गायत्री अष्टकम् (विश्वामित्र रचित)

नित्यानित्यविवेकदां स्मितमुखीं खण्डेन्दुभूषोज्ज्वलाम् ।
ताम्बूलारुणभासमानवदनां मार्ताण्डमध्यस्थितां
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ १ ॥
जातीपङ्कजकेतकीकुवलयैः संपूजिताङ्घ्रिद्वयां
तत्त्वार्थात्मिकवर्णपङ्क्तिसहितां तत्त्वार्थबुद्धिप्रदाम् ।
प्राणायामपरायणैर्बुधजनैः संसेव्यमानां शिवां
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ २ ॥
मञ्जीरध्वनिभिः समस्तजगतां मञ्जुत्वसंवर्धनीं
विप्रप्रेङ्खितवारिवारितमहारक्षोगणां मृण्मयीम् ।
जप्तुः पापहरां जपासुमनिभां हंसेन संशोभितां
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ३ ॥
काञ्चीचेलविभूषितां शिवमयीं मालार्धमालादिकान्
बिभ्राणां परमेश्वरीं शरणदां मोहान्धबुद्धिच्छिदाम् ।
भूरादित्रिपुरां त्रिलोकजननीमध्यात्मशाखानुतां
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ४ ॥
ध्यातुर्गर्भकृशानुतापहरणां सामात्मिकां सामगां
सायंकालसुसेवितां स्वरमयीं दूर्वादलश्यामलाम् ।
मातुर्दास्यविलोचनैकमतिमत्खेटीन्द्रसंराजितां
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ५ ॥
सन्ध्यारागविचित्रवस्त्रविलसद्विप्रोत्तमैः सेवितां
ताराहीरसुमालिकां सुविलसद्रत्नेन्दुकुम्भान्तराम् ।
राकाचन्द्रमुखीं रमापतिनुतां शङ्खादिभास्वत्करां
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ६ ॥
वेणीभूशितमालकध्वनिकरैर्भृङ्गैः सदा शोभितां
तत्त्वज्ञानरसायनज्ञरसनासौधभ्रमद्भ्रामरीम् ।
नासालंकृतमौक्तिकेन्दुकिरणैः सायन्तमश्छेदिनीं
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ७ ॥
पादाब्जान्तररेणुकुङ्कुमलसत्फालद्युरामावृतां
रम्भानाट्यविलोकनैकरसिकां वेदान्तबुद्धिप्रदाम् ।
वीणावेणुमृदङ्गकाहलरवान् देवैः कृताञ्छृण्वतीं
गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ८ ॥
हत्यापानसुवर्णतस्करमहागुर्वङ्गनासङ्गमान्
दोषाञ्छैलसमान् पुरन्दरसमाः सञ्च्छिद्य सूर्योपमाः ।
गायत्रीं श्रुतिमातुरेकमनसा सन्ध्यासु ये भूसुरा
जप्त्वा यान्ति परां गतिं मनुमिमं देव्याः परं वैदिकाः ॥ ९ ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
गायत्री अष्टकम् (Gayatri Ashtakam) वेदों की माता, देवी गायत्री को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। इस विशेष अष्टकम् की रचना महान ब्रह्मर्षि विश्वामित्र (Brahmarshi Vishwamitra) ने की थी। विश्वामित्र वही ऋषि हैं जिन्हें गायत्री मंत्र का द्रष्टा माना जाता है, अर्थात उन्होंने ही तपस्या के बल पर गायत्री मंत्र के पूर्ण सामर्थ्य को जाना और उसे संसार के लिए प्रकट किया। यह अष्टकम् विश्वामित्र की गहन तपस्या का फल है, जिसमें वे देवी गायत्री के दिव्य, पंचमुखी और त्रिनयनी स्वरूप का ध्यान करते हैं। यह स्तोत्र न केवल देवी के सौंदर्य का वर्णन करता है, बल्कि उनके ज्ञान-प्रदायक और पाप-नाशक स्वरूप की भी स्तुति करता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
महापापों का नाश (Destruction of Great Sins): इस अष्टकम् की फलश्रुति (अंतिम श्लोक) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसका पाठ करने से हत्या, मदिरापान, स्वर्ण की चोरी और गुरुपत्नी गमन जैसे पर्वत के समान महापापों (greatest sins) का भी नाश हो जाता है।
परम गति की प्राप्ति (Attainment of Supreme Liberation): फलश्रुति यह भी बताती है कि जो ब्राह्मण या साधक संध्याकाल में एकाग्र मन से इस गायत्री अष्टकम् का जप करते हैं, वे "यान्ति परां गतिं" अर्थात परम गति (Moksha) को प्राप्त करते हैं।
विवेक और तत्त्वज्ञान (Discernment and True Knowledge): स्तोत्र में देवी को "नित्यानित्यविवेकदां" (नित्य और अनित्य का विवेक देने वाली) और "तत्त्वार्थबुद्धिप्रदाम्" (तत्त्व-ज्ञान की बुद्धि प्रदान करने वाली) कहा गया है। इसका पाठ साधक को सत्य और असत्य में भेद करने की क्षमता प्रदान करता हैं।।
मोह का नाश (Destruction of Delusion): देवी को "मोहान्धबुद्धिच्छिदाम्" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे मोह के अंधकार में डूबी हुई बुद्धि का छेदन कर देती हैं और ज्ञान का प्रकाश करती हैं।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस अष्टकम् का पाठ करने का सबसे उत्तम समय संध्याकाल (morning and evening twilight) है, जैसा कि फलश्रुति में बताया गया है।
गायत्री मंत्र का जप शुरू करने से पहले इस अष्टकम् का पाठ करने से मंत्र जप का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
पाठ करते समय देवी गायत्री (Goddess Gayatri) के पंचमुखी स्वरूप का ध्यान करना चाहिए और उनसे सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करनी चाहिए।
गायत्री जयंती और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ करना विशेष रूप से कल्याणकारी और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता हैं।।