कालभैरव स्तुति (शिवरहस्य से)
Kalabhairava Stuti (From Shiva Rahasya)

नमस्ते कालनाथाय नमस्ते कालरूपिणे । नमो भीमाय चोग्राय नमस्ते शूलपाणये ॥ २६२॥
नमस्ते कालकण्ठाय नमस्ते कालभक्षक । नमो दिगम्बरानन्त नमः परमपूरुष ॥ २६३॥
नमो विश्वात्मक श्रीमन् नमो विश्वैकजीवन । नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष सहस्रकर ते नमः ॥ २६४॥
सहस्रचरणामेय नमस्ते भैरवप्रभो । नमस्ते रुद्र रुद्रात्मन्नमस्ते रुद्रसम्भव ॥ २६५॥
नमस्ते शाम्भवानन्द नमस्ते भूतभावन । नमस्ते सर्वलोकेश सर्वाधारामरार्चित ॥ २६६॥
नमस्ते दिक्स्वरूपाय नमस्ते भूस्वरूपिणे । नमस्ते सूर्यरूपाय चन्द्ररूपाय ते नमः ॥ २६७॥
नमस्ते ग्रहरूपाय रूपातीताय ते नमः । नमः सकलकल्याणभाजनायामृतात्मने ॥ २६८॥
नमः परमवीराय नमः परशुधारिणे । नमो डमरुहस्ताय नमः खट्वाङ्गधारिणे ॥ २६९॥
नमोऽनन्तगुणाधार नमोऽनन्तस्वरूपिणे । नमो विभूतिकवच व्योमकेश नमोऽस्तुते ॥ २७०॥
नमस्त्रिशूलहस्ताय नमस्ते मुण्डमालिने । नमः प्रेतासनासीन जपावर्ण नमोऽतु ते ॥ २७१॥
नमो ब्रह्मण्यरूपाय विधिनाशकृते नमः । अशैवशैलवज्राय शिवद्रोहिविनाशक ॥ २७२॥
शिवभक्तप्रिय श्रीमन्नमः श्रीकालभैरवम् । शरण्यमूर्ते सर्वात्मन्नमस्ते भक्तवत्सल ॥ २७३॥
शिवनेत्रानल श्रीमन्नमस्ते शिवपूजक । नमो रक्ताम्बर श्रीमन्नमस्ते रक्तचन्दन ॥ २७४॥
नमस्ते रक्तकेशाय नमस्ते रक्तबाहवे । नमस्ते रक्तभालाय नमो रक्तनखाय ते ॥ २७५॥
निर्विकार निरीहेश निरञ्जन निराश्रय । निरुपद्रव निर्द्वन्द्व निरामय निरञ्जन ॥ २७६॥
व्यालोपवीतिन्नुग्रात्मन्महाप्रलयकारण । अनेकसोमसूर्याग्निगणाकार नमोऽस्तुते ॥ २७७॥
॥ इति शिवरहस्यान्तर्गते कालभैरवस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
कालभैरव स्तुति का महत्व
यह कालभैरव स्तुति (Kalabhairava Stuti) शैव परंपरा के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ 'शिवरहस्य' (Shiva Rahasya) का एक अभिन्न अंग है। स्तोत्र की शुरुआत 'देवा ऊचुः' (देवताओं ने कहा) से होती है, जो इसकी प्रामाणिकता (Authenticity) और दिव्यता (Divinity) को स्थापित करता है। देवता स्वयं कालभैरव की स्तुति कर रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि वे न केवल संहारक हैं, बल्कि समस्त देवगणों के लिए भी पूजनीय (Worshipable) और शरण्य (Refuge) हैं। यह स्तुति भगवान शिव के उस उग्र रूप को समर्पित है जो समय (काल) को नियंत्रित करता है और अज्ञानता (Ignorance) तथा अधर्म (Unrighteousness) का नाश करता है। इसका पाठ साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के भय से मुक्ति दिलाता है।
स्तोत्र में वर्णित कालभैरव के दिव्य स्वरूप
यह स्तुति भगवान कालभैरव के विभिन्न पहचानों (Identities) और शक्तियों (Powers) का विस्तृत वर्णन करती है। श्लोकों में उन्हें 'नमस्ते कालनाथाय' (काल के स्वामी को नमस्कार) और 'नमस्ते कालरूपिणे' (काल के स्वरूप को नमस्कार) कहकर संबोधित किया गया है, जो उनकी समय पर अधिपत्यता (Sovereignty) को सिद्ध करता है। अन्य महत्वपूर्ण विशेषणों में शामिल हैं:
दिगम्बरानन्त: जो दिशाओं को ही वस्त्र मानते हैं और अनंत हैं।
सहस्राक्ष सहस्रकर: जिनके हजारों आँखें और हजारों हाथ हैं (जो उनकी सर्वव्यापकता (Omnipresence) को दर्शाते हैं)।
