Logoपवित्र ग्रंथ

गायत्री अष्टकम्

गायत्री अष्टकम्
सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम्
शिवामाद्यां वन्द्यां त्रिभुवनमयीं वेदजननीम् ।
परं शक्तिं स्रष्टुं विविधविध रूपां गुणमयीं
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ १॥

विशुद्धां सत्त्वस्थामखिल दुरवस्थादिहरणीं
निराकारां सारां सुविमल तपो मूर्तिमतुलाम् ।
जगज्ज्येष्ठां श्रेष्ठामसुरसुरपूज्यां श्रुतिनुतां
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ २॥

तपो निष्ठाभीष्टांस्वजनमनसन्तापशमनीं
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैकसुलभाम् ।
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भव बन्धापहरणीं
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ३॥

सदाराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकामालोकां हृदयगत मोहान्धहरणीम् ।
परां दिव्यां भव्यामगमभवसिन्ध्वेक तरणीं
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ४॥

अजां द्वैतां त्रैतां विविधगुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं-तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीम् ।
महामान्यां धन्यां सततकरुणाशील विभवां
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ५॥

जगद्धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमल तपो राशि सरणीम् ।
अनेकामेकां वै त्रिजगसदधिष्ठानपदवीं
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ६॥

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनमति जाड्यापहरणां
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीम् ।
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ७॥

अनन्तां शान्तां यां भजति बुध वृन्दः श्रुतिमयीं
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति हृदि नित्यं सुरपतिः ।
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रीतिवशगां
भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ८॥

शुद्ध चित्तः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम् ।
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति ॥ ९॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

गायत्री अष्टकम् (Gayatri Ashtakam) देवी गायत्री को समर्पित एक सुंदर और सारगर्भित स्तुति है। माँ गायत्री (Goddess Gayatri) को 'वेद माता' अर्थात वेदों की जननी कहा जाता है और वे सार्वभौमिक दिव्य चेतना का प्रतीक हैं। यह अष्टकम् देवी के कल्याणकारी, ज्ञान-प्रदायक, और भव-बंधन से मुक्त करने वाले स्वरूप का गुणगान करता है। प्रत्येक श्लोक का अंत "भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम्" से होता है, जिसका अर्थ है, "मैं उन माता गायत्री का भजन करता हूँ जो परम सौभाग्य और आनंद को जन्म देने वाली हैं।" यह स्तुति साधक को देवी के प्रति भक्ति और समर्पण के भाव से भर देती है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)

यह स्तोत्र देवी गायत्री के विभिन्न गुणों का वर्णन करता है, जिनके ध्यान से साधक को अनेक लाभ मिलते हैं:

  • ज्ञान और विवेक की प्राप्ति (Attainment of Knowledge and Wisdom): स्तोत्र में देवी को "सुमति मति विस्तारकरणीं" (अच्छी बुद्धि और ज्ञान का विस्तार करने वाली) और "हृदयगत मोहान्धहरणीम्" (हृदय में स्थित मोह के अंधकार को हरने वाली) कहा गया है। इसका पाठ करने से बुद्धि निर्मल होती है और ज्ञान (knowledge) की वृद्धि होती है।

  • भव-बंधन से मुक्ति (Liberation from Worldly Bonds): देवी को "निखिल भव बन्धापहरणीं" और "अगमभवसिन्ध्वेक तरणीं" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सभी सांसारिक बंधनों को काट देती हैं और इस दुर्गम भवसागर से पार कराने वाली एकमात्र नाव हैं। इसका पाठ मोक्ष (liberation) प्राप्ति में सहायक होता है।

  • सर्व-कल्याण और आनंद (Overall Well-being and Bliss): देवी का स्वरूप "सुकल्याणीं" (कल्याण करने वाली) और "परमसुभगानन्दजननीम्" (परम सौभाग्य और आनंद को जन्म देने वाली) है। उनका भजन करने से जीवन में सुख-शांति (peace and happiness) आती हैं।।

  • फलश्रुति - माता की प्रसन्नता (Benefit - Grace of the Mother): अंतिम श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया हैं।, "शुद्ध चित्तः पठेद्यस्तु... तस्मिन् माता प्रसीदति" - अर्थात, जो कोई भी शुद्ध हृदय से इस शुभ गायत्री अष्टकम् का पाठ करता हैं।, वह संसार में भाग्यशाली होता है और उस पर माता गायत्री की विशेष कृपा (special grace) होती है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस अष्टकम् का पाठ करने का सबसे उत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (Brahma Muhurta) और संध्याकाल है।

  • गायत्री मंत्र के जप से पहले या बाद में इस अष्टकम् का पाठ करने से साधना का प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

  • विद्यार्थियों और ज्ञान की कामना करने वाले साधकों के लिए इसका नित्य पाठ करना अत्यंत लाभकारी है।

  • गायत्री जयंती और नवरात्रि के पवित्र दिनों में इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी गायत्री शीघ्र प्रसन्न होती हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।