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श्री जानकी जी की आरती

Shree Janaki Ji Ki Aarti | Janak Lali Ki

श्री जानकी जी की आरती
आरति कीजै जनक-ललीकी।
राममधुपमन कमल-कलीकी॥

रामचंद्र मुखचंद्र चकोरी।
अंतर साँवर बाहर गोरी।
सकल सुमंगल सुफल फलीकी॥

पिय द्रुगमृग जुग बंधन डोरी,
पीय प्रेम रस-राशि किशोरी।
पिय मन गति विश्राम थलीकी॥

रूप-रस-गुननिधि जग स्वामिनि,
प्रेम प्रबीन राम अभिरामिनि।
सरबस धन 'हरिचंद' अलीकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

आरती का महत्त्व

"आरति कीजै जनक-ललीकी" माता जानकी (सीता जी) की एक अत्यंत मधुर और भक्तिपूर्ण आरती है। इसमें माता सीता के दिव्य सौंदर्य, उनके गुणों और भगवान राम के प्रति उनके अनन्य प्रेम का वर्णन किया गया है। यह आरती भक्तों को माता सीता के वात्सल्य और कृपा का अनुभव कराती है।

आरती के मुख्य भाव

  • जनक-लली (Daughter of Janak): "आरति कीजै जनक-ललीकी" - राजा जनक की लाडली पुत्री, माता सीता की आरती करें।
  • राम-प्रिया (Beloved of Ram): "राममधुपमन कमल-कलीकी" - भगवान राम के भ्रमर रूपी मन के लिए माता सीता कमल की कली के समान हैं।
  • जग स्वामिनि (Mistress of the World): "रूप-रस-गुननिधि जग स्वामिनि" - माता सीता रूप, रस और गुणों की खान हैं और जगत की स्वामिनी हैं।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती सीता नवमी, विवाह पंचमी, और नित्य पूजा के समय गाई जाती है।
  • विधि (Method): माता सीता और प्रभु राम की युगल छवि के समक्ष, शुद्ध मन से और प्रेमपूर्वक यह आरती गाएं।
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