भय को दूर करना, असाध्य रोगों से मुक्ति पाना और दीर्घायु प्राप्त करना है। इसकी पहली ही पंक्ति "तव ध्यानेन देवेश ! मृत्युं प्राप्तोऽपि जीवति" (हे देवेश! आपके ध्यान मात्र से मृत्यु को प्राप्त हुआ व्यक्ति भी जीवित हो जाता है) इसके अमोघ प्रभाव को दर्शाती है। यह अष्टकम् भगवान शिव की सर्वोच्च शक्ति का आह्वान है, जो काल (समय और मृत्यु) के भी नियंत्रक हैं।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (अंतिम तीन श्लोक) में इसके पाठ के चमत्कारी लाभों का स्पष्ट उल्लेख है:

  • अकाल मृत्यु का निवारण (Prevention of Untimely Death): "अपमृत्युर्व्रजेत्तस्य सत्यं सत्यं शिवाज्ञया" - यह शिव की आज्ञा है कि जो व्यक्ति दिन में तीन बार इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसकी अकाल मृत्यु (untimely death) टल जाती है। यह इसका सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध लाभ है।

  • काल पर विजय (Victory over Time/Death): स्तोत्र में एक विशेष विधि का उल्लेख है - "अर्धरात्रे जपेन्नित्यं चतुरशीतिसङ्ख्यया। काले मृत्युर्विनश्येत..." अर्थात, जो आधी रात में इसका 84 बार जप करता है, उसकी निश्चित मृत्यु भी नष्ट हो जाती है, तो अकाल मृत्यु की तो बात ही क्या है।

  • असाधारण सुरक्षा (Extraordinary Protection): एक अद्भुत आश्वासन यह भी दिया गया है कि यदि कोई व्यक्ति बिना श्रद्धा के, आलस्य में या अनजाने में भी इसका पाठ कर ले, तो भी भगवान शिव निश्चित रूप से उसकी मृत्यु का निवारण करते हैं। यह भगवान शिव की असीम करुणा को दर्शाता है।

  • साम्राज्य और मुक्ति (Kingdom and Liberation): स्तोत्र में भगवान को "साम्राज्यमुक्तिप्रदं" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सांसारिक सफलता (साम्राज्य) और आध्यात्मिक मोक्ष (liberation) दोनों को प्रदान करने वाले हैं।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो, किसी दुर्घटना का भय हो या जीवन में संकट की स्थिति हो।

  • सर्वोत्तम फल के लिए, जैसा कि फलश्रुति में बताया गया है, इसका पाठ दिन में तीन बार (त्रिकाल संध्या) करना चाहिए।

  • महाशिवरात्रि (Mahashivratri), श्रावण मास (Shravan Month), और प्रत्येक सोमवार (Monday) को इसका पाठ करना अत्यंत शुभ और प्रभावी माना जाता है।

  • पाठ करते समय शिवलिंग पर जल या दूध से अभिषेक करना और बेल पत्र (Bilva leaves) अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान मृत्युंजय की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।