रक्ताम्बर श्रीमन्: जो लाल वस्त्र धारण करते हैं (यह उग्रता और संरक्षण (Protection) का प्रतीक है)।
प्रेतासनासीन: जो प्रेत (मृत शरीर) पर आसन ग्रहण करते हैं, यह दर्शाता है कि वे मृत्यु के पार हैं।
ये सभी नाम और रूप मिलकर कालभैरव को परमवीर (Supreme Warrior) और परमपूरुष (Supreme Being) के रूप में स्थापित करते हैं।
कालभैरव स्तुति का गूढ़ अर्थ और दर्शन
यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि गहन दार्शनिक सत्य (Truth) को समाहित करता है। श्लोक 276 में भैरव को 'निर्विकार निरीहेश निरञ्जन निराश्रय' कहकर उनकी निर्गुण (Formless) अवस्था का वर्णन किया गया है। वे विकारों से रहित, इच्छाओं से परे, और किसी भी आश्रय की आवश्यकता से मुक्त हैं। यह द्वैत (Duality) से परे की स्थिति है, जिसे 'निरुपद्रव निर्द्वन्द्व' (उपद्रव रहित और द्वंद्व रहित) कहा गया है। इसके विपरीत, श्लोक 267 और 268 में उन्हें 'दिक्स्वरूपाय', 'भूस्वरूपिणे', 'सूर्यरूपाय', 'चन्द्ररूपाय' और 'ग्रहरूपाय' कहकर उनकी सगुण (With Form) और विश्वात्मक (Cosmic Soul) प्रकृति का वर्णन किया गया है। यह स्तुति शैव दर्शन के इस मूलभूत सिद्धांत को दर्शाती है कि परम सत्ता (Existence) एक ही समय में रूपवान और रूपहीन दोनों है।
स्तोत्र पाठ के विशिष्ट लाभ (Spiritual Benefits)
कालभैरव स्तुति का नियमित पाठ साधक को अनेक आध्यात्मिक (Spiritual) और भौतिक (Material) लाभ प्रदान करता है।
भय और शत्रु नाश: भैरव को 'भीमाय चोग्राय' (भयंकर और उग्र) कहा गया है। यह स्तुति सभी प्रकार के आंतरिक और बाहरी शत्रुओं, विशेषकर नकारात्मकता (Negativity) और अशुभ शक्तियों (Inauspicious Forces) का नाश करती है।
काल और मृत्यु पर विजय: चूंकि वे कालनाथ हैं, उनका ध्यान करने से साधक को मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और वह दीर्घायु (Longevity) प्राप्त करता है।
शिवभक्ति की प्राप्ति: श्लोक 273 में उन्हें 'शिवभक्तप्रिय' कहा गया है। यह स्तुति भगवान शिव के प्रति निष्ठा (Devotion) और प्रेम (Love) को बढ़ाती है।
कल्याण और मोक्ष: उन्हें 'सकलकल्याणभाजनाय' (समस्त कल्याण के पात्र) कहा गया है। यह स्तोत्र जीवन में समृद्धि (Prosperity) और अंततः मोक्ष (Liberation) का मार्ग प्रशस्त करता है।
कालभैरव स्तुति के पाठ की विधि
कालभैरव की स्तुति का पाठ करते समय विशेष नियमों (Rules) का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि यह एक उग्र देवता का स्तोत्र है।
समय: इस स्तुति का पाठ कालाष्टमी (Kalhashtami), भैरवाष्टमी (Bhairavashtami), या प्रत्येक शनिवार की रात को करना अत्यंत शुभ (Highly Auspicious) माना जाता है।
दिशा और आसन: साधक को स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए और दक्षिण दिशा (जो भैरव की दिशा मानी जाती है) की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
ध्यान: पाठ शुरू करने से पहले भगवान कालभैरव के उग्र, रक्तवर्ण स्वरूप का ध्यान करना चाहिए, जैसा कि श्लोक 274 और 275 में वर्णित है। एकाग्रता (Concentration) बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
अर्पण: पाठ के उपरांत, यदि संभव हो, तो भैरव को समर्पित नैवेद्य (जैसे गुड़ या तेल से बनी वस्तुएँ) अर्पित करना चाहिए। यह स्तुति समर्पण (Dedication) और श्रद्धा (Faith) के साथ की जानी चाहिए।