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श्रीदुर्गानीराजनपञ्चकम्

Shri Durga Nirajana Panchakam | Karpurena Varena

श्रीदुर्गानीराजनपञ्चकम्
कर्पूरेण वरेण पावकशिखा शाखायते तेजसा
वासस्तेन सुकम्पते प्रतिपलं घ्राणं मुहुर्मोदते।
नेत्राह्लादकरं सुपात्रलसितं सर्वाङ्गशोभाकरं
दुर्गे! प्रीतमना भव तव कृते कुर्वे सुनीराजनम्॥१॥

आदौ देवि! ददे चतुस्तव पदे त्वं ज्योतिषा भाससे
दृष्ट्वैतन् मम मानसे बहुविधा स्वाशा जरीजृम्भते।
प्रारब्धानि कृतानि यानि नितरां पापानि मे नाशय
दुर्गे! प्रीतमना भव तव कृते कुर्वे सुनीराजनम्॥२॥

नाभौ द्विः प्रददे नगेशतनये! त्वद्भा बहु भ्राजते
तेन प्रीतमना नमामि सुतरां याचेपि मे कामनाम्।
शान्तिर्भूतिततिर्विभातु सदने निःशेषसौख्यं सदा
दुर्गे! प्रीतमना भव तव कृते कुर्वे सुनीराजनम्॥३॥

आस्ये तेऽपि सकृद् ददे द्युतिधरे! चन्द्राननं दीप्यते
दृष्ट्वा मे हृदये विराजति महा-भक्तिर्दयासागरे!।
नत्वा त्वच्चरणौ रणाङ्गनमनः! शक्तिं सुखं कामये
दुर्गे! प्रीतमना भव तव कृते कुर्वे सुनीराजनम्॥४॥

मातो मङ्गलसाधिके! शुभतनौ ते सप्तकृत्वो ददे
तस्मात् तेन मुहुर्जगद्धितकरं सञ्जायते सन्महः।
तद्भासा विपदः प्रयान्तु दुरितं दुःखानि सर्वाणि मे
दुर्गे! प्रीतमना भव तव कृते कुर्वे सुनीराजनम्॥५॥
॥ इति श्रीव्रजकिशोरः त्रिपाठीविरचितं श्रीदुर्गानीराजनपञ्चकं सम्पूर्णम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीदुर्गानीराजनपञ्चकम्" माँ दुर्गा की आराधना के लिए रचित पाँच श्लोकों का एक दिव्य स्तोत्र है। इसे 'नीराजन' (आरती) के समय गाया जाता है। इसमें कर्पूर की ज्योति के साथ देवी की वंदना की गई है।

आरती के मुख्य भाव

  • कर्पूर नीराजन (Camphor Offering): "कर्पूरेण वरेण पावकशिखा" - श्रेष्ठ कर्पूर की अग्नि शिखा से देवी की आरती उतारी जाती है, जिससे वातावरण सुगंधित और पवित्र हो जाता है।
  • सर्वांग शोभा (Beauty of All Limbs): "सर्वाङ्गशोभाकरं" - आरती का प्रकाश देवी के सभी अंगों की शोभा को और अधिक बढ़ा देता है।
  • पाप नाश (Destruction of Sins): "पापानि मे नाशय" - भक्त देवी से प्रार्थना करता है कि वे उसके पूर्व जन्मों और इस जन्म के सभी पापों का नाश करें।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह स्तोत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा और प्रतिदिन की संध्या आरती के समय गाया जाता है।
  • विधि (Method): कर्पूर जलाकर देवी की आरती उतारते हुए इन पाँच श्लोकों का सस्वर पाठ करें।
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